रेपिस्टों के खिलाफ और सख्त कानून की जरूरत

रेपिस्टों के खिलाफ और सख्त कानून की जरूरत

-डॉ. कविता सारस्वत

मध्यप्रदेश के उज्जैन में नाबालिग बच्ची के साथ रेप के एक मामले में अदालत में चार्जशीट दाखिल होने के 24 घंटे के अंदर ही सजा का ऐलान कर एक मिसाल कायम किया है। देश में जब लोगों को न्याय पाने में सालों तक अदालतों में चक्कर लगाना पड़ता है, तब किसी आपराधिक मामले में महज 24 घंटे के अंदर में सजा का ऐलान हो जाना बहुत बड़ी बात है। इस रेप केस में सोमवार को ही चार्जशीट पेश की गयी थी और अदालत ने उसी दिन दोषी को सजा भी सुना दी। बलात्कार के किसी भी मामले में इस मामले को सबसे तेज ट्रायल और सजा के निर्धारण के तौर पर देखा जा सकता है।

मध्यप्रदेश में इसके पहले भी बलात्कार के मामलों में काफी तीव्रता के साथ सुनवाई होने के कई उदाहरण सामने आ चुके हैं। इसी महीने आठ तारीख को मध्यप्रदेश के ही दतिया में अदालत ने बच्ची के साथ रेप के दोषी को तीन दिन की सुनवाई के बाद ही मौत होने तक कैद की सजा का ऐलान किया था। इसके पहले छतरपुर में बलात्कार के एक केस को कोर्ट ने 27 दिन की सुनवाई के बाद रेयरेस्ट ऑफ रेयर मानते हुए दोषी को फांसी की सजा सुनायी थी। इसके पहले आठ जुलाई को मध्य प्रदेश के सागर जिले में रेप के मामले का ट्रायल 46 दिनों में पूरा करके दोषी को अदालत ने मौत की सजा सुनायी। मंगलवार को ही बहुचर्चित मंदसौर रेप केस में अदालत ने 56 दिन में ही दोनों दोषियों को फांसी की सजा सुना दी। इसी साल राजस्थान में भी अलवर जिले की अदालत ने सात महीने की मासूम के अपहरण तथा रेप किए जाने के मामले में दोषी को फांसी की सजा देने का ऐलान किया था।

ऐसे ही मामलों का उल्लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से भी किया था। मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाओं की त्वरित सुनवाई और सजा का निर्धारण ऐसा मामला है, जो लोगों के मन में डर की भावना पैदा कर सकता है। आमतौर पर अपराध करने वाले व्यक्ति के मन में एक भावना यह भी होती है कि अगर उसकी गिरफ्तारी हो भी गयी, तो उसे कुछ दिन में जमानत मिल ही जायेगी। उसके बाद फिर लंबे समय तक केस चलने के बाद ही सजा की नौबत आयेगी। इस लंबी अवधि में वह अपने वकील की मदद से कोई जोड़ तोड़ कर बरी होने का रास्ता भी तलाश सकता है। अदालतों में होने वाली देरी की वजह से भी अपराधियों के मन में एक निश्चिंतता का भाव होता है। लेकिन मध्यप्रदेश और राजस्थान से बलात्कार के मामलों में फास्ट ट्रैक सुनवाई की घटनाओं ने पूरे देश के सामने एक उदाहरण पेश किया है। स्वाभाविक रूप से इनसे अपराधियों के मन में डर की भावना भी बनेगी। जरूरत अदालत के इन फैसलों को ढंग से प्रचारित करने की है, ताकि पूरे देश में इस बात का संदेश दिया जा सके कि अगर किसी ने भी अपराध करने की जुर्रत की, तो उसे तत्काल ही अपने अपराध के एवज में सजा मिल सकती है।

जहां तक मध्य प्रदेश के उज्जैन में बच्ची से बलात्कार करने वाले नाबालिग आरोपित को सिर्फ 24 घंटे के अंदर सजा सुनाए जाने की बात है, तो इसमें एक बात पर ध्यान दिया जाना बहुत जरूरी है। इस मामले का आरोपी भी 14 साल का एक किशोर था। इसलिए जुवेनाइल कोर्ट ने उसे महज दो साल की सजा सुनायी। यदि यह मामला किसी वयस्क आरोपित का होता, तो उसकी सजा की अधिकतम फांसी तक भी हो सकती थी। समाजशास्त्रियों का एक वर्ग शुरू से ही मानता रहा है कि रेप जैसी घटनाओं के लिए सरकार को जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट या जुवेनाइल कोर्ट का सहारा नहीं लेना चाहिए। किसी अल्पवयस्क या नाबालिग के लिए रेप जैसा अपराध करना कोई सहज बात नहीं है। रेप करने वाला अपराधी उम्र में भले ही छोटा हो लेकिन मानसिकता उसकी बड़ी हो चुकी होती है। यानी मानसिक तौर पर वह परपक्व हो चुका होता है।

जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट का उद्देश्य बच्चों को अनजाने में किए गए अथवा अपराध की गंभीरता को नहीं समझने के कारण किये गये अपराध के कारण होने वाली कठोर सजा से बचाना है। कानून मानता है कि बच्चे अनजाने में अपराध कर बैठते हैं और उन्हें इस बात का एहसास भी नहीं होता कि वे क्या अपराध करने जा रहे हैं। इसलिए उन्हें वयस्कों के समान सजा नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन बलात्कार का मामला ऐसा नहीं है कि उसे अनजाने में किया गया अपराध माना जाये। बलात्कारी अच्छी तरह जानता है कि वह क्या करने जा रहा है।

इस मामले में 14 साल के जिस आरोपी को दो साल की सजा सुनायी गयी थी, उसने अदालत में स्वीकार किया था कि वह पहले भी ऐसा करना चाहता था, लेकिन उसे इसका मौका नहीं मिल सका था। उसने अदालत को ये भी बताया कि वो जानता था कि यह एक गलत काम है, इसीलिए उसने इस अपराध के लिए मौके का इंतजार किया। बाद में मौका मिलते ही उसने एक बच्ची को अपना शिकार बना लिया। अपने अपराध की गंभीरता को जानने की वजह से ही आरोपित रेप के बाद अपने गांव से फरार हो गया था। स्पष्ट है कि उसे अपने दुष्कृत्य का पहले से ही एहसास था, इसीलिए वो रेप करने के बाद गांव छोड़कर भागा। अगर उसने अनजाने में या बाल-सुलभ जिज्ञासा की वजह से ये अपराध किया होता, तो वह गांव छोड़कर फरार कतई नहीं होता और न ही इस घटना को अंजाम देने के लिए किसी मौके का इंतजार करता।

देश के नीति निर्धारकों को रेप के मामलों में इस बात पर भीध्यान देना चाहिए कि आरोपित की उम्र भले ही कम हो, लेकिन अगर वह मानसिक तौर पर परिपक्व है तथा सोच-समझ कर अपराध को अंजाम दे रहा है, तो उसे जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट का फायदा उठाकर बचने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। दिल्ली में हुए निर्भया कांड में भी जिस दोषी के कारण निर्भया की जान गयी, वह भी एक नाबालिग था, लेकिन अभी जहां निर्भया के बाकी दोषी मौत का इंतजार कर रहे हैं, वही वह जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट की सुविधा का लाभ लेते हुए कोर्ट से मामूली सजा मिलने के बाद आजाद हो चुका है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट को लेकर एक बार फिर पूरे देश में समग्र तौर पर विचार किया जाये और बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों के लिए दोषियों को सजा देने में किसी भी तरह की नरमी ना दिखायी जाये।


Share it
Top