तलाकशुदा दंपति और उनके बच्चे

तलाकशुदा दंपति और उनके बच्चे

पति-पत्नी में तलाक क्यों और कैसे हुआ, इस सब की अलग-अलग कहानी हो सकती है लेकिन यह एक कड़वा सच है कि इसमें बेेचारे बच्चे पिसते हैं। बिना किसी कसूर के वे एक खुशहाल जि़न्दगी और सुखी परिवार के सुख से वंचित रह जाते हैं।

यह एक टेढ़ा सवाल है कि किसका सुख सर्वोपरि माना जाए, बच्चों का या पेरेन्ट्स का। सारी सहानुभूति निस्संदेह बच्चे ले जाते हैं। रिश्तेदार, जान पहचान वाले, समाज, सभी बच्चों की तरफ हैं। देखा जाए तो इसमें गलत भी कुछ नहीं।

ज्यादातर बच्चे तलाकशुदा मां के साथ ही रहते हैं। मां को लेकर वे बेहद 'पजेसिव' हो जाते है। मां का किसी अंकल से ज्यादा घुलना मिलना वे पसंद नहीं करते। उनमें असुरक्षा की भावना घर कर जाती है।रॉयल बुलेटिन की नई एप प्ले स्टोर पर आ गयी है।royal bulletin news लिखे और नई app डाउनलोड करें

कभी-कभी तलाकशुदा मां के दूसरा विवाह कर लेने की स्थिति में बच्चे पिता के साथ रहते हैं। जिस तरह मां का प्रेमी कभी-कभी बेटे का प्रतिद्वंद्वी बन जाता है उसी तरह पिता की प्रेमिका बेटी के लिए सौत से कम नहीं होती। अनाथ बच्चों की त्रसदी समझ में आती है लेकिन ऐसे बच्चों का ट्रॉमा भी अनदेखा नहीं किया जा सकता जो मां बाप के जीवित होते हुए भी एक के साए से महरूम हैं। शटल काक की तरह इधर से उधर डोलते हैं या फिर चाह कर भी मां बाप की आपसी नफरत के कारण उनमें से एक से मिल नहीं पाते।

बच्चों के साथ न्याय करते-करते यह भी नहीं होना चाहिए कि हम उनके जन्मदाताओं को जीना भूलकर सिर्फ बच्चों के लिए ही जीने का उपदेश दें, चाहे वो बच्चे जवान होते ही उन्हें पुराना सामान समझने लगें। उनकी तो जवानी और बुढ़ापा दोनों ही बेकार हो गए।

शादी गलत व्यक्ति से हो जाए तो औरत की मुसीबतों का अंत नहीं। किसी की नजऱ उसके बैंक बैलेंस पर तो किसी की उसकी जवान होती बेटी पर हो सकती है, इसलिए औरत को यह कदम बहुत सोच समझकर ही उठाना चाहिए। ऐसे भी केस हैं जहां दूसरी शादी औरत उसके बच्चे के लिए खुशियां, सुरक्षा व संतुष्टि लेकर आती है।

सौतेली मां का नाम बदनाम है क्योंकि अपनी मां अपनी ही होती है और उसके प्यार का कोई जोड़ नहीं होता। वह अच्छी और भली औरत हो सकती है लेकिन ऐसा कम ही होता है। फिर जब उसके अपने बच्चे हो जाते हैं तो स्वाभाविक है कि उसके मन में पक्षपात आ जाता है। जब मां दूसरी हो तो बाप तीसरा हो जाता है, इस कथन में काफी हद तक सच्चाई है। इन सब बातों का हल क्या हो सकता है? समस्या जटिल है लेकिन बढ़ती जा रही है। अब न स्त्री में धैर्य है न पुरूष में। बराबरी का दावा स्त्री को महंगा पड़ रहा है। अहं टकराते हैं और परिवार बिखर जाते हैं।

स्त्री भी अपनी जगह कई बार ठीक होती है। वह कमा रही है, फिर भी वह पुरूष की ज्यादती क्यों सहे। पुरूष को उसकी अकडफ़ूंक पर एतराज है। रॉयल बुलेटिन की नई एप प्ले स्टोर पर आ गयी है।royal bulletin news लिखे और नई app डाउनलोड करें

उनकी आपसी लड़ाई का खमियाजा बच्चे क्यों भुगतें। कभी वे गलत राह पर चल पड़ते हैं, भटक जाते हैं और जीवन तबाह कर लेते हैं क्योंकि बगैर सही माहौल के कोई भी बच्चा एक नॉर्मल व्यक्ति नहीं बन पाता।

मां बाप को जो करना है, बच्चे होने के पहले करें लेकिन बच्चे होने के बाद उनकी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को स्नेह व प्यार देकर एक स्वस्थ वातावरण दें, एक टूटते हुए घर की त्रसदी नहीं। दूसरी शादी के लिए बच्चों को पहले तैयार करें, साथी को आज़माएं। सारी ऊंच नीच देख समझकर यह कदम उठाएं क्योंकि नीतिशास्त्र के अनुसार भी ऐसा कोई नियम तो है नहीं कि सुख की चाह करना या उसकी खोज करना पाप है। बच्चों के पीछे जीवन होम करने जैसी महान त्याग की बात आज के संदर्भ में बेमानी है।

- उषा जैन 'शीरी'

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