पर्यटन/धर्मस्थल: लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र-वैष्णो देवी

पर्यटन/धर्मस्थल: लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र-वैष्णो देवी

कलयुग में पूजे जाने वाले देवी- देवताओं में शाक्त संप्रदाय की अपनी अलग महत्ता है। शक्ति की पूजा विविध रूपों में की जाती है। उस में से एक तो वे स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं जहां देवी सती के विष्णु जी द्वारा अपने सुदर्शन चक्र से टुकड़े किये जाने के फलस्वरूप अंग गिरे थे। जहां-जहां सती के अंग गिरे थे, वे सब शक्तिपीठ के रूप में आज पूजे जाते हैं। दूसरे, देवताओं के मिलेजुले तेज पुंज से उत्पन्न शक्ति देवी दुर्गा को आराध्य के रूप में पूजा जाता है।

देवी सती व दुर्गा से संबंधित अनेक दंतकथाएं जनमानस में प्रचलित हैं जिनका समय व स्थान के हिसाब से अलग-अलग महत्त्व है। कई बार यह विभेद करना मुश्किल हो जाता है कि कौन सी देवी से संबंधित दंतकथा प्रचलित है? सनातन मत में देवी के विविध रूपों को भिन्नता से नहीं देखा गया है। देवी के सभी स्वरूपों को एक नजर से देखने का क्रम चलता रहा है। इसी क्रम में कलयुग की विश्व प्रसिद्ध देवी वैष्णो देवी को पूजा जाता है।

जम्मू-कश्मीर राज्य में स्थित वैष्णो देवी के दरबार में प्रतिवर्ष लाखों भक्तगण सिर झुकाने जाते हैं। मान्यतानुसार देवी भी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। वैष्णो देवी से संबंधित एक कथा त्रेता युग की है जिसमें देवी का दिव्य शक्तियों के तेज पुंज से उत्पन्न होना बतलाया गया है। इसके पश्चात उत्पन्न देवी द्वारा उद्देश्य के बारे में पूछा गया, तब महाशक्तियों द्वारा यह बतलाया गया कि धर्म के प्रचार तथा धर्म की रक्षा हेतु तुम्हें उत्पन्न किया गया हैै। तुम दक्षिण भारत में जाकर रत्नाकर सागर के घर पुत्री बनकर जन्म लो। वहां तुम विष्णु के अंश से उत्पन्न होगी। विष्णु के अंश से उत्पन्न होने के कारण देवी वैष्णवी के नाम से प्रसिद्ध हुई जबकि आरंभ में उसका नाम त्रिकुटा रखा गया था। समय अंतराल पर देवी वैष्णवी ने अपने पिता से आज्ञा लेकर समुद्र तट पर तप करना शुरू कर दिया। सीता हरण के समय जब भगवान राम लंका जा रहे थे, तब उन्होंने देवी को तपस्यारत रहने का कारण पूछा तो देवी ने बतलाया कि भगवान राम को पति के रूप में पाना चाहती हैं। एक पत्नीव्रता श्री राम ने देवी को यह आश्वासन दिया कि लंका से लौटते वक्त वे जरूर मिलेंगे। उस समय अगर देवी ने पहचान लिया तो उसे अंगीकार कर लेंगे।

लंका युद्ध होने के पश्चात श्रीराम साधु वेश धारण करके देवी के पास आये। देवी उन्हें पहचान न सकी। ऐसे में श्रीराम ने उनका वरण करने से इंकार कर दिया मगर साथ ही यह कहा कि कलयुग में कल्कि अवतार में तुम मेरी सहचरी बनोगी। तब तक तुम उत्तर भारत के माणिक पर्वत पर तीन शिखरों वाली गुफा में जहां तीन महाशक्तियों का निवास है, वहां तपस्या में मग्न रहो।

दूसरी कथा कलयुग से संबंधित है। कलयुग में श्रीधर नाम के एक भक्त हुए। वे नित्य नियम से कन्या पूजन किया करते थे। उनके संतान नहीं थी। एक बार उन्होंने कन्याओं को भोजन पूजन हेतु बुलाया। वहां पर उनको दिव्य कन्या भी दिखी। कन्या ने भक्त श्रीधर को यह कहा कि वह उनके पास एक खास काम से आई है। उन्होंने भक्त श्रीधर को कहा कि आस-पास के क्षेत्रों में यह संदेश भेज दो कि कल दोपहर को तुम्हारे यहां विशाल भण्डारे का आयोजन है। ऐसा कहकर दिव्य कन्या वहां से लुप्त हो गई।

भक्त श्रीधर काफी समय तक कन्या वाली बात के विषय में सोचते रहे। बात को सच मानकर वे आस-पास के गांवों में चल पड़े। रास्ते में उन्हें योगी गोरखनाथ व भैरवनाथ अपने 36० चेलों सहित मिले। श्रीधर जी ने उन्हें भी भण्डारे का न्यौता दिया और दिव्य कन्या वाली बात बतायी। दूसरे दिन भण्डारे के समय योगी गोरखनाथ व भैरवनाथ सहित अन्य जन समुदाय निर्धारित समय पर उपस्थित हो गए। उसी समय दिव्य कन्या उपस्थित हुई। उसने भक्त श्रीधर को कहा-इन्हें कुटिया में ले चलो। सारी व्यवस्था हो चुकी है।

कुटिया में जाने से गोरखनाथ इत्यादि ने मना कर दिया मगर भक्त श्रीधर द्वारा कन्या वाली बात कही जाने पर सब के सब कुटिया में बैठ गये। कन्या सबको भोजन परोसने लगी। जब भैरवनाथ की बारी आई तो उसने मांस, मदिरा की मांग की जिसको कन्या ने इंकार कर दिया। फलस्वरूप वह कन्या को बलपूर्वक पकडऩे लगा लेकिन कन्या वहां से अंतध्र्यान हो गई। वहां से वह कन्या दर्शनी दरवाजे से होती हुई बाण गंगा चरणपादुका आदि स्थानों से अर्धकुमारी पहुंची जहां गर्भपूजन गुफा में नौ महीने तक रही। वहां से कन्या त्रिकुट पर्वत की ओर चली गई और गुफा में रहने लगी। भैरव वहां भी पहुंच गया। अंत में वह देवी के हाथों मारा गया। मरने के पश्चात भैरव ने देवी मां से कलयुग में पूजे जाने का वर मांगा तो देवी मां ने उसे यह कहा कि मेरी पूजा के बाद भक्त तेरे दर्शन अवश्य करेंगे। तेरे दर्शनों के बगैर मेरी यात्रा अधूरी होगी।

ऐसी मान्यता भी है कि यहां पर सती की एक भुजा गिरी थी। जम्मू तथा कटरा रेल तथा बस द्वारा देश के प्रमुख हिस्सों से जुड़े हुए हैं। कटरा में रहने, खाने-पीने व ठहरने की उचित व्यवस्था है। कटरा से लगभग 13 किलोमीटर चढ़ाई का रास्ता है जो कठिन अवश्य है पर असंभव नहीं। यात्री चाहे तो कटरा से घोड़ा, खच्चर, पालकी, पिटठू कुली उचित मूल्य पर प्राप्त कर सकता है। स्वस्थ व्यक्ति के लिए मात्र 4-5 घंटे में चढ़ाई पूरी कर लेना संभव प्रतीत होता है।

वैष्णो देवी जाने वाले प्रत्येक यात्री को कटरा से यात्र पर्ची प्राप्त करना अनिवार्य है। यह पर्ची कटरा बस स्टैड पर स्थित टूरिस्ट सेंटर से नि:शुल्क दी जाती है। यात्र के दौरान पीने के पानी, विश्राम की जगह जगह उचित व्यवस्था है। चढ़ाई के दौरान थक जाने वाले यात्रियों के लिये उचित शुल्क पर मालिश करने वालों की भी व्यवस्था है। मालिश इत्यादि होने से आदमी तरोताजा हो जाता है।

वैष्णो देवी का दरबार समुद्रतल से 5200 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। चढ़ाई में उतावलेपन से बचना चाहिए। अगर भजन-कीर्तन करते हुए चढ़ाई करते जायेंगे तो हमें आनंद की अनुभूति होगी। यात्रा के आरंभ में दर्शनी दरवाजा, बाणगंगा, चरणपादुका, अर्धकुंवारी आदि स्थान आते हैं जहां से आगे सांझी छत है तथा तत्पश्चात माता का दरबार। हाथीमत्था से आगे सांझी छत की ओर न जाकर नये रास्ते से दिल्ली वाली छबीली की ओर जाते हैं। इस रास्ते में चढ़ाई कम रहती है। यह दो किलोमीटर छोटा रास्ता भी है जबकि हाथीमत्था से सीधा सांझी छत की ओर जाने से खड़ी चढ़ाई का सामना करना पड़ता है। माता के दरबार में प्रवेश से पूर्व यात्री को अपना नाम लिखवा कर टोकन लेना पड़ता है जो यात्र पर्ची देखकर दिया जाता है। इस टोकन के आधार पर पवित्र गुफा में प्रवेश मिलता है हालांकि पंक्ति में किसी भी समय विशेषकर गर्मियों के दिनों में भारी भीड़ लगी रहती है। माता के दरबार के आस-पास ठहरने का उत्तम बंदोबस्त है, साथ ही खाने-पीने की शुद्ध सात्विक सुविधा मुहैय्या है, वह भी उचित दर पर।

वैष्णो देवी दरबार के आस-पास सामान रखने के भी स्टॉकघर हैं। यह सुविधा बिलकुल नि:शुल्क है। यात्री को एक निश्चित लाकर दे दिया जाता है जिसमें उसका सामान रखकर टोकन प्रदान कर दिया जाता है। सामान चाहे कितना ही कीमती हो, पूर्ण रूप से सुरक्षित रहता है तथा टोकन वापस करने पर यात्री को उसका सामान लौटा दिया जाता है। वैष्णो देवी दरबार में आमतौर पर सुबह व शाम को ठंडक रहती है जबकि दोपहरी में धूप तेज हो जाती है। कटरा से धनवान लोगों के लिए हेलिकॉप्टरों से भी यात्रा दर्शन की व्यवस्था है।

- पवन कुमार कल्ला

Share it
Top