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  • अनमोल वचन

    नास्ति विद्या सम चक्षु, नास्ति सत्यम्समं तप: नास्ति राग समय् दुखम् नास्ति त्याग समय् सुखम्। संस्कृत के इस श्लोक का अर्थ है कि विद्या सम चक्षु नहीं है, सत्य के समान तप नहीं है, राग के समान दुख नहीं है और त्याग के समान सुख नहीं है। एक-एक वाक्य में एक-एक महान सत्य उद्घाटित हुआ है। वास्तव में बुद्ध...

  • अनमोल वचन

    मानव जीवन संघर्ष का ही दूसरा नाम है। यह फूलों की सेज नहीं, कांटों का ताज भी है। यहां सफलता के साथ असफलता, लाभ के साथ हानि, सम्मान के साथ अपमान, सुख के साथ दुख जुडे हुए हैं। केवल अपवाद रूप में ही यह सम्भव है कि कोई व्यक्ति बिना किसी बाधा के किसी कार्य में प्रथम बार ही सफल हुआ हो। इस सच्चाई को जानते...

  • अनमोल वचन

    स्वर्ग एक कल्पना है। उस कल्पित स्वर्ग की कामना आदमी क्यों करता है? वास्तव में हमें उस कल्पित स्वर्ग की आवश्यकता ही नहीं है। भगवान बुद्ध से एक बार लोगों ने पूछा 'भगवान क्या आप स्वर्ग में जायेंगे। उन्होंने कहा, नहीं मैं स्वर्ग में नहीं जाऊंगा, क्यों? मैं बार-बार जन्म लूंगा और बार-बार मेरी मृत्यु...

  • अनमोल वचन

    चिरकाल से ही स्वर्ग की कल्पना किसी अन्य लोक में की जाती रही है। स्वर्ग कहीं होता होगा, किसी ने देखा नहीं है। वह स्वर्ग हमें स्वीकार्य भी नहीं है, जहां वहां के रहने वालों को कोई काम नहीं, जहां हम निष्क्रिय रहेंगे, किसी की सेवा का अवसर नहीं, बिना उद्यम किये सब कुछ प्राप्त होगा, जिसकी कल्पना की...

  • अनमोल वचन

    स्वर्ग-नरक की कल्पना हम इस धरती से इतर अन्य लोकों में करते हैं। इसमें कोई अंश सच्चाई का नहीं है। वस्तुत: हमारे गृहस्थ ही, हमारे घर ही स्वर्ग-नरक की परिभाषा में आ जाते हैं। यदि आपने अपनी पत्नी को इस आंख से देखा है कि प्यार की देवी, त्याग की देवी, बलिदान की देवी, सब कुछ छोडकर, अपने मां-बाप को छोडकर...

  • अनमोल वचन

    हमारी अन्तरात्मा परमात्मा का ही अंश है। वह सर्वज्ञ हमारी अन्तरात्मा के माध्यम से हमें नित सही मार्गदर्शन करता रहता है। अन्तरात्मा की आवाज हम तभी सुन सकते हैं, जब मन शांत हो। जिस प्रकार स्थिर जल शांत होता है, स्थिर जल में फेंका गया कंकड उसमें तरंगें उत्पन्न कर देता है। लहरे पैदा कर देता है। उसी...

  • अनमोल वचन

    आदमी का मन अबोध है। उचित-अनुचित का वह ज्ञान नहीं रखता। उसकी स्थिति उस छोटे बच्चे की तरह है, जो केवल इच्छा करता है और उसकी पूर्ति की जिद माता-पिता से करता है, परन्तु आत्मा की स्थिति उस समझदार माता-पिता की तरह होती है, जो यह जानती है कि क्या उचित है और क्या अनुचित, क्या करना चाहिए और नहीं करना चाहिए।...

  • अनमोल वचन

    मनुष्य दो प्रकार की आवाजें सुनता है- एक मन की और एक अन्तरात्मा की। एक आवाज हमें सचेत करती है, दिशा-निर्देश देती है, गलत कार्य करने से रोकती है, तो दूसरी आवाज हमें बहकने देती है, भटकाती है। हम समझ नहीं पाते कि किसकी सुनें, किसकी मानें। हम जब अपनी अन्तरात्मा की आवाज को अनसुना करके मन की बात मानने...

  • अनमोल वचन

    कोई व्यक्ति जो आस्तिक है, चाहे वह किसी भी मत अथवा सम्प्रदाय का मानने वाला हो, यह अवश्य मानता है कि मनुष्य के कर्मों का फल अवश्य मिलता है। वह पुनर्जन्म में विश्वास करता हो अथवा न करता हो, उसे यह ज्ञात है कि परमात्मा की व्यवस्था के अनुसार कर्मों के फल को टाला नहीं जा सकता। बुरे कर्मों का दुख रूप में...

  • अनमोल वचन

    सत्साहित्य के स्वाध्याय को इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि वह भी सत्संग की श्रेणी में ही आता है। किन्हीं परिस्थितियों के कारण यदि आदमी सत्संग में नहीं जा पाता तो उसे अच्छे साहित्य का स्वाध्याय करना चाहिए। वस्तुत: स्वाध्याय के माध्यम से हमारी विचार शक्ति को पोषण तथा बल मिलता है, दृष्टिकोण में...

  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले से एससी/एसटी कानून कमजोर हुआ : केंद्र

    नयी दिल्ली। केंद्र सरकार ने आज उच्चतम न्यायालय से कहा कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून से संबंधित उसके फैसले से देश में दुर्भावना, क्रोध एवं असहजता का भाव पैदा हुआ है।केंद्र सरकार की ओर से शीर्ष अदालत के समक्ष लिखित तौर पर रखे गये पक्ष में एटर्नी जनरल ने इसे बहुत ही संवेदनशील...

  • अनमोल वचन

    सभी जीवों में बन्दर को सबसे अधिक नकलची माना गया है, किन्तु आदमी भी कम नकलची नहीं है। नकल का अभ्यास कर करके आदमी बडा होता है, समझदार बनता है। जैसे हम बचपन में जो भी बोलना, लिखना, पढना आदि सीख जाते हैं, वह सब नकल उतारकर ही करते हैं। जब सीख जाते हैं तो फिर नकल उतारना बंद कर देते हैं। फिर उस सीखे हुए...

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