राष्ट्ररंग: विवाद नहीं, विकास के ध्वजवाहक हैं प्रवासी

राष्ट्ररंग: विवाद नहीं, विकास के ध्वजवाहक हैं प्रवासी

महर्षि वेदव्यास महाभारत के स्वर्गारोहण पर्व में कहते हैं- ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे। धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थ न सेव्यते। अर्थात् मैं अपने दोनों हाथ उठाकर कह रहा हूं लेकिन मेरी बात कोई नहीं सुनता। धर्म से ही अर्थ और काम हैं तो धर्म का पालन क्यों नहीं करते? आज भी स्थिति लगभग वही है। राजनीति अपने धर्म का पालन करने की बजाय कुटिलता में लगी है। अपने तुच्छ राजनीतिक लाभ के लिए कोई कब क्या कह दें, क्या कर दे- अनुमान लगाना असंभव है। अपनी गिरती छवि को चमकाने के लिए कुछ राजनेता लोकतंत्र की परिभाषा तक बदलने पर उतारू हो जाते हैं। मुंबई के बाद ताजा मामला गुजरात का है जहां गैरगुजरातियों विशेषकर उत्तर भारतीयों के साथ हिंसा केे अनेक समाचार सामने आये हैं।

हिम्मतनगर में एक बच्ची से दुष्कर्म के मामले में जिसे गिरफ्तार किया गया है, वह बिहार का रहने वाला है। उसके बाद सोशल मीडिया पर गैर गुजरातियों, खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों के खिलाफ नफरत भरे संदेश फैलाए जाने के बाद हमले हुए। अन्य राज्यों के प्रवासी कामगारों को गुजरात में नौकरी नहीं दिये जाने की बातें भी कहीं जा रही है। इससे आतंकित कुछ लोगों ने गुजरात से अपने घर वापसी भी की है। इस विवाद के पीछे क्षत्रिय ठाकोर सेना का हाथ होने की बात कहीं जा रही है संस्था प्रमुख कांग्रेस नेता अल्पेश ठाकोर ने इसमें ठाकोर सेना का हाथ होने से इंकार किया है। राज्य सरकार ने इस मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए अहमदाबाद, गांधीनगर, महेसाणा, अरावल्ली और साबरकांठा समेत छह जिलों में 42 मामले दर्ज कर 342 लोगों को गिरफ्तार किया है। सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने के मामले में भी कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

इस बात से किसे इंकार होगा कि अपराधी को कठोर सजा मिले लेकिन किसी भी आरोपी को क्षेत्र विशेष से पहचाना जाना किसी भी राष्ट्र की एकता में बाधक है। अगर यदि आरोपी की बजाय उसके क्षेत्र के लोगों को भी दंडित करने का विचार किसी मन में जन्म लेता है तो यह राष्ट्र की एकता को प्रभावित करने और उसे विखंडित करने का सपना देख रहे तत्वों को मौका देना होगा। भारत का हर नागरिक कश्मीर से कन्याकुमारी तक, कच्छ से कामरूप तक कहीं भी आए, जाए, रहें, व्यवसाय, नौकरी करने का अधिकारी है लेकिन कुछ लोग मौका- बेमौका ऐसी हरकतें करते रहते हैं जिससे उन्हें अथवा जिनके इशारे पर वे कार्य कर रहे हैं, उन्हें राजनीतिक लाभ प्राप्त हो सके।

किसे याद न होगा परप्रांतीयों के विरोध की राजनीति कुछ अन्य स्थानों पर भी होती रही है। कभी मुंबई में होने आपराधिक घटनाओं के लिए तो कभी अन्य समस्याओं के लिए परप्रांतीयों को दोषी ठहराकर किसी भी तरह ध्रूवीकरण के प्रयास करने वाले कानून का स्वाद चखने से बचते रहे हैं। उसी का परिणाम है कि अन्य राज्यों में कुछ राष्ट्र-विरोधी लोग ऐसे विवाद खड़े करने में सफल रहे है। राजनैतिक लाभ लेने के लिए उत्तरप्रदेश चुनाव प्रचार में 'कब तक महाराष्ट्र जाकर भीख मांगोगे? कब तक दिल्ली, पंजाब में मजदूरी करोगे?' का जुमला उछालने वाले युवराज हों या 'दिल्ली की सभी समस्याओं के लिए बाहर से आने वालों को दोषी ठहराने वाली' पूर्व मुख्यमंत्री, जाने- अनजाने देश की एकता को कमजोर करने का काम ही तो कर रहे थे। लंबे समय से राजनीति में रहकर स्वयं को गरीबों का एकमात्र शुभचिंतक बताने वालों को कब समझ में आयेगा कि भारत केे हर प्रांत, हर नगर, हर कस्बे पर हर भारत-पुत्र का समान अधिकार है। अपने ही देश के दूसरे राज्य में जाकर रोजी-रोटी कमाना न तो भीख मांगना है और न ही अपराध। समय की मांग है कि ऐसे तत्वों (वह चाहे किसी भी दल का बड़े से बड़ा नेता अथवा साधारण कार्यकर्ता ही क्यों न हो) को बिना किसी भेदभाव, बिना देरी, देशद्रोही घोषित करना चाहिए।

यह सही है कि हर राज्य विकसित होना चाहिए जहाँ रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हो, कानून-व्यवस्था से नागरिक सुविधाओं तक सब दुरुस्त हो। सभी को समान रूप से विकास का अवसर मिले लेकिन किसी प्रवासी को अपमानित करने का अर्थ है कि स्वयं को असक्षम घोषित करना। लाखों भारत-पुत्र जो विदेशों में रह कर न केवल जीविका अर्जित कर रहे हैं बल्कि अपनी मातृभूमि का गौरव बढ़ा रहे हैं, वे देश की अर्थव्यवस्था में भी अपना योगदान कर रहे हैं तो परप्रांतीयों के योगदान को भी कमतर नहीं आंका जा सकता। परिस्थितियों के कारण जब कोई प्रवासी बनता है तो वह स्वयं के विकास से पहले उस राज्य के विकास का परचम उठाता है। वह अपनी श्रमशीलता से केवल अपनी रोजी-रोटी ही नहीं सुनिश्चित करता बल्कि उस क्षेत्र के विकास का वाहक भी बनता है। दुनिया के सभी नगर, महानगर जिसमें दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, गांधीनगर आदि भी शामिल है, प्रवासियों के कठोर परिश्रम और साधना का ही परिणाम है। इसलिए श्रमशीलता का अभिनंदन करना चाहिए। वह अपना खून पसीना बहाकर कुछ पाता है लेकिन राजनैतिक लाभ के लिए शरारती तत्व ऐसी विभाजन रेखा खींचकर भी स्वयं को 'भारत भाग्य विधाता' घोषित करते हैं।

घुसपैठिये बंगलादेशियों अथवा रोहिंग्याओं के लिए छाती पीटने वाले भारत में भारतीयों पर हमले पर मौन रहते हैं। क्या यह आश्चर्य नहीं है कि अति सक्रिय हमारे न्यायमूर्ति ऐसे विभाजक वक्तव्यों का स्वयं संज्ञान नहीं लेते। इन दिनों देश भर में 'स्वच्छता अभियान' चलाया जा रहा है। क्या सार्वजनिक जीवन में रहने वालों की मानसिकता के शुद्धिकरण का अभियान नहीं चलाया जाना चाहिए? ताकि वे अच्छी तरह समझ सके कि 'भारत का हर प्रांत हर भारतीय का है। हर भारतीय नागरिक को देश के किसी भी प्रांत में जाने, कमाने, घूमने, बसने का अधिकार है। एक ओर कश्मीर में अस्थायी कहे जाने वाली धारा 370 शेष भारतीयों के अधिकार बाधित करती है, को समाप्त करने की मांग हो रही है तो दूसरी ओर कुछ 'भस्मासुर' सिर उठा रहेे हैं। इन विषधरों का फन बिना देरी किये कुचलना ही होगा।

हर जाति, समुदाय, क्षेत्र का व्यक्ति और क्षेत्र के उत्पाद, रीति-रिवाज भारत की उन्नति के घटक है। करोड़ों हाथ मिलकर देश की तस्वीर बदल सकते हैं तो ये हाथ देश की एकता पर प्रहार करने वालों की खबर भी ले सकते हैं। स्वामी रामतीर्थ भारत को एक शरीर मानते थे, जिसके किसी भी अंग पर चुभन, दर्द सारे शरीर की पीड़ा है। जब तक एक भी क्षेत्र पिछड़ा है, एक भी भारत-पुत्र उपेक्षित है, हम चैन से नहीं बैठ सकते। राष्ट्र देवो भव: की सद्भावना कायम रखना हम सभी का राष्ट्रीय कर्तव्य है। शांति व सौहार्द की रक्षा करना कार्यपालिका से न्यायपालिका तक सभी की जिम्मेवारी है। राजनैतिक लाभ-हानि के लिए वातावरण को दूषित करने वालो को अलग-थलग करना ही होगा। अंत में मित्र शायर मुनीर आलम की की पंक्तियाँ-

वक्त की खाइयों से पूछूँगा

दिल की गहराइयों से पूछूँगा

सूखने लग गये क्यों सुर्ख गुलाब

घर की अंगनाइयों से पूछूँगा

खून किसका बहा है सड़कों पर

शहर के भाइयों से पूछूँगा

रात भर थे कहाँ अंधेरे में

स्याह परछाइयों से पूछूँगा

दोस्त ही दोस्त का हुआ दुश्मन

वजह बलवाइयों से पूछूँगा

कोयलों की सदा कहाँ खोई

सब्ज अमराइयों से पूछूँगा

पल में सच तो हलाक करती हैं

राज रूस्वाइयों से पूछूँगा

इतनी खूँखार क्यों हुई सियासत

मुल्क के सांइयों से पूछूँगा।

-डा. विनोद बब्बर

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