यूपीः भाजपा की जीत में छुपा एक संदेश..टूटा जाति-धर्म का तिलस्म

यूपीः भाजपा की जीत में छुपा एक संदेश..टूटा जाति-धर्म का तिलस्म


यूपी राजनीति की दशा और दिशा तय करता है। राज्य में भाजपा की बड़ी जीत से नया संदेश गया है। जाति-धर्म का तिलस्म टूट गया है। मोदी की सुनामी के आगे किसी की नहीं चली। सबका साथ सबका विकास और एकला चलो का मंत्र सफल साबित हुआ। जनता-जनार्दन ने राहुल और अखिलेश के साथ को भी पसंद नहीं किया। कांग्रेस 2012 के प्रदर्शन से भी बुरी स्थिति में चली गयी। अब उसे आक्सीजन भी नहीं बचा सकता। 403 सीटों में भाजपा ने 325 पर भगवा फहराया है। एग्जिट पोल और त्रिशंकु विधानसभा की सारी आशंकाओं और उम्मीदों पर पानी फिर गया। राजनीति में मोदी विजन शोध का विषय होगा। दिल्ली और बिहार के अपवाद के बाद भाजपा का विजय रथ लगातार जारी है। राष्टवादी नीतियों पर जाति-धर्म और संप्रदायवाद का लुढ़कता पारा इस तरह की सियासत करने वालों के लिए कड़ा संदेश है। करीब 14 साल से अधिक के वनवास के बाद और 22 साल के बाद राज्य में भाजपा की पूर्ण बहुमतवाली सरकार बनी है। मुस्लिम, यादवों के गढ़ में भी भगवा लहराया। यह सुनामी नहीं तो और क्या है। देश के 58 फीसदी हिस्से पर भाजपा और उसके सहयोगी दलों का कब्जा हो गया है, जबकि कांग्रेस सिर्फ 17 फीसदी पर सिमट कर रह गई। उत्तर प्रदेश में दलित और पिछड़ी राजनीति की प्रतीक सपा और बसपा का खात्मा हो चला है। दोनों दलों को इतनी बुरी पराजय की उम्मीद नहीं रही होगी। यादव और दलित वोट भी भाजपा की झोली में चला गया। मुसलमान को अपनी सियासत का हिस्सा बना, राजनीति करने वाले दलों के लिए यह बुरा संदेश है।
गायत्री की सम्पत्तियों की कुर्की की तैयारी, भतीजे और बेटे हिरासत में , पूछताछ जारी
देववंद जैसे इलाके में भाजपा की जीत क्या कहती है, यह राजनीतिक पंड़ितों को सोचना होगा, लेकिन पार्टी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती सीएम का चेहरा होगा। 2019 को देखते हुए उसे ऐसे चहेरे पर दांव लगाना होगा जो युवा होने के साथ राज्य की राजनीति की समझ रखता हो। सबका साथ सबका विकास के साथ सबको साथ लेकर चलने वाला हो। राज्य में कांग्रेस और भाजपा की सियासत हासिए पर जाने के बाद सियासी चाणक्य यानी ब्राहमण अब तक हासिए पर रहा। वह सपा और बसपा में पारी बदल अपनी पहचान बनाने को छटपटा रहा था लेकिन उसकी तलाश अब पूरी हुई है। सवाल है कि राज्य का अगला चेहरा क्या कोई ब्राहमण सीएम होगा या फिर ओबीसी जाति का। दिल्ली में इसका मंथन शुरू हो गया है। वैसे पीएम मोदी और भाजपा के लिए शुभ संकेत यह है कि वाराणसी पूर्वांचल की पालटिक्स का पावर सेंटर बन गया है। पूर्वांचल में हासिए पर रहने वाली भाजपा सुपर स्टार के रूप में उभरी है। वाराणसी की सभी सीटों पर उसका कब्जा हुआ है। जम्मू कश्मीर के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला का वह ट्वीट विरोधियों को अच्छी तरह पढ़ना चाहिए, जिसमें उन्होंने नसीहत देते हुए लिखा है कि विरोधियों को अब 2019 के बजाय 2024 की तैयारी करनी चाहिए। भाजपा के सामने सरकार में जातीय समीकरणों का संतुलन बनाना होगा। यूपी की कमान अब किसके हाथ में होगी यह सबसे बड़ा सवाल है। पीएम मोदी और अमितशाह के लिए यह फैसला चुनौती भरा होगा। क्योंकि सीएम उम्मीदवार की दौड़ में कई चेहरे हैं। पूर्वांचल से जहां हिंदुत्व ब्रांड के सुपर स्टार योगी आदित्यनाथ हैं वहीं केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा का भी नाम है।
राहुल से मिले अमरिंदर, चर्चा के एजेंडे को रखा गुप्त..सिद्धू को मंत्रीमंडल में शामिल किए जाने को लेकर सस्पेंस
योगी जहां क्षत्रिय लाबी से आते हैं वहीं सिन्हा भी अगड़ी जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं। गृहमंत्री राजनाथ सिंह का भी नाम इस दौड़ में हैं। उधर दलित राजनीति की प्रतीक उमा भारती भी इस फेहरिश्त में शुमार हैं। प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य पर पार्टी बड़ा दांव खेल सकती है। केशव को राज्य भाजपा का चेहरा बनाने से मौर्य , कुशवाहा, सैनी विरादरी की वोट भाजपा वोट में तब्दील हुई है। अभी तक यह वोट बसपा को जाती रही थी। स्वामी प्रसाद मौर्य भी इस होड़ में हैं। इसके अलावा लखनऊ के मेयर दिनेश शर्मा का भी नाम आ रहा है। इस लिस्ट में श्रीकांत शर्मा सबसे आगे दिखते हैं। भाजपा के लिए यह बड़ी चुनौती होगी की वह किस पर दांव लगाती है और जातीय समीकरण को किस तरह सहेजती है। क्योंकि ढाई साल बाद लोकसभा का चुनाव होना है, भाजपा उसी रणनीति के तहत काम कर सकती है। सबसे बड़ी चुनौती राज्य की कानून- व्यवस्था को संभालाना और सभी को लेकर चलने वाला सीएम का होना चाहिए। हलांकि चुनावों से पूर्व सीएम का चेहरा पेश न किया जाना भाजपा हित में रहा। बड़ी जीत की वजहों में एक यह भी रहा है। अब उसे संभालाना पार्टी के लिए मुश्किल होगा। चर्चा है पार्टी किसी युवा चेहरे पर दांव लगा सकती है, वह ब्राह्मण चेहरा भी हो सकता है। सपा-बसपा को छोड़ दिया जाए तो राज्य की कमान अधिकांश ब्राह्मणों के हाथ में रही है। ऐसा लगता हैं की पार्टी कोई नया चेहरा लाकर सभी को चौंका सकती है। बुर्जुग नेताओं को पीछे की कतार में ढकेल सकती है। कई केंद्रीय मंत्री इसके उदाहरण रहे हैं। ऐसी स्थिति में वह युवा चेहरा किस जाति से होगा, यह भी सवाल उठने लगा हैं। राज्य में इतनी बड़ी जीत के पीछे ओबीसी में गैर यादव जाति के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। अगड़ी जातियों में ब्राहमण-क्षत्रिय में किसी को सीएम का चेहरा घोषित किया जाता तो एक- दूसरी जातियों में नाराजगी बढ़ती, जिसका खामियाजा चुनावों मे उठाना पड़ता।
राज्यपाल से मिले कांग्रेसी विधायक, कहा- पहले हमें मिले सरकार बनाने का मौका
दूसरी वजह रही की इस निर्णय से ओबीसी लाबी भाजपा से नाराज हो सकती थी। लिहाजा सीएम प्रोजेक्ट न करना भाजपा के लिए फील गुड फैक्टर साबित हुआ है। यही अब उसके लिए बड़ी चुनौती बन गयी है। यूपी के इस चुनाव नतीजों ने राजनीतिक समीक्षकों की भी गणित बिगाड़ कर रख दी। जनता ने एक नया संदेश दिया है, जिसकी तस्वीर साफ है। सिर्फ जाति की राजनीति करने वालों को कड़ा तमाचा है। भाजपा की झोली में लगभग 40 फीसदी वोट गया है, जबकि आमतौर पर राज्य की राजनीति में 29 फीसदी वोट पाने वाली पार्टी सत्ता पर काबिज होती रही है। यह गणित इस बार उलट पड़ गयी। सपा से भी अधिक बसपा को 22 फीसदी से अधिक वोट मिले हैं। जबकि सपा का कांटा 21.8 फीसदी पार जा टिका। 2012 में 29.13 फीसदी वोट मिले थे। वहीं 2007 में बसपा को 30.43 फीसदी वोट मिले। भाजपा वोट प्रतिशत के मामले में रामलहर से भी बहुत आगे निकल गयी। 1991 में उसे 31.4 फीसदी वोट मिले थे जबकि 2017 में 39.7 फीसदी वोट हासिए हुए। कांग्रेस नक्शे पर कहीं दिखती नहीं। वह सीट गवांने के बाद वोट शेयर भी खत्म करा चली है। कांग्रेस को सिर्फ 6.2 फीसदी मत हासिल हुए हैं। इस तरह उत्तर प्रदेश में एक नयी तरह की राजनीति क्षितिज पर आई है। इस बात को गैर भाजपाई दलों को समझना चाहिए।-प्रभुनाथ शुक्ल

Share it
Top