
इस सृष्टि के कण-कण का विधान परमात्मा के हाथ में है। उसे चाहे अटल नियम कहें, काल कहें, विधाता या परमेश्वर कहें, बात एक ही है। उसे मानना अवश्य पडता है।...
इस सृष्टि के कण-कण का विधान परमात्मा के हाथ में है। उसे चाहे अटल नियम कहें, काल कहें, विधाता या परमेश्वर कहें, बात एक ही है। उसे मानना अवश्य पडता है। इससे बुद्धि को एक स्थिति प्राप्त होती है। उसे माने बिना बुद्धि सदैव भ्रमित रहती है, किन्तु मनुष्य का अपना भी अपने भाग्य विधान से कुछ सम्बन्ध अवश्य है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि मनुष्य स्वाधीन नहीं है। उसका जीवन परमात्मा के विधान के अनुसार ही चलता है। न्याय की दृष्टि से उसका विधान भी स्वतंत्र होना चाहिए और निष्पक्ष भी। यह बात ठीक भी है। ईश्वर ने कर्मफल का एक अटल नियम बना दिया है। इसी के अनुसार मनुष्य का भाग्य बिगडता है। भ्रम तब पैदा होता है कि कई बार परिश्रम से कर्म करने पर भी विपरीत परिणाम प्राप्त हो जाते हैं, लोग भाग्य और भगवान को दोष देने लगते हैं, किन्तु यह नहीं सोचते कि भाग्य तो हमारे पूर्व संचित कर्मों का ही परिणाम है। जिसे आज भाग्य कहकर पुकारा जाता है, वह कल के हमारे कर्मों का ही फल तो है, जिसके उत्तरदायी हम ही तो हैं।

