खेत किसान: किसान अलग तरीके से बढ़ाएं अपनी कमाई

खेत किसान: किसान अलग तरीके से बढ़ाएं अपनी कमाई

सभी किसान चारों ओर से परेशान हैं। वे खेती से ज्यादा कमाना चाहते हैं लेकिन तय नहीं कर पाते कि इसके लिए क्या करें? यदि तय भी कर लें तो ज्यादातर यह नहीं जानते कि किस काम को कब, कैसे व कहां करें? खेती की उपज से खाने-पीने की अनगिनत चीजें बनती हैं लेकिन उनके लिए तकनीक सीखनी पड़ती है। किसान खेती की तकनीकों के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के रिसर्च स्टेशनों से उम्मीद करते हैं लेकिन हमारे देश में किसानों के काम की खोज, तरीके, तरकीब व तकनीक की जानकारी कहीं एक छत के तले नहीं मिलती। लिहाजा किसानों को उन्हें हासिल करने के लिए भी जहां-तहां भटकना पड़ता है।
ज्यादातर किसान नहीं जानते कि विज्ञान व उद्योग से जुड़ी संस्था वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद, सीएसआईआर ने किसानों के लिए भी बहुत ही उम्दा तकनीकें व मशीनें निकाली हैं। इसी संस्था ने साल 1967 में पहला देसी ट्रैक्टर स्वराज निकाला था। साथ ही चंद हफ्तों में ही बांस पर फूल खिलाने की तरकीब निकाली जबकि बांस पर कुदरती फूल 20 साल बाद आते हैं। सीएसआईआर ने मैसूर में केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान सीएफटीआरआई खोल रखा है। इस संस्थान ने किसानों व कारोबारियों के लिए किफायती तकनीकें व बहुत से नए तरीके खोजे हैं। उन्हें अपना कर किसान खेती की उपज से खाने का सामान बनाकर बेच सकते हैं और कामयाब कारोबारी बन सकते हैं।
सीएफटीआरआई ने अनाज, फल, सब्जी व मसालों की प्रोसेसिंग व बेहतर पैकिंग के 3०० तरीके निकाले हैं। साथ ही गन्ना, हल्दी, टमाटर, नारियल, आम व केले से तैयार होने वाले नए उत्पाद बनाने की तकनीक व मशीनें ईजाद की हैं। इनमें से बहुत सी तकनीकों को अपनाकर कई इलाकों में किसान खेती से ज्यादा कमाई में कामयाब रहे हैं। तमाम किसान इस रास्ते पर अपने कदम बढ़ा सकते हैं। कई दालें बाजार में 1०० रूपए किलोग्राम से ऊपर निकल गई हैं। दाल के कारोबारी खूब पैसा कमा रहे हैं लेकिन दाल उगाने वाले किसान अपनी लागत के साथ-साथ अपनी जान गंवा रहे हैं। उड़द-मूंग हो या अरहर-चना, किसान दलहनी उपज को साबुुत बेचने की बजाय उसकी दाल बनाकर बेचें। इससे किसानों को ज्यादा कीमत हासिल हो सकती है।
मामूली किसान अपनी निजी दाल मिल नहीं लगा सकते लेकिन यदि वे आपस में मिल जाएं तो सहकारी संस्था या साझेदारी में दाल मिल लगा भी सकते हैं। केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी संस्थान, मैसूर के माहिरों ने बड़ी ही कामयाब मिनी दाल मिल बनाई है। यह एक फेस की बिजली पर एक हार्स पावर की मोटर से प्रति घंटा 150 किलोग्राम तक दाल दलती है। मिनी दाल मिल से दाल निकालने में सिर्फ 30-40 रूपए प्रति क्ंिवटल की दर से खर्च होता है। इस छोटी दाल मिल की कीमत 75 हजार रूपए है और सारी दालें बनाने वाली मल्टी मिनी दाल मिल की कीमत सवा लाख रूपए है। खास बात यह है कि इस मिनी मिल से बनी दालें क्वालिटी व देखने में बड़ी दाल मिल से निकली दालों जैसी ही होती हैं।
मिनी मिल से दाल बनाने में दाल से निकला छिलका किसान पशुओं को चारे में खिला सकते हैं। इससे दूध उत्पादन बढ़ेगा। दाल बनाने में एक-दो फीसदी दाल टूट जाती है। उससे डोसा पाउडर, सांभर बेस, बडिय़ां व पापड़ बनाए जा सकते हैं। चकले बेलन से प्रति घंटे 60 पापड़ बनते हैं लेकिन सीएफटीआरआई, मैसूर ने जो प्रेस पापड़ मशीन निकाली है, उससे प्रति घंटे 350 उम्दा पापड़ बनते हैं। इससे समय बचता है और थकान भी कम होती है। बेहतर तकनीक से खेती की बिखरी कडिय़ां जोडऩे का यही फायदा है। सीएफटीआरआई ने नीरा पेय निकालने व शुद्ध नारियल तेल बनाने की एक नई व किफायती तकनीक निकाली है। इस तकनीक से केरल में पलक्कड़ जिले के 26 हजार नारियल उत्पादकों की आमदनी बढ़ी व उनकी दुनिया बदल गई। वहां के किसान नारियल की गिरती कीमतों से परेशान थे, इस तकनीक ने उन्हें बचाया।
गन्ना किसान कम कीमत मिलने व चीनी मिलों पर अटकी बकाया कीमतों से परेशान रहते हैं। उन्हें कारोबारी बन जाना चाहिए। सीएफटीआरआई ने कोल्ड ड्रिंक की तरह गन्ने के ताजे रस को कार्बोनेशन तकनीक के जरिए बोतलबंद करने का नायाब व कामयाब तरीका निकाला है। इसमें गन्ने का रस तीन से चार महीने तक पीने लायक बना रहता है जबकि सादा रस कुछ घंटों बाद ही खराब होने लगता है। रोज 25 क्विंटल गन्ना पेराई की कूवत वाला 13 लाख 20 हजार रूपए कीमत का यह प्लांट रोज एक हजार लिटर रस तैयार करता है। साफ, शुद्ध व पीने में मजेदार इस गन्ने के रस को नींबू, अदरक व पुदीने वगैरह के कई जायकों के साथ एल्यूमीनियम कैन में भी भरा जा सकता है। गौरतलब है कि गन्ने का यह पैक्ड रस ठेलों पर बिकने वाले रस से कई गुना बेहतर व किसानों के लिए फायदेमंद है।
बहुत से किसान प्रोसेसिंग न कर पाने की वजह से हल्दी नहीं उगाते। सीएफटीआरआई की किफायती तकनीक अपना कर मैसूर व उसके आसपास में हल्दी उगाने वाले किसान बहुत सुकून से हैं। अब उन्हें भटकना नहीं पड़ता। भारतीय स्टेट बैंक उन्हें कर्ज देता है और होपकाम्स नाम की कोऑपरेटिव संस्था अपने बिक्री केंद्रों पर उनकी मार्केटिंग कर रही है यानी अब हल्दी की प्रोसेसिंग भी आसान है।
तमिलनाडु में केले की खेती बहुतायत से होती है, लेकिन जल्दी खराब होने से केला उगाने वालों को अक्सर नुकसान उठाना पड़ता था। सीएफटीआरआई ने शहद व चाकलेट की परत चढ़ाकर केले को 6 महीने तक खाने लायक बनाने की तकनीक निकाली है। उससे केले की खेती करने वालों का नुकसान कम हुआ है। आंध्र प्रदेश के किसानों में सौर ऊर्जा से टमाटर सुखाने तथा कृष्णागिरी के बागबानों में आम के गूदे से कई तरह के उत्पाद बनाने का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। इसकी बुनियाद में भी सीएफटीआरआई के माहिरों द्वारा सुझाए गए एग्री बिजनेस के कामयाब मॉडल और निकाली गई तकनीकें व मशीनें हैं।
सीएफटीआरआई लाइसेंसिंग कराने, राय-मशविरा देने के अलावा जांच-परख वगैरह की सहूलियतें भी देता है। इस संस्था ने किसानों के लिए गांव-कस्बों में करने लायक खेती से जुड़े बहुत से नए काम-धंधे खोजे हैं। इन काम-धंधों में जल्द पकने वाली सूखी अंकुरित दालें व सांभर मिक्स जैसे उत्पाद, अनाज से बनने वाले उत्पाद, परंपरागत भोजन के लिए मिक्स मसाले व मसालों के पेस्ट जैसे उत्पाद, स्नैक्स फूड, कार्नफ्लेक्स की तरह गेहूं, धान व ज्वार जैसे अनाजों की खीलें व फूले और कई तरह के मांस उत्पाद तैयार करना शामिल हैं।
कई तरह के खमीर उत्पाद, डिब्बा बंद फल, फोजन फ्रूट्स, स्क्वैश, कैचप, सास, अचार, चटनी, सीरप, गाजर का रस व फलों के जूस जैसे पेय, जैम, जैली, मार्मलेड, कैंडी व फलों के पाउडर, सूखी व कटी पैक्ड सब्जियां, कच्चे पपीते से टूटी-फ्रूटी, बेकरी के तमाम उत्पाद और अदरक के उत्पाद बनाने के लिए फूड प्रोसेसिंग की 40 तरह की किफायती मशीनें सीएफटीआरआई ने बनाई हैं जो खेतिहरों व कारोबारियों के मतलब की हैं। इनके जरिए किसान खुद कारोबारी बनकर कमाई कर सकते हैं। बस जरूरत पहल करने की है।
- नरेंद्र देवांगन

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