-मोहम्मद शहजादहिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों हमसाया मुल्क हैं। यही वजह है कि दोनों में काफी समानताएं हैं। एक जैसी रंगत और चेहरे-मोहरे के लोग, भाषा,...
-मोहम्मद शहजाद
हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों हमसाया मुल्क हैं। यही वजह है कि दोनों में काफी समानताएं हैं। एक जैसी रंगत और चेहरे-मोहरे के लोग, भाषा, संस्कृति, कला और रस्मो-रिवाज सरहद के इधर के भी हैं और उधर भी। जुगराफियाई और सामाजिक संरचनाएं भी लगभग एक जैसी हैं लेकिन बात जब लोकतांत्रिक मूल्यों, कानून-व्यवस्था और सुख-शांति की आती है तो दोनों में जमीन आसमान का अंतर नजर आता है। सीमा के इस तरफ इनका सम्मान किया जाता है, तो उस तरफ इनका खुला उल्लंघन होता है। जम्हूरियत के चौथे स्तंभ माने जाने वाले मीडिया पर हमले और सरकार की अघोषित पाबंदियां इसकी हालिया नजीर हैं।
पाकिस्तान के खैबर-पख्तूनख्वा सूबे की राजधानी पेशावर में गत दिनों मीडियाकर्मियों को ले जा रही एक गाड़ी पर अज्ञात बंदूकधारियों ने हमला कर दिया। इसमें टीवी पत्रकार नुरुल हसन की मौत हो गई और कैमरामैन साबिर घायल हो गए। इस तरह इस साल ड्यूटी पर रहते हुए यह पांचवें पत्रकार ही हत्या है। इनमें चार खैबर-पख्तूनख्वा और एक पंजाब सूबे की घटना है। इसके पूर्व अक्टूबर माह में सोहेल खान नाम के एक पत्रकार की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। देखा जाए तो पाकिस्तान में मीडिया पर हमले की यह कोई इक्का-दुक्का वारदात नहीं हैं। आए-दिन वहां पत्रकारों को चरमपंथियों के जरिए निशाना बनाया जाता है।
इमरान खान की नई सरकार के वजूद में आने के बाद अब उनपर सरकारी अत्याचार में भी इजाफा हुआ है। कराची की स्थानीय मीडिया में कार्यरत पत्रकार नसरुल्लाह खान को पिछले माह कुछ सशस्त्र लोगों के जरिए उनके घर से उठा लिया गया। उनमें से कुछ लोग वर्दी में थे और कुछ बिना वर्दी में। ऐसा क्यों हुआ और किस जुर्म में उन्हें हिरासत में लिया गया, उनकी पत्नी को भी इसकी सूचना नहीं दी गई। बस कहा गया कि कुछ पूछताछ के बाद छोड़ दिया जाएगा। इसी तरह कराची प्रेस क्लब में कुछ हथियारबंद लोग घुसे और उसके पूरे परिसर की वीडियोग्राफी की। इसके साथ ही दोनों घटनाओं में सुरक्षा एजेंसियों के लोग कंप्यूटर समेत दीगर सामान भी अपने साथ ले गए। इसके पीछे दलीलें चाहे जो दी जाएं लेकिन हकीकत पाकिस्तानी सरकार की आलोचना मात्र है।
दरअसल, ये घटनाएं पाकिस्तानी मीडिया पर उन अघोषित प्रतिबंधों की कड़ियां हैं जो वहां नई सरकार बनने के बाद से जारी हैं। इसके तहत पाकिस्तान तहरीके इंसाफ पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार वहां प्रेस की आवाज दबाने के लिए कई तरह के हथकंडे इस्तेमाल कर रही है। इसके विरोध में अक्टूबर के अंत में पाकिस्तानी पत्रकार राजधानी इस्लामाबाद स्थित संसद भवन के बाहर भी विरोध-प्रदर्शन कर चुके हैं।
विरोध-प्रदर्शन के कई तरीके हो सकते हैं लेकिन पाकिस्तानी पत्रकारों ने अपनी बेरोजगारी का मलाल जाहिर करने के लिए हमारे प्रधानमंत्री मोदी के 'पकौड़ा मंत्र' को ही चुना। हमारे अपने देश में सियासी अदावत के चलते भले ही विपक्षी दलों ने मोदी के इस मंत्र की धुर आलोचना की हो लेकिन पाकिस्तानी पत्रकारों को अपनी आर्थिक तंगी प्रकट करने का यही अनूठा तरीका रास आया। कारण सीमाई हदबंदी के बावजूद पाकिस्तानियों का हम हिंदुस्तानियों से मनोग्रसित होना है जो भारत में प्रेस की आजादी को भी बड़ी आस भरी निगाहों से देखते हैं।
दरअसल, पाकिस्तानी पार्लियामेंट के बाहर पाकिस्तान फेडरल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के बैनर तले आयोजित यह विरोध-प्रदर्शन वहां बड़े पैमाने पर पत्रकारों को नौकरियों से जबरन निकाले जाने को लेकर था। पाकिस्तान में नई सरकार बनने के बाद एक तरह से वहां मीडिया पर अघोषित प्रतिबंध की स्थिति उत्पन्न हो गई है। इसके तहत विज्ञापन इत्यादि के नाम पर मीडिया हाउसेज को मिलने वाली सब्सिडी समाप्त की जा रही है। यही नहीं, देश के कुछ हिस्सों में तो समाचार पत्रों का प्रकाशन, वितरण और टीवी चैनलों का प्रसारण तक रोक दिया गया है।
नतीजतन कई मीडिया संस्थानों ने बड़े पैमाने पर अपने पत्रकारों की छटनी कर दी है। ऐसे में जिन सौभाग्यशाली पत्रकारों की नौकरियां बची हैं, उन्हें वेतन काफी देर से मिल रहा है। खराब होती आर्थिक स्थिति के चलते समाचार चैनल 'वक्त-न्यूज' ने पहले अपने स्टॉफ में कटौती की और फिर बाद में देशभर के पत्रकारों की छुट्टी कर अपने तमाम कार्यालयों को बंद कर दिया। यह न्यूज चैनल देश के प्रतिष्ठित मीडिया ग्रुप 'नवाए-वक्त' के जरिए 2007 में लांच किया गया था। 11 साल तक निरंतर सेवाएं देने के बाद आर्थिक तंगी के चलते इसे बंद करना पड़ा। इसी तरह हाल ही में एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने तीन माह का वेतन देकर अपने काफी स्टॉफ की छंटनी कर दी।
जब पाकिस्तान के प्रतिष्ठित मीडिया समूहों का यह हाल है तो लोकल मीडिया समूहों की हालत का अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है। इस्लामाबाद और रावलपिंडी समेत देश के कई हिस्सों में पत्रकारों की माली हालत अत्यंत दयनीय होती जा रही है। इमरान खान की सरकार पर प्रेस की आजादी छीनने के आरोप लग रहे हैं। देखा जाए तो पाकिस्तान में मीडिया पर पहरा बिठाने की ये कोशिशें नई नहीं हैं। इससे पहले भी वहां जियाउल हक जैसे तानाशाहों के कार्यकाल में मीडिया पर पाबंदियां लगाई जाती रही हैं।
पाकिस्तान के सूबे बलोचिस्तान में सेना के जरिए स्थानीय पत्रकारों पर अत्याचार की वारदात दुनिया से ढकी-छुपी नहीं हैं। बलोच लोगों के साथ पाकिस्तानी सरकारों के भेदभाव के विरुद्ध और आजादी के समर्थन में आवाज बुलंद करने वाले कार्यकर्ताओं के साथ-साथ पत्रकारों का सेना के जरिए अगवा, अत्याचार और हत्या जैसी बातें आम हैं।
रही-सही कसर दहशतर्दों और धार्मिक चरमपंथियों ने पूरी कर दी है। यही वजह है कि पाकिस्तान को मीडियाकर्मियों के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक स्थानों में शुमार किया जाता है। मई 2018 में फ्रीडम नेटवर्क नामी संस्था ने प्रेस फ्रीडम बैरोमीटर-2018 के शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की थी। इसमें इस्लामाबाद को पत्रकारों के लिए दुनिया की सबसे खतरनाक जगहों में शुमार किया है। इसके अनुसार अकेले इस्लामाबाद में मई 2017 से लेकर अप्रैल 2018 के दौरान पत्रकारों पर 55 हमले हुए। जब पाकिस्तान की संघीय राजधानी का यह हाल है तो देश के बाकी हिस्सों का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। फ्रीडम नेटवर्क ने अपनी रिपोर्ट में इस मुद्दत के दौरान देशभर में पत्रकारों पर हमलों की कुल 157 वारदात को दर्ज किया है।
इसी तरह प्रेस की आजादी पर निगरानी रखने वाली संस्था 'रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स' ने अपनी गत वर्ष की रिपोर्ट में 180 देशों की सूची में पाकिस्तान को 139वें स्थान पर रखा था। उसके अनुसार डेढ़ दशकों में पाकिस्तान में 117 पत्रकार मारे जा चुके हैं। खबरिया चैनल जियो न्यूज के सीनियर एंकर हामिद मीर पर 2014 में 6 बार जानलेवा हमले हुए। लेकिन शायद खुदा को हामिद मीर से चरमपंथियों के खिलाफ अभी और काम लेना बाकी है, जो वह हर बार बच गए।
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इमरान खान और उनकी पार्टी पीटीआई पर वैसे ही सेना और आतंकियों से सांठगांठ के आरोप लगते रहे हैं। अकारण नहीं है कि उनकी सरकार आने के बाद सरकारी तंत्र के जरिए प्रत्यक्ष रूप से ही पाकिस्तानी पत्रकारों की आवाज दबाने की कोशिशें की जा रही हैं। यानी जो काम पर्दे के पीछे होता था, वह अब खुलेआम होने लगा है। (हिंस)

