ऐसे होता है कुंभ में आने वाले साधुओं का श्रृंगार, लोग देखकर रह जाते हैं दंग

ऐसे होता है कुंभ में आने वाले साधुओं का श्रृंगार, लोग देखकर रह जाते हैं दंग

प्रथम शाही स्नान के साथ प्रयागराज में कुंभ मेला प्रारंभ हो चुका है। कुंभ मेले का देशी और विदेशी मेहमानों को बेसब्री से इंतजार होता है। यहां आने वाला हर व्यक्ति कुंभ के रंग में रंगा नजर आता है, जहां एक ओर कुंभ मेले में आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम यहां आने वाले देशी और विदेशी सैलानियों के आकर्षण का केंद्र होते हैं वहीं साधुओं का विशेष श्रृंगार भी लोगों के कौतूहल का विषय होता है।

कुंभ मेले में आने वाले साधु अलग - अलग प्रकार का श्रृंगार कर कुंभ में आने वाले श्रृद्धालुओं का मन मोह लेते हैं। जिस शाही ठाठ से वे कुंभ मेले में आते हैं वो नजारा देखते ही बनता है। शास्त्रों के अनुसार 12 कुंभ होते हैं जिनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर मानवों के लिए होते हैं और आठ कुंभ का आयोजन देवलोक में किया जाता है। इसी कारण व्यक्ति इन आठ कुंभ के आयोजनों में हिस्सा नहीं ले सकता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुंभ में स्नान करने से व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। मृत्यु के पश्चात व्यक्ति को जन्म - मरण के बंधन से छुटकारा मिलता है और वह देवलोक को गमन करता है। शास्त्रों के अनुसार, जब देव और दानवों में अमृत कलश के लिए युद्ध हुआ तो अमृत की पहली बूंद प्रयाग में गिरी, दूसरी बूंद हरिद्वार में गिरी, तीसरी बूंद उज्जैन में गिरी और चौथी अमृत की बूंद नासिक में जाकर गिरी। इसी कारण इन चार जगहों पर प्रत्येक 12 वर्ष बाद कुंभ का आयोजन किया जाता है।

कुंभ की गणना एक विशेष विधि से होती है, आपको बता दें कि गुरू एक राशि में लगभग एक वर्ष तक रहता है और बारह राशियों में भ्रमण करने में उसे 12 वर्ष की अवधि लगती है। इसी कारण प्रत्येक बारह साल बाद एक स्थान पर कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। हर 144 वर्ष बाद महाकुंभ का आयोजन होता है क्योंकि देवताओं का बारहवां वर्ष पृथ्वी लोक के 144 वर्ष के बाद आता है।

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