हाल-यूपी:क्यों नहीं रोकी अखिलेश ने सरकारी दफ्तरों से करप्शन..?

हाल-यूपी:क्यों नहीं रोकी अखिलेश ने सरकारी दफ्तरों से करप्शन..?

उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार बीते पांच साल के दौरान सरकारी दफ्तरों में करप्शन को खत्म करने में नाकामयाब रही। उत्तर प्रदेश के सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार सिर चढ़कर बोल रहा है। जन्म प्रमाण पत्र बनवाना है तो पैसा, मृत्यु प्रमाण पत्र चाहिए तो पैसा। आरटीओ से लाइसेंस चाहिए तो पैसा। हर कदम पर खर्च करना पड़ता है पैसा। घूस नहीं तो एक काउंटर से दूसरे काउंटर के चक्कर लगाते रहिए। कमोबेश यही हाल लखनऊ विकास प्राधिकरण का भी है। यहां मकान आवंटन में घोटाले ही घोटाले हैं। उत्तर प्रदेश के सरकारी महकमों में करप्शन के मामलों को दबाने के लिए नए-नए फार्मूले खोजे जाते रहे। पर मजाल है कि दोषियों को पकड़ने के लिए अखिलेश यादव सरकार ने कोई कठोर कदम उठाया हो । बीते पांच साल के दौरान भ्रष्ट सरकारी अफसरों ने दफ्तरों में आग लगानी चालू कर दी। जाहिर है, ये फार्मूला सरकारी बाबुओं ने ही इजाद किया। लोकल सर्कल नाम की एक एजेंसी ने उत्तर प्रदेश की जनता के बीच एक सर्वे किया, जिसमें आम जनता से जुड़े मुद्दों पर उनकी राय पूछी गई। लोकल सर्कल के सर्वे में लोगों से ये सवाल भी पूछा गया कि यूपी सरकार के किस विभाग में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार है। इसके जवाब में 37 फीसद लोगों ने प्रोपर्टी रजिस्ट्रेशन यानी जमीन की खरीद-फरोख्त और उनके रजिस्ट्रेशन में सबसे ज्यादा करप्शन की बात कही जबकी 37 फीसद लोगों का कहना है कि पुलिस महकमा सबसे ज्यादा भ्रष्ट है।
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कुल 16 फीसद लोग मानते हैं कि नगर निगम में भ्रष्टाचार बहुत गहराई तक मौजूद है, जबकि 10 फीसद लोगों ने सबसे भ्रष्ट विभाग का तमगा राज्य कर विभाग यानी स्टेट टेक्सेशन डिपार्टमेंट को दिया। कैशलैस भुगतान को बढ़ावा भ्रष्टाचार कम करने के लिए आने वाली सरकार से लोगों की क्या उम्मीदें हैं? इस सवाल के जवाब में 39 फीसद लोगों ने ऑनलाइन और कैशलैस भुगतान को बढ़ावा देने की बात कही, जबकि 28 फीसद लोग मानते हैं कि जनता के प्रति सरकार की जवाबदेही तय होने से भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी। वहीं 26 फीसद लोग ऐसे भी हैं, जिनका कहना है कि भ्रष्टाचार विरोधी संस्थाओं जैसे लोकायुक्त को और मजबूत किया जाना चाहिए जबकि सात फीसद लोगों का मानना है कि सभी सरकारी दफ्तरों में सीसीटीवी कैमरे लगाने से भ्रष्टाचार में कमी आ सकती है।
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पंजाब केसरी की एक रिपोर्ट के अनुसार, लखनऊ के सरकारी दफ्तरों में आग लगने की घटनाएं आम होती जा रही हैं। आग लगने की घटनाओं के चलते तमाम सवाल पूछे जाने लगते हैं- जैसा कि आग लगी या लगाई गई,,क्यों और किसने लगाई? क्या था इसके पीछे?और इस सब के साथ ही जले हुए दस्तावेजों की तरह भ्रष्टाचार के पूरे मामले भी राख बनकर हवा में उड़ जाते हैं। आपको याद होगा कि कुछ समय पहले लखनऊ के गोमतीनगर स्थित अपट्रान भवन में आग लग गयी। आग भवन के चौथे फ्लोर पर लगी, जहां मिड डे मील प्राधिकरण का दफ्तर है। बील्डिंग से धुंआ निकलता देख गार्ड ने फायर ब्रिगेड को बुलवाया लेकिन, उसे भी संसाधनों की कमी के कारण मशक्कत करनी पड़ी। और फिर सारा मामला दफन कर दिया गया । 

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