बाल कहानी: मेरी बला से

बाल कहानी: मेरी बला से

जंगल में एक हरा-भरा पेड़ था। उसकी आंखों से आंसू टपक रहे थे। पेड़ के आंसुओं को देखकर उड़ते हुए गरूड़ पक्षी ने पेड़ से पूछा, 'अरे मित्र, तुम रो क्यों रहे हो ? क्या मैं तुम्हारी कुछ सहायता करूं ?

पेड़ बोला, 'भाई गरूड़, जंगल में सभी वृक्षों पर घोंसले हैं जिनमें छोटे-छोटे बच्चों की चहचहाहट है पर मेरी डालों पर एक भी घोंसला नहीं है। इसीलिए मैं बहुत दुखी हूं। तुमको तो गरूडऱाज भी कहा जाता है। जिस वृक्ष में तुम रहते हो, उसमें ढेर सारे पक्षी तुम्हारी छत्रछाया में आकर रहने लगते हैं। क्या तुम मेरी डाल पर अपना घोंसला नहीं बना सकते?

पेड़ की बात सुनकर गरूड़ को दया आ गई। उसने अपना घर पेड़ की डाल पर बना लिया। बहादुर गरूड़ का घर देखकर ढेर सारे पक्षियों ने भी वहां अपने घोंसले बना लिए। गरूड़ के कारण पक्षियों को अब किसी भी चील या बाज आदि का खतरा न था। सभी पक्षी बहादुर गरूड़ का कहना मानते थे।

फिर एक दिन गरूड़ ने पेड़ से कहा, 'मित्र, अब तो तुम्हारी डालों में ढेर सारे घोंसले हैं। मुझे अपने मित्रों से मिले बहुत समय हो गया है, अत: मैं कुछ समय के लिए यहां से जा रहा हूं।

गरूड़ अपने मित्रों से मिलने चला गया। दूसरे दिन एक कठफोड़वे का बच्चा उडऩा सीख रहा था, वह पेड़ से नीचे फुदका। वहां उसे छोटे-छोटे कीड़ों की एक कतार दिखी। उसने ध्यान से देखा। कीड़े पेड़ की एक डाल में छेद करने में जुटे हुए थे। बच्चे ने मां से कहा, 'मां...मां...., देखो ये कीड़े हमारे पेड़ में क्या कर रहे हैं ?

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वह बोली, 'वे जो कुछ कर रहे हैं, करने दे। तू जल्दी-जल्दी उडऩा सीख।

'पर मां, वे तो पेड़ की डाल में छेद कर रहे हैं, बच्चे ने जिद की।

मां ने बच्चे को एक चपत लगाई और फिर उसको लेकर उड़ गई। उधर पेड़ को अपनी शाखा में दर्द महसूस हुआ। उस शाखा में हरियल तोते रहते थे। पेड़ ने उससे कहा, 'अरे देखो, मेरी डाल में क्या हो रहा है। मैं दर्द से परेशान हूं।

हरियल तोते नीचे उतरे। उन्होंने वहां पर ढेर सारी दीमक को पाया। वे शाकाहारी थे। उनकी चोंचें भी मुड़ी हुई थीं। अत: दीमक का सफाया करना उनके बस की बात न थी। उन्होंने गौरैया से कहा, 'बहन, हमारी डाल में दीमक ने हमला बोल दिया है। तुम अपनी पैनी चोंच से उनको मार भगाओ।

गौरैया ने कहा, 'मेरी बला से .....लगने दो दीमक, वह तो तुम्हारी डाल पर लगी है..... मैं क्यों मेहनत करूं ?

सात-आठ दिन में डाल सूख गई। पत्ते मुरझा गए। तोतों के छिपे हुए घोंसले साफ-साफ दिखाई देेने लगे। अब तोतों को भय हो गया कि उनके नन्हे-नन्हे बच्चों पर हमला हो सकता है लेकिन पेड़ के दूसरे पक्षी निश्ंिचत थे। उन्होंने यह जानने की बिलकुल कोशिश न की कि डाल सूख कैसे गई?

दीमक ने अंदर ही अंदर पेड़ के तने व अन्य डालों पर भी हमला बोल दिया। पूरा का पूरा पेड़ सूखने लगा। अब घबराकर सब पक्षी दीमक मारने आए पर अब तक बहुत देर हो चुकी थी। दीमक पेड़ के अंदर प्रवेश कर चुकी थीं। अब उनको समाप्त करना संभव न था।

कुछ ही दिनों में पूरा का पूरा पेड़ सूखकर कांटा हो गया। हरियल तोतों ने कहा, 'तुम सब लोगों की लापरवाही के कारण यह अनर्थ हुआ है। यदि कठफोड़वा, गौरैया या मैना ने साथ दिया होता तो दीमक शुरू में ही मारी जातीं पर सबने हमारी डाल पर किए गए दीमक के हमले को मात्र तोतों की ही समस्या समझा। इस प्रकार दुश्मन को हमारे घर में घुसने का मौका मिल गया। सच, यदि हम मेंं एकता व भाईचारा होता तो हमें आज यह दिन न देखना पड़ता, 'कहते-कहते हरियल तोतों का गला भर आया।

'सच, यदि किसी छोटी-सी समस्या को अनदेखा कर दिया जाए तो वह एक बड़ी समस्या बन सकती है, यह बात सभी पक्षियों की समझ में आ चुकी थी पर अब क्या हो सकता था। उनकी लापरवाही से उनके घर उजड़ चुके थे।

- नरेंद्र देवांगन

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