
हम शांति पाठ करते हैं, जिसमें पदार्थों, औषधियों, सभी दिशाओं, पृथ्वी, अन्तरिक्ष आदि समेत पूरे विश्व में शांति की कामना करते हैं, क्योंकि शांति अनमोल...
हम शांति पाठ करते हैं, जिसमें पदार्थों, औषधियों, सभी दिशाओं, पृथ्वी, अन्तरिक्ष आदि समेत पूरे विश्व में शांति की कामना करते हैं, क्योंकि शांति अनमोल है, बहुमूल्य हीरा है। जो व्यक्ति बिना किसी उद्देश्य के इधर-उधर घूमकर अपना समय नष्ट करते हैं, उन्हें इस अनमोल हीरे की कभी प्राप्ति नहीं होती। यदि शान्ति चाहिए तो मनुष्य पहले अपना लक्ष्य तय करे और उसके अनुसार आगे बढे। निर्दिष्ट लक्ष्य की ओर बढने पर मनुष्य को एक प्रकार के असंतोष और शान्ति की प्राप्ति होती है, किन्तु कुछ अपवादों को छोडकर संसार में आकर मनुष्य यहीं के आकर्षणों में, वस्तु पदार्थों में उलझ जाता है, लिप्त हो जाता है। तब अन्तर में बैठी हुई चेतना उसे कचोटती रहती है। यदि उसके संकेतों को समझ वह लक्ष्य की ओर बढ जाता है तो ठीक, अन्यथा वह जीवन भर अशांत और असन्तुष्ट ही रहेगा। इस सबके साथ महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वार्थपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाले को स्थायी शान्ति और सन्तोष नहीं मिल पाते, जबकि परमार्थ प्रधान कार्यों से ही मनुष्य शान्ति अनुभव करता है। परमार्थ कार्यों में मनुष्य के जितने प्रयास बढते जायेंगे, उतना ही वह सन्तुष्ट और शान्त होता जायेगा।

