बाल कहानी: प्यासा पपीहा

बाल कहानी: प्यासा पपीहा

'पिऊ-पिऊ' की विशेष आवाज निकालने वाले पक्षी पपीहे से प्राय: सभी सुपरिचित हैं। इसी पक्षी के बारे में यह मान्यता प्रचलित है कि वह अपनी प्यास पृथ्वी पर विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जल से नहीं बल्कि स्वाति नक्षत्र की बूंदों को सीधे अपनी चोंच में लेकर बुझाता है और इसी कारण बारिश होने से पूर्व इसे अपनी चोंच आकाश की ओर उठाए आवाज करते हुए अक्सर ही देखा जा सकता है। पपीहा, पृथ्वी पर प्राप्त पानी का सेवन क्यों नहीं करता, इस संबंध में एक रोचक कथा प्रचलित है।

एक गांव में एक विधवा बुढिय़ा रहा करती थी। बुढिय़ा के अतिरिक्त परिवार में तीन सदस्य और थे, जवान बेटा तथा बेटी और बेटे की बहू। आय का मुख्य साधन खेती थी किंतु जमीन इतनी कम थी कि खूब मेहनत करने पर भी सिर्फ घर का गुजारा भर चल पाता था।

इधर बुढिय़ा को अपनी बेटी के विवाह की चिंता दिनरात सताए रहती थी किंतु पैसा पास न होने के कारण वह उसके रिश्ते की बात नहीं चला पा रही थी। अंत में उसे एक उपाय सूझा। उसने अपने बेटे को समझाते हुए कहा कि वह शहर जाकर कुछ पैसा कमा लाए और इस बीच खेती का काम वे तीनों मिलकर संभाल लेंगी। बेटे को मां की बात ठीक लगी और वह शहर चला गया।

कुछ दिनों बाद गेहूं की फसल कटकर घर के पीछे बने खलिहान में आ गई। उस समय आधुनिक कृषि उपकरण तो थे नहीं। बैलों की सहायता से ही खेती के अधिकांश कार्य पूरे किए जाते थे।

गेहूं के दानों को बालियों से अलग निकालने के लिए बहू और बेटी मिलकर बुढिय़ा की देखरेख में बैलों को गेहूं की बालियों के ढेर पर घुमा रहीं थीं। दोपहर का समय था और तेज धूप थी। अत: कुछ समय बाद बैल थकान और प्यास महसूस करने लगे। बैलों की यह दशा देखकर बुढिय़ा ने उन दोनों से कहा कि वे जाकर एक बैल को पानी पिला लाएं। जो भी जल्दी लौटेगा, उसे स्वादिष्ट खीर इनाम के रूप में मिलेगी।

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बुढिय़ा की बात सुनकर बेटी और बहू एक-एक बैल लेकर पानी पिलाने चल पड़ीं और कुछ दूरी पर स्थित एक तालाब पर पहुंचीं किंतु वहां पानी सूख चुका था। आसपास पानी का अन्य कोई साधन नहीं था। हां, काफी दूर एक नाला अवश्य था।

बहू ने तुरंत वहीं जाकर बैल को पानी पिलाने का निश्चय किया और तेज चाल से बढ़ चली। बेटी भी उसके पीछे-पीछे चलने लगी किंतु कुछ ही दूर जाकर उसकी चाल धीमी पड़ गई और फलस्वरूप बहू काफी आगे निकल गई। बेटी ने सोचा कि अब भाभी से जीत पाना असंभव है। उसे स्वयं भी थकान महसूस हो रही थी। अत: वह बीच रास्ते से ही बैल को प्यासा लेकर लौट आई और उसे खलिहान में खूंटे से बांधकर मां के पास पहुंची।

मां ने समझा कि वह पहले पानी पिलाकर लौट आई है। अत: वायदे के अनुसार उसने उसे खीर खाने को दे दी। बेटी खीर खाकर आराम से लेट गई। तब तक बहू भी पानी पिलाकर लौट आई थी परंतु जैसे ही वह खलिहान पर बैल बांधने पहुंची, उसने देखा कि दूसरा बैल जिसे उसकी ननद पानी पिलाने ले गई थी, मरा पड़ा है। अपने बैल को बांधकर वह दौड़ी-दौड़ी अपनी सास के पास पहुंची और सूचना दी।

बुढिय़ा ने बेटी से जब पूछताछ की तो उसने वास्तविकता बता दी और बुढिय़ा को यह समझते देर नहीं लगी कि बैल प्यास के कारण ही मरा है। इस घटना के दूसरे ही दिन बुढिय़ा की बेटी बीमार पड़ गई और कुछ ही दिनों में उसने प्राण त्याग दिए। कहते हैं ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बैल ने मरते समय तड़प-तड़प कर बेटी को श्राप दिया था कि जिस तरह तेरे कारण मैं प्यास से तड़पकर मर रहा हूं, उसी तरह तूं भी अगले जन्म में पक्षी या पशु बनकर प्यास से तड़पती रहे।

मान्यता है कि बेटी मरकर पपीहा नाम का पक्षी बनी जो प्यास के कारण पिऊ-पिऊ पुकारता रहता है। पृथ्वी पर प्राप्त पानी उसे उस बैल का खून प्रतीत होता है, अत: उसे नहीं पीता और सिर्फ आकाश से गिरने वाली बूंद से ही प्यास बुझाता है। शेष समय उसे श्राप के कारण प्यासा ही रहना पड़ता है।

- नरेंद्र देवांगन

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