मानसून में ऐसे बचाएं बूंद-बूंद पानी

मानसून में ऐसे बचाएं बूंद-बूंद पानी

'जल ही जीवन है' और 'बूंद-बूंद बचाइए' के नारों के बावजूद आज हर आदमी पानी की किल्लत से परेशान है। देश के कई इलाकों में पीने से ले कर खेती के पानी की खातिर आपस में फसाद तक होने शुरू हो गए हैं। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड और सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट के ताजा अध्ययनों में जमीनी पानी के गिरते स्तर को ले कर खासतौर से चिंता जताई जा रही है। महानगर हों या दूर देहात, चारों तरफ पानी के लिए हाहाकार है।
आमतौर पर लोग घर, कपड़े, बर्तन और बदन की साफ-सफाई में खूब पानी बहाते हैं लेकिन इस बरबाद होने वाले पानी के भी बड़े हिस्से को दोबारा इस्तेमाल के लायक बनाया जा सकता है, ऐसा कम लोग ही जानते हैं। शहरी जन-जीवन की आदत यह है कि फ्लश में एक बार में 10 से 15 लिटर पानी का इस्तेमाल किया जाता है, वहीं वाशिंग मशीन में कपड़ों की धुलाई में एक बार में 100 लिटर से ज्यादा पानी खर्च हो जाता है। बर्तन साफ करने और बागबानी के लिए भी पानी की फिजूलखर्ची होती है। शहरों में इस बूंद-बूंद पानी को बचाने के लिए कोई विशेष कोशिशें नहीं हुई हैं।
आज पानी का मुद्दा सबसे बड़ा है। पानी की किल्लत को देखते हुए कुछ शहरों में कुछ कोशिशें हुई हैं। इस समय पानी के बचाव और फालतू बहा दिए जाने वाले पानी के दोबारा इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है। पानी की बचत के लिए कई तरह के तरीके प्रयोग में जाए जा रहे हैं। इसे रेनवाटर हार्वेस्टिंग और वेस्ट वाटर मैनेजमेंट का नाम दिया गया है। कुछ कृषि संस्थाओं ने 'रूफ सिस्टम' के जरिए पानी बचाने की मुहिम शुरू कर रखी है। रूफ सिस्टम ऐसी व्यवस्था है जिससे बरसात के साथ-साथ घरों व नालों से बहने वाले पानी को जमा कर उसका दोबारा इस्तेमाल संभव है। इसके अलावा 'बोटेनिकल ट्रीटमेंट सिस्टम' (बीटीएस) के जरिए भी बरसाती पानी या घरों के गंदे पानी को बचाया जा सकता है।
खेती-बाड़ी के जानकार बताते हैं कि जमीन स्पंज की तरह है जो पानी सोखती है लेकिन बरसात होती है तो पानी जमीन के संपर्क में आ ही नहीं पाता क्योंकि शहरों में बढ़ती आबादी के कारण अनेक मकान भी बन गए हैं। यही नहीं, अब पहले से बारिश भी कम होती है अत: जो पानी गिरता है, वह मकानों और सड़कों तक सिमट कर रहा जाता है। जमीन में पानी का रिसाव नहीं हो पाता है। यहीं से शुरू होती है पानी की किल्लत।
जमीन में पानी पहुंचाने के लिए रिचार्ज खाई अच्छा सिस्टम है। यह 200-300० वर्गमीटर क्षेत्रफल वाली छत के भवन के लिए उपयुक्त है तथा जहां जल स्तर छिछली गहराई में उपलब्ध होता है। रिचार्ज करने योग्य जल की उपलब्धता के आधार पर खाई 0.5 मीटर से 1 मीटर चौड़ी, 1 से 1.5 मीटर गहरी तथा 10 से 20 मीटर लंबी हो सकती है। यह शिलाखंड (5 से 20 सेंटीमीटर), बजरी (5 से 10 मिलीमीटर) एवं मोटी रेत (1.5 से 2 मिलीमीटर) से क्रमानुसार भरा होता है ताकि बहाव के साथ जाने वाली गाद मोटी रेत पर जमा हो जाए जिसे आसानी से हटाया जा सके। जाली छत से जल निकलने वाले पाईप पर लगाई जानी चाहिए ताकि पेड़ों के पत्ते या अन्य ठोस पदार्थ को खाई में जाने से रोका जा सके एवं सूक्ष्म पदार्थों को खाई में रोकने के लिए गाद निकासी कक्ष या संग्रहण कक्ष जमीन पर बनाया जाना चाहिए। पहली बरसात का पानी संग्रहण कक्ष में जाने से रोकने के लिए कक्ष से पहले एक दूसरे रास्ते की व्यवस्था की जानी चाहिए। रिचार्जिंग दर को बनाए रखने के लिए रेत की ऊपरी सतह की सफाई समय-समय पर की जानी चाहिए।
छोटा रिचार्ज कुआं विधि उन क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है जहां पर पानी रिसाव करने वाली संरचनाएं जमीन की सतह पर रहती है, जिसमें पानी रिस नहीं पाता है। ऐसे स्थानों पर छतों का पानी इकटठा कर छोटे रिचार्ज कुएं में पहुंचाया जाता है। इस विधि में 2.5 फीट व्यास की जमीन को 10 से 12 फीट गहराई तक कुआंनुमा खोदकर उसकी लाइनिंग सीमेंट कांक्रीट से की जाती है तथा रिचार्ज वेल में पानी को छानने वाली सामग्री भरी जाती है। इसे ऊपर से ढक्कन लगाकर बंद कर देते हैं। इस विधि में लगभग 5 लाख लिटर वर्षा जल इकटठा किया जा सकता है। यह विधि उन क्षेत्रों में सबसे अधिक उपयोगी है, जहां पर पीली एवं काली मिट्टी क्षेत्र है।
परकोलेशन गड्ढा भी अच्छा सिस्टम है। इसमें 30 सेंटीमीटर व्यास का बोर खोदा जाता है जो 3 से 1० मीटर गहरा होता है। इसके लिए हाथ से चलाने वाले आगर का इस्तेमाल तब तक किया जाता है जब तक ऊपरी सतह वाली कठोर चट्टान प्राप्त न हो। बोर में यदि कठोर मिट्टी जैसे क्ले है तो इसमें सीधे पानी छानने वाली सामग्री जैसे कंकड्, पत्थर, कोयला, रेत डाल दिया जाता है। इस पाइप में छेद होना चाहिए, जिसमें किनारों से जल का रिसाव हो
सके।
केवल बरसाती पानी के बचाव और दोबारा इस्तेमाल से ही पानी की समस्या से नहीं उबरा जा सकता। हां, यदि बरबाद होने वाले पानी को भी बचाया जाए तो कुछ राहत मिल सकती है। इस मामले में एक स्नेहदान पुनर्वास सेंटर के बोटानिकल ट्रीटमेंट सिस्टम (बीटीएस) की मिसाल सामने है। इस पुनर्वास सेंटर ने टी.बी.व एड्स मरीजों द्वारा इस्तेमाल किए गए पानी का दोबारा इस्तेमाल कुदरती तरीके से किया है।
इस सेंटर ने 25 वर्गमीटर का एक टैंक बनाया और सेंटर में इस्तेमाल किए गए पानी को उसी में जमा करना शुरू कर दिया। पांच दिनों में जब यह टैंक भर जाता तो वहां से पानी को एक किलोमीटर दूर ले जाया जाता। जैविक पौधों के जरिए इस विषाक्त पानी को फूल-पौधों, खेती व मामूली काम के लायक बनाया जाता था। यह तकनीक सस्ती भी है।
पौधों की मामूली देखभाल और टैंक को बनाने में शुरूआती खर्च के बाद आसानी से जीवन भर पानी बचाया जा सकता है और इसे अलग-अलग घरों में भी चार-पांच हजार के खर्च पर अपनाया जा सकता है। इस तकनीक में हम पानी का वैसे ही दो बार प्रयोग कर सकते हैं जो हम चौका-बर्तन, साफ-सफाई और नहाने के दौरान बरबाद कर देते हैं। बहरहाल, मानसून आ गया है चलिए हम सब मिल कर ही करें अपनी-अपनी मुश्किलें कम।
- नरेंद्र देवांगन

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