बाल कहानी: जूते के आविष्कार की कहानी

बाल कहानी: जूते के आविष्कार की कहानी

आजकल हम अपने पैर की सुरक्षा के लिये कवच के रूप में जूते का प्रयोग करते हैं लेकिन क्या कभी हमने इसके निर्माण या आविष्कार पर ध्यान दिया है। उत्तर आयेगा नहीं लेकिन जूते की खोज भी आश्चर्यनक है।

जूतों का निर्माण सबसे पहले मिश्र में हुआ था। इन जूतों का तला किसी चमड़े का या पानी में पाये जानेवाले एक खास किस्म के पौधे का होता था। इन चीजों के तल्ले को पट्टी के साथ पैर से कस लिया जाता था। यह बात ईसा से 2000 वर्ष पहले की है।

जूतों के बारे में भारत में भी एक कहानी प्रचलित है। एक बार एक राजा कुछ जिद्दी स्वभाव का था। वह प्रजा के समाचार लेने गुप्त रूप से घूम रहा था। घूमते घूमते लकड़ी की खड़ाऊं पहने हुये उसके पैर खराब हो गये। उनमें फफोले पड़ गये।

राजा दर्द के मारे नाराज होकर मंत्रियों से बोला कि ऐसी कोई वस्तु खोजी जाये जिसके उपयोग से पैदल चलने में सुविधा मिले व धूल भी न उडऩे पाये। राजा के आदेश से सभी लोग परेशान थे। दिन भर नौकर पानी छिड़काव, सफाई करते और धूल फिर भी आ जाती थी। मंत्री ने राज संकट दूर करने के लिए इनाम की घोषणा कर दी। इस पर भी समस्या का निदान न हो सका।

एक दिन एक वृद्ध पुरूष आया। उसने राजा के पैरों का नाप लिया और चमड़े के जूते पहना दिये।

इस पर राजा बहुत खुश हुआ। वह आराम से पैदल घूमता और उसे तनिक भी दुख न होता था। राजा ने बहुत धन उस व्यक्ति को दिया। यह जूतों के प्रचलन की प्रथम सीढ़ी थी हिन्दुस्तान में।

इसी तरह ठंडे देशों में लोग चमड़े के थैलों में घास बिछाकर पैरों में पहनते थे। इस थैले को पैर के ऊपर रस्सी से कस लिया जाता था। धीरे धीरे सुविधा अनुसार जूतों के डिजाइन में भी परिवर्तन हुआ। सोलहवीं शताब्दी में जूते आगे से बहुत चौड़े होते थे। सत्रहवीं शताब्दी में ऊंची एड़ी के जूतों का फैशन चला। फिर 18वीं शताब्दी में ऐसे जूतों का प्रचलन बंद हो गया था लेकिन समय के गुजरते ऊंचे एड़ी के जूते हील टाइप पुन: चलन में आ गये थे।

भारत में चमड़े के जूतों का इतिहास सन् 1550 से शुरू हुआ। बताया जाता है कि अकबर के समय में अरब देशों से हींग मंगाई जाती थी। यह हींग ऊंट के चमड़े से बनी मशकों में लाई जाती थी। अकबर की राजधानी आगरा में हींग की बहुत बड़ी मण्डी थी। धीरे-धीरे व्यापारियों को लगा कि खाली मशकों को फेंकने की बजाय उनसे जूतों का निर्माण किया जा सकता है। इस तरह हींग की मण्डी जूतों की मण्डी बनी। आज यह जूतों की सबसे बड़ी मण्डी है। रॉयल बुलेटिन की नई एप प्ले स्टोर पर आ गयी है।royal bulletin news लिखे और नई app डाउनलोड करें

आज एक अनुमान के अनुसार लगभग 5000 जूतों के निर्माण की छोटी छोटी दुकानें हैं तथा 250 के लगभग मध्यम श्रेणी के कारखाने हैं। 150 कारखाने पूर्ण रूप से जूते का उत्पादन कर रहे हैं। आगरा जूता मण्डी में एक सूत्र के अनुसार 50 हजार कारीगर जूता निर्माण उद्योग में लगे हुये हैं। अपने निर्माण काल से 95 से 100 वर्ष के अंदर यहां के जूते विदेशों को आयात निर्यात होने लगे थे।

भारत में जूता बनाने की कई प्रसिद्ध कंपनियां हैं। ये कंपनियां आजकल चमड़े के अलावा, फोम, कृत्रिम चमड़ा, प्लास्टिक, रबर तथा कपड़े के जूते बनाती हैं। अब तो नये आविष्कार के अनुसार प्लास्टिक की पतली सतह से ढके हुये चमड़े के जूते बनने लगे हैं जिनमें पालिश करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

इसी प्रकार जूता निर्माण प्रक्रिया भी बड़ी रोचक है। दयाल बाग, आगरा के एक प्रशिक्षण के अनुसार, मरे हुये जानवर की खाल से जूते चप्पल बनाये जाते हैं। यह चमड़ा जानवरों से दो तरह से निकाला जाता है, एक तो उन जानवरों से जो अपने आप मरते हैं और दूसरा तरीका है कसाईखानों द्वारा जानवर काटे जाते हैं।

सबसे पहले पशु की खाल को निकाल लेने के बाद सोडा नमक लगाकर रख दिया जाता है। 4 से 5 दिन बाद इस खाल को धोया जाता है और फिर खाल को हर्र तथा बहेड़े तथा अन्य रसायनों के घोल से भरे विशाल हौजों में डालकर ऐसी प्रक्रिया चार-पांच बार की जाती है। इस तरीके से खाल साफ और मुलायम होती जाती है। यह सारा काम लगभग 50 दिन के अन्दर होता है। इसके बाद खाल को सुखाकर उसे रंगा जाता है। एक जोड़ी जूता के निर्माण में 2.5 फीट चमड़ा तथा 2 फीट चमड़े का अस्तर लगता है।

इस तरह हजारों पापड़ बेलने के बाद अथक परिश्रम से जूता बनाया जाता है जिसे हम बिना हमदर्दी के बेहिचक पहने रहते हैं और तोड़ते फाड़ते रहते हैं। काश पहनने वाले भी जूते बनाते होते तो वे जूतों की यह दुर्दशा न करते।

- एच.एन. सौनकिया

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