तीन पीढ़ियों के श्राद्ध का महत्व

तीन पीढ़ियों के श्राद्ध का महत्व

shraddh-1वेदादि शास्त्रों में- वसु, आदित्य और रुद्र इन तीन देवताओं को क्रमश: पितृ, पितामह और प्रपितामह का पोषण प्रतिनिधि माना है। पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्यू नामक स्थानभेद से प्रकृति के सत्व रज: और तम: रूप त्रैत के कारण भी श्तिस्न एवं देवता:। उक्त त्रैत में ही ‘‘विश्वेदेवा’’ अन्तर्भूत हैं फिर अधिक की आशंका व्यर्थ। सो पितृपोषक देवत्रय के कारण पितरों का त्रैत भी सहैतुक है। विवाह में भी गात्रोच्चारण में पितृ, पितामह, प्रपितामह इन तीनों का ही ग्रहण होता है।
व्यावहारिक जगत में जैसे कानूनन वल्दियत का उल्लेख आवश्यक है, परन्तु संयोगवश पिता-पुत्र दोनों नामों की समानता अन्यत्र मिल जाने पर अन्यान्य उपायों से वास्तविक व्यक्ति का पता लगाना पड़ता है। इसी भांति ब्राह्मणवर्ती अनेक लोकों के प्राणी समूह में पितृ लोकगत प्राणी का निदृष्ट पता लगने के लिए उसकी तीन पीढ़ी का वर्णन किया जाता है जिससे हम अल्पज्ञ प्राणियों के संकल्प से सर्वज्ञ भगवान सुपरिचित होकर अभिमत पितृगणों को अक्षय तृप्ति प्रदान करें। शास्त्र कहता है कि-येन पितु: पितरो ये पितामहास्तेभ्य: पितृभ्योनमसा विधेम।
अर्थात् पितृ, पितामह, प्रपितामाहों को हम श्राद्ध से तृप्त करते हैं।त्रयाणामुदकं कार्य त्रिषु पिंड: प्रवर्तते।
चतुर्थ: सम्प्रदातैषां पंचमो नापि विद्यते?अर्थात् पिता, पितामह और प्रपितामह इन तीनों के श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान होता है। चौथा श्राद्धकर्ता यजमान होता है, यहाँ पाँचवें की कोई सम्भावना ही नहीं है।
श्रद्धया यत् क्रियते तत्-पूज्य पांडुरंग शास्त्री आठवले
भाद्रपद महीने के कृष्णपक्ष के पंद्रह दिन, श्राद्धपक्ष अथवा महालय पक्ष कहलाते हैं। ये दिन पूर्वजों और ऋषि-मुनियों के स्मरण-तर्पण के दिन माने जाते हैं।
जिन पितरों ने और पूर्वजों ने हमारे कल्याण के लिए कठोर परिश्रम किया, रक्त का पानी किया, उन सबका श्रद्धा से स्मरण करना चाहिए और वे जिस योनि में हों, उस योनि में उन्हें दु:ख न हो, सुख और शांति प्राप्त हो, इसलिए पिंडदान और तर्पण करना चाहिए।
घर में कभी न रखें भगवान की ऐसी मूर्तियां
तर्पण करने का अर्थ है तृप्त करना, संतुष्ट करना। जिन विचारों को संतुष्ट करने के लिए, जिस धर्म और संस्कृति के लिए उन्होंने अपना जीवन अर्पित किया हो, उन विचारों, धर्म और संस्कृति को टिकाए रखने का हम प्रयत्न करें, तो वे जरूर तृप्त होंगे।  रोज देव, पितर तथा ऋषियों की तृप्ति रहे ऐसा जीवन जीना चाहिए और वर्ष में एक दिन जिन पितरों को, ऋषि को हमने माना हो उनके श्राद्ध निमित्ता हमारे जीवन का आत्मपरीक्षण करना चाहिए। हम कितने आगे बढ़े और कहाँ भूले थे, उसका तटस्थ बनकर विचार करना चाहिए। श्राद्ध के दिवस भारतीय संस्कृति की महानता, भव्यता, दिव्यता इन ऋषियों की अभारी है। भारत की आज भी विश्व में जो मान्यता है उसका कारण हमारे पूर्वज हैं। स्वयं जलकर लोगों के जीवन प्रकाशित किए, इसलिए समाज उनका ऋणि है। ऋषियों का ऋण अदा करने के लिए उनके विचारों का प्रचार करना चाहिए, उनकी संस्कृति टिकाने का उसका प्रचार करने का प्रयत्न करना चाहिए।  जिन्होंने हमें जन्म दिया, जिनकी कृपा से हम छोटे से बड़े हुए, हमारे कल्याण के लिए जिन्होंने अपने स्वार्थ का त्याग किया, उन पितरों का हम पर ऋण है। कोई भी मानव नि:स्वार्थ भाव से हमारा कुछ काम करे, हम पर कुछ उपकार करे तो हम उसके ऋषि कहलाते हैं। हमारे पितरों ने हमारे पर असंख्य उपकार किए हैं।
उन्हें तृप्ति हो, ऐसा अपने जीवन का निश्चय ध्येय सिद्ध न कर सके तो उसे सिद्ध करने की जिम्मेदारी पुत्र की होती है। ‘‘सम्यक् तनोति-तनु विस्तारे’’ पिता के दिए हुए ध्येय को जो आगे बढ़ाए उसे संतान कहते हैं। ऐसा पुत्र ही पिता का सच्चा तर्पण कर सकता है।
काला कौआ श्राद्ध पक्ष का चहेता

पितृ तर्पण यानी पितरों को याद करके उनके द्वारा दिए हुए ध्येय की ओर मैं कितना आगे बढ़ा, इसका हिसाब निकालना। जो जन्मता है वह मरता है, श्राद्ध के दिन यानी इस अटल मृत्यु का विचार करने के दिन।
मृत्यु को अमंगल मानकर, मृत पितरों और ऋषियों को याद करने के दिनों को भी हम अमंगल समझ बैठे हैं, परन्तु हमारी यह भ्रामक धारणा है। श्राद्ध पक्ष में तो मुझे भी मेरे पितरों की तरह जाना है, उनका स्मरण करके सत्कृत्यों का पाथेय बनाने को तत्पर होना चाहिए।
विविध ऋण से मुक्त होने का इन दिनों में ही विचार करना है, यह समझ आते ही दूसरों को भी यह विचार देना चाहिए। श्रद्धा से जो होता है वह श्राद्ध है! परन्तु आज तो हम श्रद्धा का ही श्राद्ध कर बैठे हैं। परिणामत: मानव जीवन के संबंध में भावनाशून्य ममत्वरहित और यंत्रवत् बने हैं। चार्वाक की परंपरा के लोग आज भी श्राद्ध का मजाक उड़ाते हैं, लेकिन वे मानव जीवन के सही मर्म को समझ नहीं समझ सके हैं।

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