बाल कहानी: स्वाभिमान

बाल कहानी: स्वाभिमान

सेठ बंसीलाल उस कस्बे के बड़े व्यापारी हैं। उनकी तेल मिल है, गैस एजेन्सी है और दूर दूर तक फैला व्यापार है। उन्हें समय ही नहीं मिलता। वे व्यस्त रहते हैं। उनकी कार उन्हें आस पास के क्षेत्र में प्रतिदिन लाती ले जाती है।

आज वे चिन्ताग्रस्त हैं। उनका एक बैग पता नहीं कहां गिर गया था चोरी चला गया, वे समझ नहीं पा रहे थे। उस बैग में उनके कुछ महत्त्वपूर्ण कागजात थे। उन कागज पत्रों के कारण वे परेशान थे। उनकी परेशानी उनके चेहरे पर दिख रही थी। उनकी मां ने उन्हें देखा तो बोली बेटा! चिन्ता करने से क्या होगा। चीज मिल तो नहीं जाएगी। तुम भगवान पर छोड़ दो, वह अच्छा करेगा।

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मां की बात खत्म हुई और फोन की घंटी बजी। सेठ बंसीलाल ने उठाया। उधर से आवाज आई, सेठ साहब, आपका एक बैग मुझे मिला है। वह सड़क पर पड़ा मिला है। आप मेरे निवास पर आकर ले जाइए। मेरी मां बीमार है नहीं तो मैं खुद आकर दे जाता। सेठ बंसीलाल ने पता पूछा तो उन्होंने बता दिया। सेठ बंसीलाल प्रसन्न हो गए। मां से बोले-मां, भगवान की कृपा से बैग मिल गया है।

सेठ बंसीलाल अपनी कार से चल दिए। जो पता बताया था, उसको खोजने लगे। कस्बे के बाहर दूर एक झोपड़ा दिखा। वहां पूछा, भैय्या नंदलाल का मकान यहां है? अन्दर से आवाज आई-यही है। नन्दलाल बाहर आया। दीन हीन मैला कुचेला अत्यंत गरीब दिखा वह। उसने सेठ बंसीलाल से कहा-कहिए क्या सेवा की जाए आपकी?

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सेठ बंसीलाल ने अपने बैग की बात बताई और कहा कि उसमें यह यह सामान है। आपका फोन आया था।

नन्दलाल झोंपड़े में गया। बैग उठाकर लाया। बोला - सेठ साहब, यह है आपका बैग। सम्भाल लीजिए। इसमें दस हजार रूपए थे। मेरी मां अस्पताल में भर्ती है। मुझे रूपयों की आवश्यकता थी, इसलिए इसमें से दौ सौ रूपये निकालकर मैं खर्च कर चुका हूं। वह मैं आपको बाद में चुका दूंगा। शेष सामान आप देख लें।

सेठ बंसीलाल मुस्कुराए। उन्होंने सामान देखा और अपने निवास पर आ गए। मां इंतजार कर रही थी। सेठ बंसीलाल ने पूरी कहानी सुनाई और कहा-मां, नंदलाल को नीयत भी खराब हुई तो दो सौ रूपये पर। इससे अधिक तो मैं इनाम के दे देता।

मां ने सुना तो गुस्सा खा गई, बोली बेटा, गरीब पर ऐसा आरोप लगाना तुम्हें शोभा नहीं देता। वह गरीब होकर भी बहुत भला और ईमानदार है। सोचो उसकी नीयत में खोट होता तो वह पूरे दस हजार रख लेता। तुम क्या करते। फिर मां ने कहा-देखो बेटा, मेरी सलाह है कि तुम जाओ और अस्पताल में उसकी मां से मिलो। ऐसे भले आदमी की मदद करना तुम्हारा कर्तव्य है।

सेठ बंसीलाल को यह सलाह उचित लगी। वे कार में बैठकर पुन: अस्पताल गए। नंदलाल से भेंट हो गई। उसकी मां से मिले और सहायता का प्रस्ताव किया किन्तु नंदलाल ने मना कर दिया। बोला-सेठ साहब, धन्यवाद, मैं अधिक उधारी नहीं कर सकता। चुकाना तो मुझे पड़ेगा। दान लेना नहीं चाहता। आपके दो सौ रूपये तो मेरे सिर पर हैं ही।

सेठ बंसीलाल को यह सुन आश्चर्य हुआ। उसने एक गरीब के स्वाभिमान की ऐसी कल्पना नहीं की थी। वे फिर डॉक्टर से मिले और दवा आदि के लिए गुप्त सहायता की व्यवस्था की। उनके जीवन में यह नया अनुभव था। घर आकर सब हाल मां को सुनाया। मां प्रसन्न हुई। उसे संतोष हुआ कि आज बेटे ने एक अच्छा काम किया।

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समय बीतता चला गया। एक वर्ष गुजर गया। सब यादें विस्मृति में खो गई। सेठ बंसीलाल अपने धंधे में व्यस्त हो गए। एक दिन पोस्टमैन आया। वह दो सौ रूपये का मनीआर्डर लाया था। देखा तो भेजने वाला नंदलाल था। उन्हें कुछ याद आया। संदेश में लिखा था- आपके उधारी के रूपए भेज रहा हूं। ब्याज नहीं दे पा रहा हूं। मां नहीं रही। मैं कस्बा छोड़ चुका हूं। विलम्ब के लिए क्षमा करें। नंदलाल।

सेठ बंसीलाल ने हस्ताक्षर कर रूपए ले लिए। जीवन में पहली बार वे एक गरीब मेहनतकश के आगे बौने लग रहे थे। वे इन दो सौ रूपए की वापसी की कल्पना भी नहीं करते थे। उन्हें लगा श्रम के पसीने की यह खुशबू है। एक ऐसी खुशबू है जिसके आगे दुनिया की सब सुगंध फीकी है।

उन्होंने बटुए में रूपए रखे। उन्हें अपनी मां याद आई जिसने कहा था कि वह गरीब होकर भी बहुत भला और ईमानदार है। सेठ सोच रहे थे कि अगर ऐसा बैग उन्हें मिलता तो वे क्या करते।

- सत्यनारायण भटनागर

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