करवट लेती दिल्ली और पश्चिम बंगाल की राजनीति

करवट लेती दिल्ली और पश्चिम बंगाल की राजनीति

उपचुनावों से प्राय: बड़े निष्कर्ष नहीं निकाले जाते। फिर भी कुछ उपचुनाव ऐसे भी होते है, जिन्हें नजरअन्दाज भी नहीं किया जा सकता। अभी आठ राज्यों में 10 उपचुनाव हुए। इसमें दिल्ली और पश्चिम बंगाल के परिणान यहाँ की भावी तस्वीर को उजागर करते हैं। यहॉ की राजनीतिक परिस्थिति व चुनाव परिणाम को एक साथ जोड़कर देखा जा सकता है। तब लगेगा कि यह मात्र एक सीट तक सीमित चुनाव नहीं था। इसकी गूँज दूर तक सुनाई देगी। इसे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के क्रियाकलापों से भी समझा जा सकता है। केजरीवाल आम आदमी पार्टी व ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख हैं। अपनी-अपनी पार्टी पर इन दोनों का निरंकुश नियन्त्रण है। इनकी मर्जी से ही पार्टी चलती है। ममता बनर्जी ने अपनी प्रतिष्ठा अवश्य बचा ली। विधानसभा उपचुनाव में उनकी पार्टी को सफलता मिली। बावजूद इसके वह इस पर जश्न नहीं मना सकीं। भाजपा के अप्रत्याशित उभार ने उनकी नींद उड़ा दी है। दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल की प्रतिष्ठा धूल में मिल गयी। दो वर्ष पहले उनकी पार्टी जो सीट भारी बहुमत से जीती थी, तब लगभग आधे वोट उनके प्रत्याशी की झोली में आए थे, इस बार उस सीट पर जमानत तक नहीं बची।  इस क्रम में राजस्थान की धौलपुर सीट का भी उल्लेख किया जा सकता है। क्योंकि यहाँ बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस प्रत्याशी को अपना समर्थन दे दिया था। इससे मुकाबला रोचक हो गया था। बसपा की यहाँ उल्लेखनीय उपस्थिति मानी जाती है। यह माना जा रहा था कि बसपा का समर्थन के बाद कांग्रेस प्रत्याशी की स्थिति मजबूत होगी। इसी के साथ डेढ़ वर्ष बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए विपक्ष की गठबन्धन राजनीति को दिशा मिल जाएगी। भाजपा के मुकाबले विपक्ष का गठबन्धन होगा, और साझा उम्मीदवार उतारा जाएगा। धौलपुर उपचुनाव में यह रणनीति आकार लेने के साथ ही ध्वस्त हो गयी। बसपा का राजस्थान में जो अस्तित्व था, कांग्रेस से गठबन्धन के बाद वह भी खतरे में पड़ गया। बसपा के समर्थक व कार्यकर्ता नाराज है। कांग्रेस में भी एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ने का क्रम शुरू हो गया है।
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पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी बेअन्दाज होकर राजनीति कर रही थीं। उन्होंने वोट बैंक की रीजनीति में हदें लाँघना शुरू कर दिया था। उनके शासन में अनेक स्थानों पर हिन्दुओं के धार्मिक आयोजनों पर रोक लगाई गई। इसके विपरीत उसी समय, उसी मार्ग पर मुसलमानों के आयोजनों को अनुमति प्रदान की गयी। कुछ समय पहले मालदा में एक मुस्लिम सांसद व उसके समर्थकों ने जमकर उत्पात मचाया था। हिन्दुओं की दुकानों में लूटपाट की गयी थी। ममता बनर्जी के प्रशासन ने इसे रोकने का कोई प्रयास नहीं किया। इसका नकारात्मक प्रभाव पूरे पश्चिम बंगाल पर पड़ा। मजहब विशेष के असमाजिक तत्वों के हौसले बुलन्द हुए। ममता बनर्जी ने मान लिया कि वोट बैंक की राजनीति ही धर्मनिरपेक्षता है। इसके तहत हिन्दुओं के साथ उपेक्षा का व्यवहार किया जा रहा था। ममता बनर्जी ऐसा सोची समझी राजनीति के अन्तर्गत कर रही हैं। इसके पहले कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां इसी धर्म निरपेक्षता पर अमल करती थीं। ममती बनर्जी अपने खिलाफ विपक्षी राजनीति को तोड़ना चाहती थीं। वह दिखाना चाहती थीं कि वोट बैंक की राजनीति में उन्होंने कांग्रेस व वामपंथियों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। अब प्रदेश में इन पार्टियों की कोई जरूरत नहीं रही।  ममता बनर्जी की यह रणनीति कामयाब भी रही। उन्होंने कांग्रेस व वामपंथियों की औचित्यहीन बना दिया था। ममता बनर्जी की मजहबी सियासत का विरोध करने का साहस प्रदेश की इन विपक्षी पार्टियों में नहीं था। ऐसे में इनकी भूमिका समाप्त हो गयी थी। विपक्षी राजनीति के मामले में वहॉ शून्यता आ गयी थी। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इस तथ्य को करीब से समझा। भाजपा संगठन को मजबूत बनाने, सक्रियता बढ़ाने के प्रयास किए गए। शून्य तो मरना ही था। विपक्षी दायित्वों से कांग्रेस व वामपंथी भाग रहे थे। भाजपा इस कमी को पूरा कर रही थी।
उपचुनाव में भाजपा के इन प्रयासों की सफलता दिखाई दी। जीत सत्तारूढ़ तृणमूल को मिली। लेकिन मुख्य विपक्षी पार्टी का मुकाम भाजपा को मिला। पश्चिम बंगाल की राजनीति कुछ समय तक अलग थी। कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकता था कि कांग्रेस व वामपंथियों को भाजपा बहुत पीछे छोड़ देगी। उपचुनाव में भाजपा को तीस प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले। यह वह क्षेत्र था जहां भाजपा को मजबूत नहीं माना जाता था। लेकिन विपक्षी राजनीति में सक्रियता उसकी लोकप्रियता बढ़ा रही है। आगामी चुनाव भाजपा व तृणमूल के बीच हो तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
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दिल्ली की राजनीति भी करवट ले रही है। आम आदमी पार्टी नई उम्मीदो के साथ जन्मी थी। अन्ना हजारे की विरासत, ईमानदारी व बेदाग छवि उनके साथ थी। इसका भरपूर ज्ञान भी मिला। अरविन्द केजरीवाल के वादे-दावे भी बहुत आकर्षक थे। उनका दावा था कि अच्छी छवि वाले ही उनकी पार्टी में रहेंगे। शासन को भ्रष्टाचार मुक्त किया जाएगा। पार्टी में मजबूत आन्तरिक लोकपाल होगा। वह मुख्यमंत्री आवास की जगह फ्लैट में रहेंगे, वी.आई.पी. कल्चर समाप्त होगा, सुरक्षा का तामझाम नहीं रहेगा। बानगी के तौर पर चुनाव पूर्व केजरीवाल ऑटो, मेट्रो व अपनी नीली वैगन आर कार में चलते थे। लेकिन अलग राजनीति का प्रत्येक दावा वह खुद ही रौंदते रहे। जो कहा उसके पूरी तरह विपरीत आचरण किया। दिल्ली के अपने दायित्वों का केजरीवाल ने कभी सम्मान ही नहीं किया। एक झटके में राष्ट्रीय राजनीति के शिखर पर पहुंच जाना चाहते थे। नरेंद्र मोदी से नीचे उनकी कोई बात नहीं होती थी। दिल्ली को उसके हाल पर छोड़कर वह गोवा और पंजाब में सरकार बनाने निकल गए। यहां गलत लोगों की सहायता लेने में भी उन्होंने कोई संकोच नहीं किया। बचीखुची छवि थी वह भी चौपट कर ली, चुनाव में मुंह की खाई, वह अलग। उप चुनाव में आम आदमी पार्टी की केवल जमानत ही जब्त नहीं हुई, उसके प्रति नाराजगी भी दिखाई दी। स्पष्ट है दिल्ली व पश्चिम बंगाल की राजनीति बड़े बदलाव की ओर बढ़ रही है।
 -डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

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