
आदमी को अपने प्रारब्ध, अपनी शक्ति, क्षमता और परिश्रम के कारण जो मिल जाता है, उसको बहुधा अपर्याप्त मानता है। थोडा और, थोडा और के चक्रव्यूह में फंसकर...
आदमी को अपने प्रारब्ध, अपनी शक्ति, क्षमता और परिश्रम के कारण जो मिल जाता है, उसको बहुधा अपर्याप्त मानता है। थोडा और, थोडा और के चक्रव्यूह में फंसकर वह अशान्ति और असन्तोष को ही आमंत्रण देता है। सन्तोष के साधन के लिये आपके पास वर्तमान में जो कुछ है, उस पर सन्तोष करें, उसका लाभ उठायें। इसका अर्थ यह नहीं कि भावी प्रगति के लिये प्रयास न किये जायें। सन्तोष का अर्थ हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना नहीं है। वर्तमान से सन्तुष्ट रहकर भावी उन्नति के लिये धैर्यपूर्वक प्रयत्नशील रहना शांति के लिये आवश्यक है। मनुष्य की अशान्ति और असन्तोष का कारण उसका असन्तुलित मन भी है। वह ऐसी उधेडबुन में लगा रहता है, जिससे अशान्ति और असन्तोष कम नहीं होते, बल्कि बढते जाते हैं। भले ही इनका दोष मनुष्य भाग्य और दूसरे व्यक्तियों पर मढता रहे, परन्तु मूलत: दोष उसके असन्तुलित, अनियंत्रित मन का ही होता है। जिस प्रकार बिना सधा हुआ घोडा सवार को दुखद परिस्थिति में डाल देता है, उसी प्रकार असंस्कृत, असंतुलित मन मनुष्य को कई दोष चक्रों में फंसाते रहते हैं। इसलिए दोषारोपण के बजाय अपनी क्षमता, परिस्थिति और परिश्रम के अनुसार जो प्राप्त होता रहे, उसके लिये प्रभु का धन्यवाद कर अतिरिक्त के लिये अनुशासित रहकर प्रयास करते रहें।

