
रामायण के दो प्रमुख पात्र हैं, राम और रावण। राम मानव और रावण दानव हैं। राम का नाम सुनने से श्रद्धा भाव उत्पन्न होता है और रावण का नाम सुनने से...
रामायण के दो प्रमुख पात्र हैं, राम और रावण। राम मानव और रावण दानव हैं। राम का नाम सुनने से श्रद्धा भाव उत्पन्न होता है और रावण का नाम सुनने से अश्रद्धा का। राम अयोध्या के शासक थे और रावण लंका का शासक।
दशहरा का दिन विजयोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन रावण दहन का जहां भी आयोजन होता है, अपार जनसमूह दर्शक के रूप में उपस्थित हो जाते हैं। रावण की नाभि में जब बाण लगता है तो पुतला धांय-धांय कर जल उठता है और भस्म हो जाता है।
सभी वक्ता रावण दहन को आसुरी शक्ति के विनाश के रूप में चित्रित करते हैं।
रावण के दस सिर की कल्पना की गई है। ये दसों सिर दस असुरी प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं। काम, क्रोध, लोभ, मद, वाचालता, चलना, असत्य, अविवेक, चोरी, अनाचार और हीनता। गीता के 14 वें अध्याय का श्लोक है:-
सत्वात्समा्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो भवतो ज्ञानमेव च।।
सतोगुण से सुख पैदा होता है, रजोगुण से लोभ और तमोगुण से आलस्य, मोह और अज्ञान पैदा होता है।
रावण तीन भाई थे। विभीषण, रावण और कुंभकरण। विभीषण सतोगुणी, रावण रजोगुणी और कुंभकर्ण तमोगुणी थे।
सतोगुणी विभीषण का अलग निवास, नि:संग, रहन-सहन, पूजन-मनन में निष्काम प्रवृत्तिमय जीवन उसे सारे पापों से मुक्त करने वाला था। उसका जीवन रज और तम को पराभूत करने वाला था। सोने की लंका में भी वह निर्धन का जीवन व्यतीत करता था। उसे भौतिक कष्ट मिलता था किन्तु वह अपने को निर्लिप्त रखता था।
उसका अपना विवेक था। इसे वह मुखरित भी करता था। इसका प्रभाव भी पड़ता था। कुंभकर्ण ने उसकी प्रशंसा की थी कि वह अपने कुल का उद्धारक बनेगा।
रावण रजोगुणी था। वह स्त्रियों के प्रति अधिक आकर्षित होता था। उसके निवास में अनके सुन्दर स्त्रियां थीं। रजोगुण की बुद्धि होने पर वह भौतिक भोगों की अभिलाषा को सचेष्ट करता था। उसके पास भांति-भांति के युद्धास्त्र थे। यात्रा के लिए पुष्पक यान था। भोग-विलास के लिए वह अनेक प्रकार की मदिरायें व्यवहार में लाता था। उसकी सक्रियता उत्तेजना और उद्दीपना रजोगुणी थी। इन्द्रियों की तृप्ति इन क्रियाओं का अभिप्रेत था। कठोर परिश्रम, यज्ञ, पूजन आदि करने पर भी वह सबसे सम्मान पाने की अभिलाषा रखता था।
कुंभकर्ण का व्यक्तित्व तमोगुणी था। आलस्य, निद्रा, मांस और मदिरा उसके शौक थे। वह छ: महीने की नींद के बाद एक दिन के लिए जागता था तथा फिर छ: महीनों के लिए सो जाता था। जिस दिन वह जागता था, उस दिन महिष मांस खाता था और मदिरा घड़ों से पीता था। जागने पर उसका पागलपन, यथार्थ विमुख रहता था। अज्ञान परक अवस्था में वह चेतनाशून्य रहता था कि उसे मरना भी है, उसकी सन्तान और परिवारजन भी मरेंगे। विभीषण ने उसे आध्यात्मिक चेतना देने की चेष्टा की, फिर भी उसने ध्यान नहीं दिया। इसका कारण था उसका आलसी स्वभाव।
इस तरह विभीषण, रावण, कुंभकर्ण, सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण के ही प्रतीक हैं। सतोगुणी का प्रभाव रजोगुणी पर एवं तमोगुणी का भी प्रभाव रजोगुणी पर नहीं पड़ता है, इसी कारण विभीषण और कुंभकर्ण का रावण पर प्रभाव नहीं पड़ा।
राम रावण युद्ध हो रहा था। राम रावण के सिर काटते थे। कटा हुआ सिर फिर से जुड़ जाता था। बार बार यही होता था। राम विभीषण की ओर इशारा करते थे और रावण की मृत्यु का रहस्य जानना चाहते थे। विभीषण ने उसकी नाभि में प्रहार करने का इशारा किया। राम ने नाभि पर बाण से प्रहार किया और रावण धराशायी हो गया। आसुरी प्रवृत्तियों पर राम को विजय प्राप्त हुई।
नाभि से ही मनुष्य का जन्म होता है। नाभि अमृत कुण्ड है। नाभि मणिचक्र का स्थान है। नाभि से ही विचारों का प्रवाह होता है- काम, क्रोध, लाभ, मद, वाचालता, चलना, असत्य, अविवेक, चोरी, आचार और हीनता।
मानव शरीर में सात प्रमुख चक्र हैं। गुदा स्थान में मूलाधार, जननेन्द्रिय स्थान में स्वाधिष्ठान, नाभि में मणिपुर, हृदय कूप में अनाहत, कण्ठ कूप में विशुद्धाख्य, भृकुटी में आज्ञा चक्र और कपाल रंध्र में सहस्त्रर चक्र। इन चक्रों को नाडिय़ों का जंक्शन या सब पावर स्टेशन मानना चाहिए। नाडिय़ां बड़ी महत्त्वपूर्ण हैं और ज्ञान की आश्रयभूत स्थल हैं। इन्हीं के माध्यम से ज्ञान मस्तिष्क में पहुंचता हैं।
एक प्रवृत्ति पर प्रहार करने से यदि बाकी असुरी प्रवृत्तियां विचारों में रहेगी तो उस प्रवृत्ति के पुन: प्रवेश को नहीं रोका जा सकता।
दार्शनिकों ने मन की तुलना तालाब से की है। जिस प्रकार तालाब के पानी में हवा के झोंकों से हिलोरें उठती हैं, उसी प्रकार हमारे मन में भी परिवेश के उद्दीपनों से हिलोरें उठती हैं। मनोवैज्ञानिकों ने इन्हीं हिलोरों को कल्पना शक्ति का नाम दिया है। कल्पना ही विचारों की जड़ है, मन में उठने वाले इन्हीं स्पन्दनों (हिलोरों) को जब बुद्धि द्वारा गढ़ा जाता है तथा प्राण द्वारा ताकत दी जाती है तो ऐसे स्पन्दन विचार बन जाते हैं। मनुष्य को उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचाते हैं, वहीं असद्विचार उसे पतन के गर्त में धकेलता है।
रावण अमर है- असुरीय प्रवृत्तियां अभी भी अमर हैं और जन्म लेती रहेंगी-यदि इन असुरी प्रवृत्तियों का नाभि के मनोयोग से दमन नहीं किया गया तो रावण पैदा होंगे ही।
बाल्मीकी का उदाहरण हमारे सामने है। वे डाकू से ऋषि इसी मनोयोग से बने।
- पुष्करलाल केडिया

