
मनुष्य जीवन के क्रियाकलाप बडे विचित्र हैं। मनुष्य मन से जो चिंतन करता है, उसे वाणी से कहता है, जो वाणी से कहता है, उसे शरीर से करता है और शरीर द्वारा...
मनुष्य जीवन के क्रियाकलाप बडे विचित्र हैं। मनुष्य मन से जो चिंतन करता है, उसे वाणी से कहता है, जो वाणी से कहता है, उसे शरीर से करता है और शरीर द्वारा किये गये कर्मों के फल प्राप्त करता है। यदि मनुष्य अच्छे फलों की कामना करता है तो अपनी वाणी से अच्छे शब्दों का उच्चारण करे। यदि वह चाहता है कि अपनी वाणी से अच्छे शब्द ही निकलें, तो वह अपने मानसिक चिंतन को सुधारे, मन से केवल शुभ-शुभ ही सोचे, अशुभ विचारों को मन में स्थान न दे, अपनी कुटिल माने वाले वाली मानसिक प्रवृत्तियों का परिष्कार करे, मानसिक धारणा को ऊंचा उठाये। मनुष्य को शरीर के नियत्रंण की चिंता नहीं करनी चाहिए। शरीर का नियंत्रण वाणी के नियंत्रण पर आधारित है। अत: सबसे बडी साधना मन के नियंत्रण पर आधारित है। मन में जिस प्रकार का चिंतन चलता है, वैसे ही वाणी और शरीर करते हैं। अत: हमें उन मानसिक वृत्तियों को निर्धारित कर लेना चाहिए, जिन पर मनुष्य की मनुष्यता को परखा जा सके। सारी नैतिकता इस एक शब्द 'मनुष्यता' के अन्तर्गत आ जाती हैं। मनुष्यता की धारणा करने के लिये अपनी मानसिक दुर्बलता पर नियंत्रण करना होगा, जिससे मन में अशुभ विचार आये ही नहीं।

