समय के साथ पुराने रीति रिवाज परम्पराएं बदलती जाती हैं। नई पीढ़ी नए विचारों से नई नई रस्में रीत रिवाज चलाती है। कुछ परिस्थितियों वश होता है कुछ...
समय के साथ पुराने रीति रिवाज
परम्पराएं बदलती जाती हैं।
नई पीढ़ी नए विचारों से नई नई
रस्में रीत रिवाज चलाती है।
कुछ परिस्थितियों वश होता है
कुछ हालात की मजबूरी होती है.
न जाने कब से गणेश प्रतिमाएं
पुराने ढंग से बनती चली आई हैं
विसर्जन के उपरांत जलाशयों में
उनकी दुर्दशा हमेशा देखने में आई है ।
कई विकल्प खोजे गए, आज़माए गए
किन्तु संतोषजनक नहीं पाए गए.
अब मिट्टी की गणेश जी की मूर्तियां
बनाने और घर में पानी की बालटी में
उन्हें विसर्जित करके पानी पौधों में
डालने का अदभुत विचार सामने आया है।
जन जन ने उसे खुशी खुशी माना है
और पूरे उत्साह से उसे अपनाया है !
- ओमप्रकाश बजाज

