
आदमी का मन चंचल होता है और दुर्बल भी। बहुधा बाह्य और आन्तरिक मन में एक रूपता भी नहीं होती। आन्तरिक मन नैतिक मूल्यों पर कायम रहने की प्रेरणा देता है,...
आदमी का मन चंचल होता है और दुर्बल भी। बहुधा बाह्य और आन्तरिक मन में एक रूपता भी नहीं होती। आन्तरिक मन नैतिक मूल्यों पर कायम रहने की प्रेरणा देता है, परन्तु बाह्य मन उससे एकरूपता पैदा नहीं कर पाता। मन की शान्ति के लिये इस प्रकार की दुविधा को मिटाकर इनमें सामंजस्य पैदा करना अति आवश्यक है अर्थात जैसा भीतर हो, वैसा ही बाहर। इनमें एकरूपता जितनी होगी, उतनी ही मनुष्य में प्रसन्नता, शांति और सन्तोष की वृद्धि होगी। असन्तोष का एक मुख्य कारण है अपनी यथार्थ स्थिति को भूल जाना। वास्तविकता से आंखें मूंदकर किसी के कहे, सुने या कल्पित स्वरूप में अपने आपको समझने, देखने की भूल कर बैठना। अपनी सहज स्वाभाविक स्थिति को भुलाकर लोग जब जीवन का अस्वाभाविक मार्ग अपनाते हैं, अपनी सीमाओं से अधिक आकांक्षाएं रखते हैं, अपनी हैसियत से अधिक धन खर्च करते हैं, भले ही ऋण लेना पडे, ऐसी स्थिति भी अशान्ति और असन्तोष का कारण बन जाती है। प्रकृति का एक नियम है क्रमिक विकास। इस सिद्धान्त से सब उच्च स्थिति में धीरे-धीरे पहुंचते हैं और वह भी अपनी क्षमता, योग्यता और परिश्रम के आधार पर। आप भी परिश्रम करेंगे तो योग्यता, क्षमता के अनुसार अवश्य पायेंगे। बचपन से कोई अचानक वृद्ध नहीं होता, उगते हुए पेड पर भी फल नहीं आते।

