Read latest updates about "कविता" - Page 2

  • कविता: औरत

    पीड़ा जीवन भर सहती है, औरत जब तक भी रहती है।औरत जब पैदा होती है,तब से मरने तक रोती है।ये आंसू नियति रही सर्वथा,जीवन ही सारा व्यर्थ अन्यथा।मां के आंचल में खिलती है,पीड़ा जीवन भर सहती है।औरत जब तक भी रहती है।पलती है बाबुल के घर में,परिणय तक रहती पीहर में।छूटे बाबुल का आंगन पर,कब होता कोई...

  • गौ मां

    गोकुल कान्हा का धाम न होता। जग में गौ मां का नाम न होता,.. अमृत मंथन से निकली गौ माते,धर्मशास्त्र हैं यह बात बताते।पूजी जाती है गाय युगों से,संस्कृति यही भारत की सदियों से।धर्म में भी ऐसा काम न होता,गोकुल कान्हा का धाम न होता।जग में गौ मां का नाम न होता,.. दूध दही घी माखन खाते...

  • रेल का सफर

    जंगल, जंगल छुक - छुक करती, चल दी अब रेल! शहर - शहर और गाँव - गाँव, व्हिसल बजाती रेल! पर्वत , नदिया , नाले और भाग रहे खेल के मैदान! ! घूम रहे तेजी से सब कुछ, जैसे सर्कस के दरम्यान! मूंगफली और गरम समोसे , यह वड़े पाव का खेल ! छुक- छुक करती मैराथन जैसी , दौड़ी जाती रेल ! ! कोहरे की...

  • होली में

    ले ढेरों सौगात साथ में आयी प्यारी होली,फूली नहीं समाती बिल्कुलअब बच्चों की टोली।पकते तरह-तरह के ढेरों मनभावन पकवान,खाते और खिलाते सब मिल भर मीठी मुसकान।उड़ा फुहारें रंग - बिरंगीसबको सब नहलाते,मिलते हैं जब गलेराम-भरत की याद दिलाते।नाहक बुरा मान जो लेताउससे बचकर रहते,हंसी-खुशी की घडिय़ों...

  • बाल कविता: खाना-खाना

    सोच कर देखें कि आप खाना खाते हैं या निगलते हैं ?कई लोग जल्दी जल्दी खाते हैंवे खाना खाते नहीं, भकोसते हैं.खाना खाने का भी एक सलीका हैहर कौर को 32 बार चबाना है.जल्दी जल्दी खाने से वजऩ बढ़ता है।शरीर कई रोगों का शिकार होता है।मनुष्य भोजन का स्वाद नहीं ले पाता।न ही वह खाने का आनन्द उठाता है।वह...

  • मैं एक नारी हुँ प्रेम चाहती हूँ और कुछ नही…..

    मैं एक नारी हुँ प्रेम चाहती हूँ और कुछ नही….. मैं एक नारी हूँ,मैं सब संभाल लेती हूँहर मुश्किल से खुद को उबार लेती हूँनहीं मिलता वक्त घर गृहस्थी मेंफिर भी अपने लिए वक्त निकाल लेती हूँटूटी होती हूँ अन्दर से कई बार मैंपर सबकी खुशी के लिए मुस्कुरा लेती हूँगलत ना होके भी ठहराई जाती हूँ गलतघर...

  • कलम, आज उनकी जय बोल..

    कलम, आज उनकी जय बोल | जो अगणित लघु दीप हमारे,तूफ़ानों में एक किनारे,जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन,मांगा नहीं स्नेह मुँह खोल।कलम, आज उनकी जय बोल।पीकर जिनकी लाल शिखाएं,उगल रही सौ लपट दिशाएं,जिनके सिंहनाद से सहमी,धरती रही अभी तक डोल।कलम, आज उनकी जय बोल।अंधा चकाचौंध का मारा,क्या जाने इतिहास बेचारा,साखी...

  • कविताः पिता :- कन्यादान नहीं करूंगा जाओ

    पिता :- कन्यादान नहीं करूंगा जाओ , मैं नहीं मानता इसे , क्योंकि मेरी बेटी कोई चीज़ नहीं ,जिसको दान में दे दूँ ; मैं बांधता हूँ बेटी तुम्हें एक पवित्र बंधन में , पति के साथ मिलकर निभाना तुम , मैं तुम्हें...

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