व्यंग्य: आचार संहिता लग गई, अब सब आदर्श ही होगा

व्यंग्य: आचार संहिता लग गई, अब सब आदर्श ही होगा

लो फिर लग गई आचार संहिता। अब महीने दो महीने सारे सरकारी काम काज नियम कायदे से ही होंगे। पूरी छान बीन के बाद। नेताओं की सिफारिश नहीं चलेगी। वही होगा जो कानून बोलता है, जो होना चाहिये। अब प्रशासन की तूती बोलेगी। जब तक आचार संहिता लगी रहेगी, सरकारी तंत्र, लोकतंत्र पर भारी पड़ेगा। बाबू साहबों के पास लोगों के जरूरी काम काज टालने के लिये आचार संहिता लगे होने का आदर्श बहाना होगा । सरकार की उपलब्धियों के गुणगान करते विज्ञापन और विज्ञप्तियां समाचारों में नहीं दिखेंगी। अखबारों से सरकारी निविदाओं के विज्ञापन गायब हो जायेंगे। सरकारी कार्यालय सामान्य कामकाज छोड़कर चुनाव की व्यवस्था में लग जायेंगे।

मंत्री जी का निरंकुश मंत्रित्व और राजनीतिज्ञों के छर्रो का बेलगाम प्रभुत्व आचार संहिता के नियमों उपनियमों और उपनियमों की कंडिकाओं की भाषा में उलझा रहेगा। प्रशासन के प्रोटोकाल अधिकारी और पोलिस की सायरन बजाती मंत्री जी की एस्कार्टिंग करती और फालोअप में लगी गाडिय़ों को थोड़ा आराम मिलेगा। मन मसोसते रह जायेंगे लोकशाही के मसीहा, लाल बत्तियों की गाडिय़ां खड़ी रह जायेंगी। शिलान्यास और उद्घाटनों पर विराम लग जायेगा। सरकारी डाक बंगले में रुकने, खाना खाने पर मंत्री जी तक बिल भरेंगे। मंत्री जी अपने भाषणों में विपक्ष को कितना भी कोस लें पर लोक लुभावन घोषणाएं नहीं कर सकेंगे।

सरकारी कर्मचारी लोकशाही के पंचवर्षीय चुनावी त्यौहार की तैयारियों में व्यस्त हो जायेंगे। कर्मचारियों की छुट्टियां रद्द हो जायेंगी। वोट कैंपेन चलाये जायेंगे। चुनाव प्रशिक्षण की क्लासेज लगेंगी। चुनावी कार्यों से बचने के लिये प्रभावशाली कर्मचारी जुगाड़ लगाते नजर आयेंगे। देश के अंतिम नागरिक को भी मतदान करने की सुविधा जुटाने की पूरी व्यवस्था प्रशासन करेगा। रामभरोसे जो इस देश का अंतिम नागरिक है, उसके वोट को कोई अनैतिक तरीकों से प्रभावित न कर सके, इसके पूरे इंतजाम किये जायेंगे। इसके लिये तकनीक का भी भरपूर उपयोग किया जायेगा। वीडियो कैमरे लिये निरीक्षण दल चुनावी रैलियों की रिकार्डिग करते नजर आयेंगे। अखबारों से चुनावी विज्ञापनों और खबरों की कतरनें काट कर पेड न्यूज के एंगिल से उनकी समीक्षा की जायेगी। राजनैतिक पार्टियों और चुनावी उम्मीदवारों के खर्च का हिसाब किताब रखा जायेगा।

पोलिस दल शहर में आती जाती गाडिय़ों की चैकिंग करेगा कि कहीं हथियार, शराब, काला धन तो चुनावों को प्रभावित करने के लिये नहीं लाया ले जाया रहा है। मतलब सब कुछ चुस्त दुरुस्त नजर आयेगा। ढील बरतने वाले कर्मचारी पर प्रशासन की गाज गिरेगी। उच्चाधिकारी पर्यवेक्षक बन कर दौरे करेंगे।सर्वेक्षण रिपोर्ट देंगे। चुनाव आयोग तटस्थ चुनाव संपन्न करवा सकने के हर संभव यत्न में निरत रहेगा। आचार संहिता के प्रभावों की यह छोटी सी झलक है।

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देश में सदा आचार संहिता ही लगी रहे तो अपने आप सब कुछ वैसा ही चलेगा जैसा आदर्श जनता चाहती है। प्रशासन मुस्तैद रहेगा और मंत्री महत्त्वहीन रहेंगे। भ्रष्टाचार नहीं होगा। बेवजह के निर्माण कार्य नहीं होंगे तो अधिकारी कर्मचारियों को रिश्वत का प्रश्न ही नहीं रहेगा। आम लोगों का क्या है। उनके काम तो किसी तरह चलते ही रहते हैं धीरे धीरे। लोग जी ही रहे हैं। मुफ्त पानी मिले ना मिले, बिजली का पूरा बिल देना पड़े या माफ हो, आम आदमी किसी तरह एडजस्ट करके जी ही लेता है। यही उसकी विशेषता है।

कोई आम आदमी को विकास के सपने दिखाता है, कोई यह बताता है कि पिछले दस सालों में कितने एयरपोर्ट बनाये गये और कितने एटीएम लगाये गये हैं। कोई यह गिनाता है कि उन्हीं दस सालों में कितने बड़े बड़े भ्रष्टाचार हुये, या महंगाई कितनी बढ़ी है पर आम आदमी जानता है कि यह सब कुछ, उससे उसका वोट पाने के लिये अलापा जा रहा राग है। आम आदमी ही लगान देता रहा है, राजाओं के समय से। अब वही आम व्यक्ति ही तरह तरह के टैक्स दे रहा है, इनकम टैक्स, सर्विस टैक्स, प्रोफेशनल टैक्स और न जाने क्या क्या, प्रत्यक्ष कर, अप्रत्यक्ष कर। जो ये टैक्स चुराने का दुस्साहस कर पा रहा है, वही अमीर बन पा रहा है।

जो आम आदमी को सपने दिखा पाने में सफल होता है, वही शासक बन पाता है। परिवर्तन का सपना, विकास का सपना, घर का सपना, नौकरी का सपना, भांति भांति के सपनों के पैकेज राजनैतिक दलों के घोषणा पत्रों में आदर्श आचार संहिता के बावजूद भी चिकने कागज पर रंगीन अक्षरों में सचित्र छप ही रहे हैं और बंट भी रहे हैं। हर कोई खुद को आम आदमी के ज्यादा से ज्यादा पास दिखाने के प्रयत्न में है। कोई खुद को चाय वाला बता रहा है तो कोई किसी गरीब की झोंपड़ी में जाकर रात बिता रहा है, कोई स्वयं को पार्टी के रूप में ही आम आदमी रजिस्टर्ड करवा रहा है। पिछले चुनावों के रिकार्डो आधार पर कहा जा सकता है कि आदर्श आचार संहिता का परिपालन होते हुये, भारी मात्र में पुलिस बल व अर्ध सैनिक बलों की तैनाती के साथ इन समवेत प्रयासों से दो चरणों में चुनाव तथाकथित रूप से शांति पूर्ण ढंग से सुसंम्पन्न हो ही जायेंगे। विश्व में भारतीय लोकतंत्र एक बार फिर से सबसे बड़ी डेमोक्रेसी के रूप में स्थापित हो जायेगा।

कोई भी सरकार बने, अपनी तो बस एक ही मांग है कि शासन प्रशासन की चुस्ती केवल आदर्श आचार संहिता के समय भर न हो बल्कि हमेशा ही आदर्श स्थापित किये जावें। मंत्री जी केवल आदर्श आचार संहिता के समय डाक बंगले के बिल न दें। हमेशा ही देते रहें। राजनैतिक प्रश्रय से 33के 133बनाने की प्रवृत्ति पर विराम लगे, वोट के लिये धर्म और जाति के कंधे न लिये जाएं, और आम जनता और लोकतंत्र इतने सशक्त हों कि इनकी रक्षा के लिये पुलिस बल की और आचार संहिता की आवश्यकता ही न हो।

- विवेक रंजन श्रीवास्तव

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