विश्लेषण: राफेल पर रार: अति उत्साहित कांग्रेस, उलझती केन्द्र सरकार

विश्लेषण: राफेल पर रार: अति उत्साहित कांग्रेस, उलझती केन्द्र सरकार

आज सारे देश में राफेल पर हंगामा बरपा है। वर्तमान केन्द्र सरकार के आने के बाद से ही कोई बड़ा मुद्दा तलाशती विपक्ष और खासकर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के बयानों से ऐसा प्रतीत होता है जैसे 2019 लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें संजीवनी मिल गयी हो। वास्तव में अनगिनत घोटालों का आरोप झेलती कांग्रेस सत्ता से बाहर होने के बाद से ही किसी ऐसे ही मुद्दे की तलाश में है जिससे वह आरोप का प्रत्युत्तर आरोप से ही दे सके और पूर्व कांग्रेस सरकार में हुए घोटालों पर मुखर सत्ता पक्ष भी घोटाले जैसे भ्रष्टाचार के मुद्दों पर मौन साध ले और लड़ाई चोर चोर मौसेरे भाई के बीच तब्दील हो जाए लेकिन जब हम राफेल की बात करते हैं तो बरबस न जाने क्यों बोफोर्स घोटाले की याद जेहन में ताजा हो जाती है।

तब के बागी कांग्रेसी और भूतपूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह कुछ राजनीतिक सभाओं, जिसमें वे स्टेज से भरे अवाम को संबोधित करते जेब से एक पर्चा निकालते कहते हैं कि 'इस पर्ची में है घोटालेबाजों का नाम और सत्ता में आते ही सारे नाम उजागर करूंगा, जिसमें देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी शामिल हैं जनता उनपर यकीन करती है और लोकसभा चुनाव में राजीव गाँधी सत्ता से बेदखल हो जाते हैं लेकिन आज का दौर पर्चो का दौर नहीं है और कांग्रेस अध्यक्ष की विश्वसनीयता भी पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह जितनी मुकम्मल नहीं है। आज इंटरनेट का दौर है और संवाद कागज के पन्नों पर नहीं, फेसबुक और ट्विटर जैसे माध्यम पर बहुत तीव्रता से होता है जिसका विस्तार भी बहुत अधिक है। ऐसे में जुबानी आक्षेप सत्ता पक्ष को मुश्किल में जरूर डाल सकता है, उलझा भी सकता है लेकिन आज जनता इतनी भी भोली नहीं है कि जो कह दिया, उसे मान ले। आज जनता नेताओं के कथन को तर्क और तथ्यों पर परखती है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी केन्द्र सरकार पर मुख्य रूप से दो आरोप लगा रहे हैं। उनका पहला आरोप यह है कि वर्तमान सरकार ने राफेल विमान को यू पी ए सरकार द्वारा तय किए गए मूल्य 526 करोड़ प्रति विमान के बदले तकरीबन 1670 करोड़ प्रति विमान के मूल्य पर खरीदा है जबकि वर्तमान एन डी ए सरकार की रक्षा मंत्रालय द्वारा यह जताने की कोशिश की गयी है कि यह सौदा पूर्व यू पी ए सरकार की डील से 59 करोड़ रूपया सस्ता पड़ा है और यह सिर्फ विमान की खरीद नहीं अपितु लोडेड विमान की खरीद है जिसमें विमान के साथ मिसाइल के अलावा स्पेयरपार्टस, हैंगर्स,ट्रेनिंग सेमुलेटर्स की खरीद भी शामिल है। इसके अलावा जैसा कि मनमोहन सरकार के समय में भी यह सौदे का हिस्सा था कि फ्रांस ऑफसेट क्लाऊज के अनुसार करार के कुल रकम का 50 फीसदी हिस्सा भारत में रक्षा उपकरणों में खर्च करेगा। आज भी यह सौदे का हिस्सा है।

अब सवाल उठता है कि दोनों ही सरकारों द्वारा करार में मूल्य में बड़े अंतर का मूल कारण उजागर होने के बावजूद अगर कांग्रेस को आपत्ति है तो भले केन्द्र सरकार सौदे के नियम और राष्ट्रीय सुरक्षा को नजर में रखते हुए करार के सही मूल्य का खुलासा नहीं कर पा रही हो लेकिन अगर कांग्रेस को ऐसा प्रतीत होता है कि घोटाला हुआ है तो उसे अपनी सरकार द्वारा तय किए गए सौदे का मूल्य जो भले ही तय सिर्फ विमान के लिए किए गया हो लेकिन मनमोहन सरकार लोडेड विमान के मूल्य से एकदम अनभिज्ञ हो, ऐसा भी तो नहीं हो सकता।

ऐसे में कांग्रेस को चाहिए कि अगर उससे सचमुच इस सौदे में घोटाला प्रतीत होता है तो यह खुल कर कहना चाहिए कि वो जिस मूल्य पर करार की बात कर रहे हैं वह भी लोडेड था और तमाम सुविधाएं वही थी जो अब विमान के साथ मिल रहे हैं या उन्हें लोडेड विमान के करार के मूल्यों में अंतर की बात करनी चाहिए। सिर्फ विमान और लोडेड विमान के मूल्यों की तुलना से कांग्रेस अध्यक्ष भले ही आरोप लगाने में सफल हुए हो लेकिन आरोप साबित कैसे कर सकेंगे ?

कांग्रेस का दूसरा आरोप है कि यह करार हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड और फ्रांस की दसॉल्ट एवियेशन कंपनी के बीच होना तय था लेकिन वर्तमान केन्द्र सरकार ने ऐन मौके पर एच ए एल का नाम हटाकर अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस को आगे कर दिया। फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के उस बयान से जिसमें उन्होंने कहा कि फ्रांस की कंपनी दसॉल्ट के पास रिलायंस के अलावा कोई विकल्प नहीं था, इससे कुछ हद तक जरूर राहुल गांधी के आरोपों को बल मिला लेकिन वे अपने बयान पर अडिग नहीं रहे और फ्रांस की कंपनी दसॉल्ट खुल कर सामने आई और कहा कि उसके पास भारतीय कंपनियों में से चयन के विकल्प मौजूद थे लेकिन उन्होंने खुद ही नियमों के तहत रिलायंस को चुना है।

भारत सरकार कह रही है कि चूंकि एच ए एल अपना आर्डर समय पर पूरा नहीं करती इसलिए दसॉल्ट ने रिलायंस को चुना है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर सचमुच वर्तमान केन्द्र सरकार ने रिलायंस का नाम आगे भी किया हो तो कांग्रेस उसे साबित कैसे करेगी? अगर केन्द्र सरकार कह रही है कि एच ए एल अपना आर्डर समय पर पूरा नहीं करती तो कांग्रेस को और एच ए एल को पुराने ब्योरा के साथ सामने आना चाहिए लेकिन वे आगे तभी आ सकेंगे अगर सचमुच ऐसा नहीं हुआ हो लेकिन सचमुच पहले अगर ऐसा हुआ है तो रिलायंस के सौदा का हिस्सा होने से आपत्ति क्यों?

राहुल गांधी का इस सौदे पर तीखा प्रहार जरूर यह बताने की कोशिश है कि इस सौदे में बड़े पैमाने पर पैसे का लेन देन हुआ है तो निश्चित रूप से पैसा एक खाते से दूसरे खाते में गया होगा ? तो अगर कांग्रेस आरोप के साथ साबूत और तथ्यों पर बात करती तो उसकी विश्वसनीयता और बढ़ जाती। अगर कांग्रेस को सचमुच यकीन है कि घोटाला हुआ है तो मंचों पर हंगामे के बदले कांग्रेस अगर न्यायालय का रूख कर लेती तो केन्द्र सरकार निश्चित रूप से बैकफुट पर आ जाती और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के कथन की विश्वसनीयता भी बढ़ जाती लेकिन कांग्रेस राहुल गाँधी की अगुवाई में नियंत्रण और महालेखा परीक्षक ( कैग) के पास अपनी शिकायत लेकर गयी है, इससे इतना तो तय है कि आंकड़ों के स्तर पर अब तक कांग्रेस के हाथ ऐसा कोई साक्ष्य नहीं लगा जिससे वे सीधे न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकें लेकिन दूसरी तरफ केन्द्र सरकार भी सीधे संवाद के बजाए खुद को बचाती हुइ प्रतीत होती है और इस मुद्दे में रॉबट वाड्रा का नाम घसीट कर आरोप का जवाब इसलिए आरोप में देना चाहती है कि कांग्रेस अपने ही बुने जाल में उलझकर चुप्पी साध ले।

हालांकि इन आरोप- प्रत्यारोप का नतीजा क्या निकलेगा और रक्षा सौदे जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष की यह रार कितना उचित है और इसका अंजाम क्या होगा, यह भविष्य के गर्भ में है लेकिन इस मुद्दे पर कांग्रेस जहां अति उत्साहित दिखती है वही केन्द्र सरकार आरोप का प्रत्युत्तर आरोप से देकर उलझती प्रतीत होती है।

- अमित कुमार अम्बष्ट 'आमिली'

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