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  • अनमोल वचन

    तुलसीदास कहते हैं कि परोपकार के समान कोई धर्म नहीं और दूसरों को पीडा देना ही अधर्म है। धर्म होगा तो काम, क्रोध, द्वेष, ईष्र्या जैसे अवगुण नहीं होंगे, क्योंकि धर्म से चित्त परिमार्जित हो जाता है। शुद्ध चित्त में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न होगा ही नहीं। अन्तर्मुखता ही धर्म की कसौटी है। वृत्ति के...

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    भारतीय संस्कृति गुणों की खान है। सदैव इस बात पर जोर दिया जाता है कि मनुष्य हर प्रकार से पवित्र आचरण करे, संयम से जीवन जिये, तप और साधना से जीवन को चमकाये। गुण की सर्वत्र पूजा होती है। आज के परिवेश में इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। आज मानव मूल्यों का पतन हो रहा है। भौतिकता का चहुं...

  • अनमोल वचन

    आदमी धन, पद, यश रूपी कितनी भी उपलब्धियां क्यों न हासिल कर ले, उसे पूर्ण सन्तुष्टि नहीं मिलती, यहां तक कि कोई उपलब्धि हासिल करने में हमने वर्षों गंवाये होते हैं, उसकी प्राप्ति का सुख उठा भी नहीं पाते कि फिर अतृप्ति और रिक्तता का आभास होने लगता है और हम ज्ञात अज्ञात के क्षितिज पर नजरें टिकाते सुख...

  • अनमोल वचन

    व्यक्ति की प्रतिष्ठा का आंकलन उसके जीवन मूल्यों से किया जाता है। सफलता के लिये जीवन मूल्यों को अपनाना नितांत आवश्यक है। वैदिक काल से होते हुए गौतम बुद्ध, स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द तक अनेक महापुरूष जीवन मूल्यों के कारण अमर हो गये, जीवन मूल्य व्यक्ति को सकारात्मक बनाते हैं। याद रखें जो...

  • अनमोल वचन

    आदमी का जीवन अनेक सत्यों, आदर्शों और नियमों द्वारा संचालित होता है। इन्हीं के द्वारा जीवन मूल्य स्थापित होते हैं। संसार के सभी महापुरूष और सफलतम व्यक्ति अपने ऊंचे आदर्शों और मान्यताओं के कारण ही समाज में गाथा बनकर अपना नाम रोशन करते हैं। समाज सदा ही ऐसे लोगों का अनुसरण करता है। रीढ विहीन सरीखा या...

  • अनमोल वचन

    श्रेष्ठ तथा सफल व्यक्ति वही है, जो अपनी असफलता के लिये दूसरों को दोषी नहीं ठहराता, न ही किसी असफल व्यक्ति का उपहास करता है। अपने अनुभवों के आधार पर ही सत्य-असत्य की परख करता है, जो पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर व्यवहार नहीं करता, प्रत्येक व्यक्ति का मूल्यांकन उसके गुणों के आधार पर ही करता है, वह...

  • अनमोल वचन

    हम सभी भारत मां की सन्तान हैं, जिसकी मिट्टी से हमारे शरीर की रचना हुई, जिसके अन्न, जल से हमारा पोषण होता है और इसी भारत मां की गोदी में समा जाना है। हम सब इसी मां भारती के त्रणी हैं। कोई ऐसा कार्य नहीं करना है, जो इससे द्रोह की संज्ञा में आये। इस माटी का कर्ज उतारने के लिये, इसकी उन्नति के लिये,...

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    मनुष्य योनि के कर्म सिद्धांत अति सूक्ष्म, गहन एवं जटिल हैं। यहां प्रारब्ध भोग भी पूरे होते हैं और नये कर्म भी बनते हैं। जैसे किसी का प्रारब्ध भोग उसके विवाह के रूप में आता है, तो उसका विवाह तो होगा। प्रारब्ध के अनुसार विवाह की दिशा, दशा तय होती है, सुखद या दुखद, इसी पर निर्भर होता है। विवाह से भोग...

  • अनमोल वचन

    जिन अवस्थाओं में, जिन योनियों में केवल क्रियाएं होती हैं, कर्म नहीं बनते, उन्हें भोग योनियां कहा जाता है। इन योनियों में भ्रमण कर जीव अपने प्रारब्ध भोग पूरे करता है। वहां उससे नये कर्म नहीं बन पडते, केवल पूर्व जन्मों का भोग होता है। शेर की योनि में शेर अपने नियत प्रारब्ध को भोगने आता है, वह...

  • अनमोल वचन

    क्रिया और कर्म दोनों का आपस में सम्बन्ध होते हुए भी दोनों भिन्न-भिन्न हैं। क्रिया भावना शून्य होती है, जबकि क्रिया के विपरीत कर्म में इच्छा, भावना, संस्कारों की प्रेरणा के साथ गहरे संकल्प की प्रधानता रहती है। क्रिया में जब इच्छा और भावना जुड जाती हैं तो वह क्रिया कर्म बन जाती है। इच्छा और भावना के...

  • अनमोल वचन

    कर्म की गति अति गहन हैँ इसकी गहनता को समझना दुष्कर एवं कठिन कार्य है। कर्म धारा में चलकर इंसान कब पशुता के गहरे कीचड में गिर जाये और कब देवत्व की ओर अग्रसर हो जाये पता नहीं चलता। पता तब चलता है, जब कर्म का परिणाम सामने आने लगता है। उस समय उसे भोगने के अतिरिक्त दूसरा कोई विकल्प शेष नहीं रहता। कर्म...

  • अनमोल वचन

    अपवाद हर क्षेत्र और हर परिस्थिति में पाये जाते हैं। सन्तान के विषय में भी अपवाद स्वरूप कई इष्टान्त ऐतिहासिक रूप से विद्यमान हैं। पुलस्त्य ऋषि के घर रावण, उग्रसैन के घर कंस और हिरण्यकश्यप के घर प्रह्लाद ने जन्म लिया, परन्तु सामान्यतया ऐसा नहीं होता, अपवाद तो अपवाद ही होते हैं, फिर भी यह बात सत्य है...

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