आप सोचते हैं और आपके ही जैसे सभी लोग सोचते हैं, क्या सोचना, कभी सत्य हुआ है? आप लोग सोचते हैं ईश्वर के बारे में, उस सोचने को ही समझते हैं कि ईश्वर...
आप सोचते हैं और आपके ही जैसे सभी लोग सोचते हैं, क्या सोचना, कभी सत्य हुआ है? आप लोग सोचते हैं ईश्वर के बारे में, उस सोचने को ही समझते हैं कि ईश्वर मिल गया। सोचना, अनुभव नहीं है, सुनना अनुभव नहीं है। कथा सुन लेने से मोक्ष नहीं मिल सकता, परमात्मा के सोच लेने से परमात्मा नहीं मिलता। भोजन के बारे में सोच लेने से पेट नहीं भरता। समुद्र का पानी खारा है, केवल किसी के द्वारा यह बताने से उसका स्वाद अनुभव नहीं हो सकता। सोच-सोचकर आप लक्ष्य पर नहीं पहुंच सकते। लक्ष्य सुन-सुनकर आप कभी लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते। लक्ष्य जानने और विचारने में अन्तर है। जानने में तत्व ज्ञान है, विचारने में नहीं, विचार शब्दों का संग्रह है, शब्दों से कोई परमात्मा से नहीं मिल सकता। शब्द परमात्मा नहीं हैं। कितना भी सोचते रहें, अनुभव नहीं होगा, पर यह भ्रम अवश्य हो जायेगा कि आप जानते हैं और यही तो हो रहा है। क्या केवल सोचकर कहीं कोई पहुंचा है, कोई कितना भी सोचे, पहुंचने के लिये जाना होगा, चलना होगा। परमात्मा को पाने के लिये उसमें रमना होगा। परमात्मा का साक्षात्कार करने के लिये उसके अस्तित्व में खोजना होगा।


