
संसार में जितने भी जलचर, नमचर और मूचर हैं, सब अपने भोजन और प्रजनन क्रियाओं में ही व्यस्त रहते हैं। समस्त प्राणियों में मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है।...
संसार में जितने भी जलचर, नमचर और मूचर हैं, सब अपने भोजन और प्रजनन क्रियाओं में ही व्यस्त रहते हैं। समस्त प्राणियों में मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। इसके बावजूद अधिकांश मनुष्य इसी प्रकार का जीवन यापन करते दिखाई देते हैं, फिर मनुष्य और पशु में अन्तर ही क्या रह जाता है। ये पशु प्रवृत्तियां केवल अशिक्षित व्यक्तियों में ही हो, ऐसा नहीं है, अपितु पाया यह जाता है कि पढे-लिखे सभ्य समाज के लोग ही अधिक दुव्र्यसनी हैं। सत्य-असत्य का, उचित-अनुचित का, मर्यादा और संयम का कोई ध्यान नहीं रखते, केवल अपने इन्द्रिय सुख के लिये, लोभ लालच की पूर्ति के लिये, पुत्रेषणा, वित्तेषणा (धन कमाने और संग्रह करने की कामना) और लोकेषणा (प्रसिद्धि, यश, सम्मान की इच्छा) के लिये संसार का कोई भी निकृष्ट कार्य कर सकते हैं। पाप का उन्हें भय नहीं, ईश्वर प्रदत्त कर्मफल की व्यवस्था पर विश्वास नहीं। मानसिक चिंतन पर किसी प्रकार का नियंत्रण नहीं, फिर जीवन में सुख-शांति का वातावरण कैसे बने? आत्मिक उन्नति किस प्रकार सम्भव हो? हमें चाहिए कि हम सदा ज्ञानी, विद्वान पुरूषों के संसर्ग में रहें, विवेक बुद्धि को विकसित करें, नि:स्वार्थ भाव से परोपकार करें। दूसरों से ऐसा व्यवहार न करें, जो तुम्हें स्वयं के लिये पसंद न हो। इससे कुविचार, कुसंस्कार हम पर हावी नहीं होंगे। हम मनुष्यता की कैसाटी पर खरे उतरेंगे।

