मुद्दा: 'मी-टू' अभियान ने बढ़ायी महिलाओं की हिम्मत

मुद्दा: मी-टू अभियान ने बढ़ायी महिलाओं की हिम्मत

'मी-टू' अभियान ने जिस तरह तेजी पकड़ी है उससे ऐसा आभास होता है कि आने वाले दिनों में कई और नामी-गिरामी लोग इसके फेर में फंसेंगे। मामले की शुरूआत बालीवुड अभिनेत्री तनुश्री दत्ता से हुई थी। तनुश्री दत्ता ने मशहूर अभिनेता नाना पाटेकर पर उत्पीडऩ का आरोप लगाए किन्तु जल्दी ही मी टू (मैं भी) नामक मुहिम के चलते वह फिल्म उद्योग से निकलकर केन्द्रीय मंत्री एमजे अकबर पर केंद्रित होकर रह गया। अनेक महिला पत्रकारों ने आरोप लगाए हैं कि श्री अकबर ने उनके साथ अमर्यादित व्यवहार किया जिसे यौन उत्पीडऩ माना जा रहा है। उल्लेखनीय है ये आरोप उस समय के हैं जब वे बतौर संपादक कार्यरत थे।

कार्यस्थल पर यौन-उत्पीडऩ का अनुभव करनेवाली महिलाओं की एक बड़ी आबादी सामाजिक लांछन और अन्य आशंकाओं से चुप रहती आयी है लेकिन अब मुखरता का दौर है और इससे लैंगिक समानता की दिशा में संभावनाओं के नये द्वार खुल रहे हैं। भारत में कई महिलाएं 'मी टू' अभियान के तहत अपने अनुभव सार्वजनिक कर रही हैं तथा वैसे लोगों का नाम बता रही हैं जिन्होंने उनके साथ आपराधिक कृत्य किया है।

तनुश्री दत्ता के बाद से जिस तरह मी-टू के कई मामले सामने आये हैं उससे समाज भी विभाजित होता दिख रहा है। कुछ महिलाओं के साथ खड़े हैं तो कुछ इसे सस्ता प्रचार और ब्लैकमेलिंग का तरीका बता रहे हैं। महिला संगठनों की सहानुभूति निश्चित रूप से खुद को पीडि़त बता रहीं महिलाओं के साथ है इसीलिए श्री अकबर पर त्यागपत्र का दबाव बनाया जा रहा है। भाजपा का उच्च नेतृत्व भी उनके विदेश दौरे से लौटने की प्रतीक्षा कर रहा है लेकिन इस संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति शुरू होने से इसकी गंभीरता खत्म होने का खतरा बढ़ गया है। केन्द्रीय मंत्री की तरफ भी काफी लोग नजर आ रहे हैं। उनका पक्ष जाने बिना कोई निर्णय नहीं लिए जाने की बात भी सुनाई दे रही है।

टीवी धारावाहिक की एक अभिनेत्री ने मी टू पर बयान देते हुए फिल्म जगत के बारे में कहा है कि वहां बलात्कार नहीं होते अपितु सब कुछ सहमति से होता है। कास्टिंग काउच नामक बुराई को लेकर तो गाहे-बगाहे बवाल मचता ही रहा है। इस समूचे प्रसंग में जो बातें उभरकर सामने आ रही हैं, उनसे लगता है कि यह मुहिम भी दिशाहीन होकर रह जायेगी। सोशल मीडिया की वजह से भले ही इस मुद्दे को खूब सुर्खियां मिल रही हों और इसे महिलाओं में बढ़ रहे साहस का प्रतीक माना जा रहा हो किन्तु अभी तक जिन महिलाओं की शिकायतें सार्वजनिक हुईं, उनमें से अधिकतर पेशेवर ही हैं और फिर कोई भी ताजा मामला सामने नहीं आया जिससे आरोपों के उद्देश्य को लेकर भी पक्ष-विपक्ष में चर्चाएं चल पड़ी हैं। देखने वाली बात यह होगी कि क्या सुर्खियों से मीलों दूर रहने वाले वर्ग की महिलाएं किसी समिति के समक्ष आने का साहस बटोर सकेंगी।

रॉयल बुलेटिन की नई एप प्ले स्टोर पर आ गयी है।royal bulletin news लिखे और नई app डाउनलोड करें

इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि बीते कुछ वर्षों में यौन उत्पीडऩ की शिकायतों के संदर्भ में ये तथ्य मजबूती से उभरकर सामने आया है कि अधिकतर में निकट सम्बन्धी ही उसे अंजाम देने वाले निकले। मी टू के अंतर्गत आ रही शिकायतों में भी साथ काम करने वाले पुरुषों का नाम सामने आया है चाहे फिर वे अभिनेता हों या एमजे अकबर जैसे नामीगिरामी संपादक। कांग्रेस के एक अनुषांगिक संगठन के मुखिया पर भी आरोप तो लगा है किंतु उसकी उतनी चर्चा नहीं हो रही। इस तरह यह कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि सहिष्णुता लाबी द्वारा अवार्ड वापिसी की तरह ही 'मी टू' का सिलसिला भी कुछ दिन जारी रहने के बाद टूट जाएगा।

'मी-टू' के तमाम मामलों व विवाद के बीच केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने चार सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की एक समिति गठित किये जाने की घोषणा कर दी जो यौन उत्पीडऩ की सभी शिकायतों की स्वतंत्र जांच कर अपनी रिपोर्ट देगी। समिति कार्यस्थल पर उत्पीडऩ रोकने के उपाय भी सुझाएगी। मेनका गांधी ने तो यहां तक कह दिया कि वे 'मी टू' के तहत आई प्रत्येक शिकायत को सही मानती हैं। अब महिलाओं से कहा जा रहा है वे अपने साथ हुए आपत्तिजनक व्यवहार की जानकारी उक्त समिति को दें। यहां तक तो ठीक है किंतु सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की समिति के सामने वही शिकायतें आएंगी जिनमें पीडि़त महिला शिक्षित और दबावरहित हो। अभी तक जिस तरह के मामले सामने आए हैं वे सभी बरसों पहले के हैं। कुछ तो दशकों पुराने हैं जिनमें आरोपों को साबित करना पीडि़त महिला के लिए बेहद कठिन होगा लेकिन जिस पुरुष पर आरोप लगेंगे, वह बदनाम तो हो ही जाएगा।

फिल्म और राजनीतिक क्षेत्र में अवैध सम्बन्धों और महिलाओं के दैहिक-मानसिक शोषण के किस्से समय-समय पर सामने आते रहे हैं लेकिन उनका आज की तरह ढिंढोरा नहीं पीटा जाता था। इसकी वजह महिला को बदनामी से बचाना भी रहा। मौजूदा विवाद में सामने आईं जिन महिलाओं के साहस की प्रशंसा करते हुए उत्पीडऩ की शिकार अन्य महिलाओं को भी शिकायतें लेकर सामने आने प्रेरित और प्रोत्साहित किया जा रहा है, उनमें से कितनी न्यायाधीशों की समिति तक पहुंच सकेंगी, यह बड़ा प्रश्न है। शिक्षा के प्रसार की वजह से महिलाएं घर की चारदीवारी से निकलकर विभिन्न क्षेत्रों में अपनी भूमिका का निर्वहन करने लगीं हैं। उनमें सभी नौकरी या व्यवसाय में नहीं हैं लेकिन राजनीति और सामाजिक कार्यों में भी उनकी सक्रिय भूमिका देखी जा सकती है। ऐसा करते हुए उन्हें पुरुषों के साथ कार्य करना पड़ता है। ऐसे में जरूरी होता है कि समाज में ऐसा वातावरण बनाया जाए जिसमें महिलाओं के प्रति नजरिया बदले।

सरकार से अपेक्षा करने की बजाय परंपरागत भारतीय संस्कारों को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। महिलाओं को घर में कैद रखकर उनकी सुरक्षा की सोच तो आज के युग में अर्थहीन है इसलिए बेहतर होगा समाज ही इस विषय में संवेदनशील और जिम्मेदार बने। पुरुषों से तो शालीनता की अपेक्षा की ही जानी चाहिए लेकिन महिलाओं को भी यह सोचना चाहिए कि वे पुरुषों के साथ मेलजोल और अन्य कार्यों में किस सीमा तक अनौपचारिक हों। पाश्चात्य संस्कृति के जिस अंधानुकरण की वजह से भारतीय महिलाओं को इस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, उसके बारे में भी उनको गम्भीरता से विचार करना चाहिए क्योंकि कुछ लोगों के आधुनिक हो जाने मात्र से पूरे समाज की मानसिकता नहीं बदलती।

आज महिलाओं ने 'मी टू' जैसा अभियान चलाकर न सिर्फ महिलाओं की हिम्मत बढ़ायी है बल्कि पुरुषों को भी सचेत कर दिया है। तनुश्री की वजह से एक के बाद एक बड़े-बड़े लोगों के चेहरे सामने आने लगे हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि महिलाएं कितना कुछ झेलती आ रही थीं। अब सवाल है कि क्यों उन्होंने अब तक अपनी आवाज दबा रखी थी? क्या कानून फर्क करता है? अब एक तालिका बन गयी है जिसमें नाना पाटेकर से लेकर एमजे अकबर, आलोक नाथ, विकास बहल, कैलाश खेर आदि तक के नाम शामिल हो चुके हैं. यह वाकई शर्म की बात है. जो महिलाएं आवाज उठा रहीं हैं, वे काफी समझदार हैं। यूं इस तरह की चर्चा में आना बहुत हिम्मत की बात है. अब कोई आरोप साबित हो या न हो, लेकिन इससे लोगों को सीख और हिम्मत तो मिलेगी ही।

- शकील सिद्दीकी

रॉयल बुलेटिन की नई एप प्ले स्टोर पर आ गयी है।royal bulletin news लिखे और नई app डाउनलोड करें

Share it
Top