
इस संसार की सभ्यता तथा संस्कृति का इतिहास जितना पुराना है उतना ही पुराना है शिक्षा एवं गुरुओं का इतिहास। शिक्षा के इतिहास के साथ जुड़ी हैं...
इस संसार की सभ्यता तथा संस्कृति का इतिहास जितना पुराना है उतना ही पुराना है शिक्षा एवं गुरुओं का इतिहास। शिक्षा के इतिहास के साथ जुड़ी हैं शिक्षक-शिक्षा की परंपराएं।
जिस प्रकार जल से स्नान करने पर शरीर के समस्त विकार धुल जाते हैं उसी प्रकार गुरु के उपदेश से मनुष्य के बाह्य एवं अभ्यान्तर समस्त दोष दूर हो जाते हैं। इसलिए गुरु उपदेश को बिना जल का स्नान कहा गया है। साधारणतया स्वर्ण रचित अलंकार ही कानों को सुशोभित करते हैं किंतु गुरु उपदेश स्वर्ण निर्मित नहीं होते हुए भी कर्ण का आभूषण हैं।
प्रकाश में जगमगाहट होती हैं, किंतु गुरु का ज्ञान जगमगाहट के बिना ही प्रकाश स्वरूप है। साधारणतया बाल सफेद होने पर लोग वृद्ध समझे जाते हैं किंतु गुरु का ज्ञान तो बालों की सफेदी के बिना ही पुरुष को वृद्धत्व का ज्ञान कराता है।
जिस प्रकार प्रदोषकाल का उदीयमान चन्द्रमा रजनी के समस्त अंधकार को क्षीण कर देता है, उसी प्रकार गुरुजनों के शांतिप्रद उपदेश भी अज्ञान आदि समस्त दोष समूह को दूर कर देते हैं।
कान में गया हुआ साफ पानी भी जैसे लोगों को बहुत कष्ट पहुंचाता है वैसे ही अयोग्य लोगों के कर्णकुहर में प्रविष्ट सर्वथा निर्दुष्ट गुरुवचन भी उन्हें बड़ी पीड़ा पहुंचाते हैं परंतु शंख का गहना जिस प्रकार मतंगों के मुखमण्डल की चारुता को और अधिक बढ़ा देता है, उसी प्रकार गुरु के उपदेश सत्यपुरुषों के श्रवणगोचर होने पर उनकी मुखशोभा को बढ़ाते हैं।
इस संसार में सर्प को दूध पिलाने वाले तो बहुत हैं लेकिन विष को दूर करने वाले कम ही दिखाई देते हैं। वह सिर्फ गुरु ही होता है। किसी भी राष्ट्र के निर्माण में शिक्षकों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता तथा गुरु को समाज के दर्पण के रूप में देखा जा सकता है।
अपने लोगों पर उदारता, पराये लोगों पर दया, सज्जनों के प्रति प्रेम, राजाओं के प्रति नीति, विद्वानों के प्रति सरलता, शत्रुजनों के प्रति शूरता, इस प्रकार जो पुरुष गुरु के बताये मार्ग पर चलता है, उन्हीं जनों पर लोक स्थित है।
'गुरु का ज्ञान प्राणी को संपत्ति काल में कमल के समान कोमल तथा विपत्ति काल में विशाल पर्वत के सामान कठोर बनाता है।'
-पंकज कुमार

