कौन-सा रास्ता

कौन-सा रास्ता

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलने और उत्तरप्रदेश विधानसभा के चुनाव में भाजपा को दो तिहाई से ज्यादा सीटें मिलने के बाद पूरी तरह तो नहीं, पर बहुत हद तक यह माना जाने लगा है कि मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करने वाले राजनीतिज्ञों के दिन अब लद गए। उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ को भाजपा द्वारा मुख्यमंत्री बनाए जाने के चलते यह भी स्पष्ट हो चला है कि भाजपा को अब अपनी मूल विचाराधार और उद्देश्यों को लागू करने में किसी किस्म की झिझक नहीं है। इसका आशय स्पष्ट है कि किसी किस्म की मुस्लिम तुष्टिकरण की अब कोई संभावना नही है। इसका आशय यह भी नहीं कि मुस्लिमों के साथ किसी किस्म का भेदभाव किया जाएगा, बल्कि सबके साथ बराबरी का व्यवहार किया जायेगा- जिसकी कसौटी भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक मूल्य होंगे। लेकिन इसके साथ यह भी तय है कि भारतीय जीवन मूल्यों और भारतीय संस्कृति को बढ़ावा दिया जायेगा। चाहे वह योग का प्रश्न हो, गौ संरक्षण का सवाल हो, या राममंदिर का प्रश्न हो। इसके साथ तीन तलाक और हलाला जैसे अमानवीय और बेहूदा प्रथाओं के दौर का अब अंत होने वाला है। इसके पहले स्थिति यह थी कि किसी भी चुनाव में मुस्लिम वोट बैंक निर्णायक होता था। इस देश में तथाकथित धर्म निरपेक्ष कहे जाने वाले राजनीतिज्ञ किसी भी हद तक मुस्लिमों का तुष्टिकरण कर और जातियों में बंटे हिन्दू समाज में जातिवाद का प्रश्रय लेकर अमूमन सत्ता प्राप्त कर लेते थे। इसके बाद सत्ता में बैठकर निर्बाध लूट का साम्राज्य चलाते थे। संघ और भाजपा के नाम पर मुसलमानों को यह कह कर डराया जाता रहा कि ये तुम्हारी पहचान खत्म कर देंगे।
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तुम्हे द्वितीय श्रेणी का नागरिक बना देंगे। इस तरह से मुस्लिमों में व्याप्त तीन तलाक, चार शादियाॅ जैसी कालबाह्य एवं संविधान विरोधी बातों का तो समर्थन करते ही रहे, अलगाववाद को भी खाद पानी देते रहे। हद तो यह हुई कि मुस्लिम वोट बैंक के चक्कर में जेहादी आंतकवाद तक को प्रकारांतर से संरक्षण दिया गया। उसका बचाव करने के लिए हिन्दू आंतकवाद के झूठे शोशे भर नहीं उछाले गये, बल्कि साध्वी प्रज्ञा समेत कई निर्दोष हिन्दुओं को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत जेल में बंद कर जमानत के दरवाजे बंद कर दिए गए। हद तो यह हुई को सोहराबुद्दीन एनकाउण्टर में झूठा अभियोग लगाकर भाजपा के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष को जेल में कई महीनों के लिए बंद कर दिया गया, आगे चलकर जिसमें न्यायालय ने प्रथम दृष्ट्या चार्ज लगाने लायक भी नही समझा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बहुत पहले से कहना रहा है कि देश के समक्ष सभी राष्ट्रीय चुनौतियों का एक ही समाधान है और वह है ’’संगठित हिन्दू समाज’’। निःसंदेह चाहे 2014 की भाजपा के लोकसभा चुनावों में जीत रही हो या 2017 में उत्तरप्रदेश विधान सभा की एकतरफा विजय रही हो, ऐसा माना जा सकता है कि बहुत हद तक यह संगठित हिन्दू समाज का परिणाम है। ऐसी स्थिति में जब हिन्दू समाज संगठित हो रहा है तो उसके परिणाम भी दिखने शुरू हो गए है। जैसे कि अभी हाल में ही आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने तीन तलाक और गौ हत्या को हराम बताते हुए सरकार से इन पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। यहां तक कहा गया कि तीन तलाक की कुप्रथा को खत्म करने के लिए केन्द्र सरकार सती प्रथा जैसा कठोर कानून बनाए-जिससे भविष्य में हजारों विवाहित महिलाओं का जीवन बर्बाद होने से बचाया जा सके। गौ हत्या के मामले में भी कहा गया कि गौ मांस खाना और गौ हत्या करना हराम है। पर्सनल ला बोर्ड ने तो यहा तक उम्मीद जताई कि अयोध्या विवाद का हल भी दोनों समुदायों की आपसी बातचीत से हल हो जाएगी, बस सियासी लोगों के बीच से हटा दिया जाए। इसी बीच से ऐसी खबरे आइ्र कि कई शहरों में मुसलमानों ने राम मंदिर के पक्ष में पोस्टर और बैनर लगाए, साथ ही कई जगह रामनवमी के जुलूसों पर पुष्प वर्षा की। ऐसी भी खबरे है कि उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहल पर निर्मोही अखाड़े के प्रमुख महंत धर्मदास ने मुस्लमान समुदाय के प्रतिनिधियों से बात की है जिसमें उन्होने राम जन्म भूमि में राममंदिर बनने को लेकर सहमति जताई है।
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यह सब घटनाक्रम और परिवर्तन तो अपनी जगह पर ठीक है, लेकिन सबसे बड़ी बात यह कि अब मुस्लिम समुदाय को यह तय करना पड़ेगा के उन्हे किस रास्ते पर चलना है। बहुसंख्यक समुदाय के प्रति सौहार्द्र का रास्ता, राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल होने का रास्ता या संघर्ष का रास्ता! यह कहने में कोइ झिझक नही कि मुस्लिम समुदाय की भलाई इसी में है कि वह राष्ट्र की मुख्य धारा में शरीक हो। असुद्दीन ओवैसी, आजम खान जैसे जहर उगलने वाले नेताओं और मुल्ला-मौलवियों के प्रभाव एवं दबाव से मुक्त होकर तीन तलाक जैसी प्रथाओं के ही विरोध में मुखर न हों, बल्कि न्यायपूर्ण एवं समतामूलक समाज बनाने की दिशा में कामन सिविल कोड मुसलमानों पर लागू हो-ऐसी मांग मुस्लिम समुदाय की ओर से आनी चाहिए। रामजन्म भूमि में राममंदिर तों बनेगा, पर हिन्दू समाज की भावना एवं आस्था को देखते हुये मुस्लिम समुदाय यदि स्वतः उसके निर्माण में आगे आये तो हिन्दू-मुसलमान एकाकी दृष्टि से ऐतिहासिक पहल हो सकती है। वैसे भी राम सिर्फ हिन्दुओं के ही नहीं, भारतीय मुसलमानों के भी महान पूर्वज है। ईरान में मुसलमान रूस्तम और सोहराब को अपना पूर्वज मानकर गर्व कर सकते हैं तो भारतीय मुसलमान राम पर गर्व क्यों नही कर सकते ? गौ हत्या को लेकर गांधी ने कहा था कि यदि देश की स्वतंत्रता और गौ हत्या पर प्रतिबंध पर उन्हे एक को चुनना पड़े तो वह गौ हत्या पर प्रतिबंध को प्राथमिकता देंगे। अपने बहुसंख्यक भाइयों की इस भावना को ध्यान में रखकर आम मुसलमानों को सामने आकर गौ हत्या के विरोध में और गौ मांस से विरत रहने की मांग करनी चाहिए। वस्तुतः भारतीय मुसलमानों को यह भी पता होना चाहिए कि देश में मुस्लिम जनसंख्या का जिस ढंग से अनुपात बढ़ रहा है वह भी हिन्दुओं में एक बड़ी चिन्ता का विषय है। हिन्दुओं को ऐसा लगता है कि देश में इस तरह जनसंख्या बढ़ाकर मुसलमान देश में निजामे मुस्तफा कायम करना चाहते हैं जिसमें हिन्दू द्वितीय श्रेणी का नागरिक हो जाएगा। हकीकत यही है कि देश के अंदर भी जहा मुस्लिम जनसंख्या ज्यादा है वहा हिन्दुओं का जीवन दूभर है। कश्मीर घाटी इसका बड़ा उदाहरण है, जहां मुस्लिम बहुलता के चलते हिन्दुओं को पलायन करना पड़ा। पर देश के किसी भी हिस्से में जहां हिन्दू अल्पमत में हैं, वहां सुरक्षित नहीं महसूस कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में मुसलमानों को अपने कर्म एवं आचरण से यह बताना पड़ेगा कि हिन्दुओं की तरह वह भी जनसंख्या नियंत्रण के पक्षधर हैं और राष्ट्रहित में एक जनसंख्या नीति बननी चाहिए और देश का अच्छा नागरिक होने के नाते मुसलमान भी इस नीति का स्वेच्छा से पालन करेंगे। इस संबंध में असम सरकार द्वारा घोषित की गई दो बच्चों की नीति को ओवैसी जैसे नेता जब मुस्लिम विरोधी बताते हैं तो आम मुसलमानों को इसका जवाब इसके समर्थन में खड़े होकर देना चाहिए।
मुसलमान भविष्य में पूरी तरह अलग-थलग न पड़ें, विकास की दौड़ में शरीक हो सकें, एक बंद समाज के बजाय खुले समाज में तब्दील हो सकें। संसद और विधानसभाओं में उनके समुदाय के भी अपेक्षित प्रतिनिधि जा सकें। वह गरीबी और पिछड़ेपन से मुक्त हो सकें। उसका एक ही रास्ता है- हिन्दू समाज के साथ मिलजुलकर रहने का रास्ता, अपनी पूजा-पद्धति को सुरक्षित रखते हुए भारतीय संस्कृति में एकाकार होने का रास्ता। इसका मोटा मतलब सिर्फ इतना है कि हिन्दू और मुसलमान, दोनों के सुख-दुख शत्रु-मित्र, और पूर्वज समान हैं। इसी प्रकार हिमालय, गीता, दीप प्रज्वलन, सरस्वती वंदना, वंदेमातरम मजहबी न होकर राष्ट्रीय संस्कृति का हिस्सा है और यह सभी के लिए मान्य होना चाहिए। अलगाव के बजाय सहमति के सुरो पर जोर दें। मदरसों को आधुनिक बनाने के पक्षधर बनें। मुसलमानों को खुले दिल से यह आत्मचितंन करने की जरूरत है कि इस अलगाववाद और कट्टर मजहबपरस्ती के चलते आज वह घोर गरीबी और पिछड़ेपन के शिकार हैं। इन सबसे मुक्त होने का एकमेव रास्ता यही है के वह हिन्दुओं की सद्भावना प्राप्त करें।
-वीरेन्द्र सिंह परिहार

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