कविताः सहनशीलता

कविताः सहनशीलता

घर परिवार बगीचा जानो

हम हैं बागवान यह मानो

माना खरपतवार बहुत है

पिफर भी पफूल खिलाना जानो

पफूल संग शूलों के रहते

उनसे सहनशीलता जानो

टेढ़ी मेढ़ी पगडंडी पर

कैसे पड़े संभलना जानो

टूटे फूल फेक मत देना

उनका हार बनाना जानो

तूफां भी आया करते हैं

उसकी चाल बदलना जानो

वो भी क्यारी भर देता है

जिसको गंदा पानी मानो

सूख न जाए बेल चमन की

मन का खाद लगाना जानो

-कमलेश कुमारी उर्फ कमलेश शर्मा

इंद्रा कालोनी, मुजफ्फरनगर

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