दिल्ली में फिर होगी राजनीतिक दलों की परीक्षा…!

दिल्ली में फिर होगी राजनीतिक दलों की परीक्षा…!

दिल्ली के तीनों नगर निगमों के चुनाव कार्यक्रम की घोषणा चुनाव आयोग द्वारा कर दी गई है। दिल्ली में 22 अप्रैल को मतदान होगा जबकि चुनाव नतीजे 25 अप्रैल को घोषित किये जाएंगे। वहीं इन चुनावों की नामांकन प्रक्रिया 27 मार्च से शुरू होगी। दिल्ली नगर निगम के चुनावों को लेकर राजनीतिक दलों द्वारा राजनीतिक कसरत बहुत पहले से शुरू कर दी गई थी। इसके तहत चुनावी जमावट को अंजाम देने के साथ-साथ उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया भी प्रगति पर है। दिल्ली देश की राजधानी है इसलिए यहां के नगर निगम चुनावों का भी खासा महत्व है। वहीं राजनीतिक दलों के लिए यह चुनाव इसलिए खास अहमियत रखते हैं क्यों कि इन चुनावों में राजनीतिक दलों का वर्चस्व राष्ट्रीय राजधानी के विकास एवं कल्याण का मार्ग प्रशस्त करेगा। चुनाव आयोग द्वारा दिल्ली नगर निगम के चुनाव भी ईवीएम के माध्यम से कराने का निर्णय लिया गया है। इससे पहले आम आदमी पार्टी एवं कांग्रेस द्वारा ईवीएम की विश्वसनीयता पर संदेह जताते हुए दिल्ली नगर निगम के चुनाव मत पत्रों के जरिये संपन्न कराए जाने की मांग उठाई गई थी। चुनाव आयोग द्वारा यह चुनाव ईवीएम के जरिये ही संपन्न कराए जाने के निर्णय से संशय खत्म हो गया है। वैसे आजकल ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर सवाल काफी उठ रहे हैं, ऐसे में चुनाव आयोग की जिम्मेदारी बनती है कि वह राजनीतिक दलों की चिंताओं पर ध्यान दे। उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव नतीजे घोषित होने के बाद बसपा प्रमुख मायावती ने ईवीएम में धांधली का आरोप लगाते हुए चुनाव निरस्त करने तक की मांग कर डाली, वहीं समाजवादी पार्टी व कांग्रेस ने भी कुछ ऐसे ही सवाल उठाए हैं। इन सबके बावूजद अगर चुनाव आयोग अपनी बातों पर लगातार कायम रहते हुए ईवीएम में गड़बड़ी की आशंकाओं को बिना जांच-पड़ताल करवाए ही नकार रहा है तो इसे आश्चर्यजनक ही माना जायेगा।
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अभी एकाध दिन ईवीएम को लेकर समाजवादी पार्टी द्वारा चुनाव आयोग जाने की बात भी कही जा रही थी। बाद में सपा नेताओं ने इस मुद्दे पर क्या निर्णय लिया तथा वह सुप्रीम कोर्ट जाएंगे या नहीं, यह उनके विवेक पर निर्भर करता है लेकिन जब ऐसा बताया जा रहा है कि जापान जैसे बड़े देशों में भी मतदान मत पत्रों के जरिये ही कराया जाता है, भले ही ईवीएम से जुड़े तकनीकी उपकरण जापान द्वारा भारत को उपलब्ध कराए जाते हों तो फिर यहां सवाल यह उठता है किआखिर जापान जैसे संपन्न देश अपने यहां के चुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल क्यों नहीं करते। यहां सवाल सिर्फ यूपी चुनाव का ही नहीं है, यहां मुद्दा देश की पूरी निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र है तथा यहां लोगों को निर्धारित मापदंडों को पूरा करते हुए चुनावी भाग्य आजमाने की पूरी-पूरी आजादी तथा अधिकार प्राप्त है। फिर चाहे अमीर हो या गरीब, ताकतवर हो या निर्बल। कोई भी अगर चुनाव लडऩा चाहे तो उसके चुनावी भाग्य आजमाने में कोई रोक-टोक नहीं है। ऐसे में अगर कुछ ताकतवर व प्रभावशाली संगठन, समूह या लोग कथित तौर पर ईवीएम में धांधली के माध्यम से चुनाव जीत जाएंगे तब तो फिर आम आदमी का लोकतंत्र पर से विश्वास ही उठ जाएगा। चुनाव लडऩा तो सच्चे, नेक नीयत वाले व ईमानदार लोगों के वश की बात ही न रह जायेगा। फिर तो छलकपट, प्रपंच तथा संपर्क, जुगाड़ व ताकत पर भरोसा रखने वाले लोगों का ही देश के राजनीतिक जगत व चुनावी प्रक्रिया पर कब्जा हो जाएगा। वह चाहे किसी भी विचारधारा या राजनीतिक दल वाले लोग हों लेकिन अगर वह जुगाड़ से चुनाव जीतेंगे तो लोकतंत्र के सुखद भविष्य की दृष्टि से इसके नतीजे घातक ही होंगे। यूपी के विधानसभा चुनाव संपन्न होने के बाद अगर ईवीएम को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं तो चुनाव आयोग को चाहिये था कि वह दिल्ली का नगर निगम चुनाव मत पत्रों के जरिये ही संपन्न कराता ताकि राजनीतिक दलों की चिंताओं का भी समाधान हो जाता तथा चुनाव प्रक्रया भी निष्पक्ष व निर्बाध रूप से संपन्न हो जाती।
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लेकिन चुनाव आयोग अपना रुख छोडऩे को तैयार नहीं है। वैसे ईवीएम को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, उनमें कुछ न कुछ सच्चाई तो है ही। अभी कुछ दिनों पूर्व महाराष्ट्र के नगरीय निकाय चुनाव संपन्न हुए हैं। उक्त चुनाव में एक ऐसा प्रकरण सामने आया है जो ईवीएम की साख पर ही सवाल खड़ा करता है। महाराष्ट्र के एक नगरीय क्षेत्र में एक व्यक्ति द्वारा निर्दलीय चुनाव लड़ा गया था। उक्त व्यक्ति ने चुनाव में पूर्ण उत्साहपूर्वक भाग लिया लेकिन जब वोटों की गिनती हुई तो उसे एक भी वोट नहीं मिला, इसे ईवीएम का ही कमाल कहा जाएगा। क्यों कि उक्त व्यक्ति खुद भी संबंधित निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता था, जिसके द्वारा खुद के पक्ष में मतदान किये जाने के साथ ही उसके परिजनों, इष्टमित्रों, शुभचिंतकों ने भी वोट दिये होंगे। लेकिन जब मतगणना हुई तो उक्त व्यक्ति के खाते में एक भी वोट दर्ज हुआ नहीं मिला। इस तरह से यह ऐसे तथ्य हैं जो साबित करते हैं कि ईवीएम की विश्वसनीयता संदिग्ध है। सिर्फ इतना ही नहीं एकाध बार तो सुप्रीम कोर्ट भी ईवीएम की विश्वसनीयता पर संदेह जता चुका है। ऐसे में चुनाव आयोग की यह जिम्मेदारी है कि वह खुद को सच साबित करने के लिये हठधर्मिता का रास्ता न अपनाए। हां अगर वैध व वांक्षित चुनाव प्रक्रिया के माध्यम से किसी भी राजनीतिक दल या उम्मीदवार को चुनावी जीत मिलती है तो यह सुखद व लोकतंत्र के लिये मंगलकारी होगा लेकिन अगर संपूर्ण प्रक्रिया संदेहास्पद स्थिति में संपन्न होगी तो सवाल अवश्य उठेंगे तथा जिम्मेदारों द्वारा इसका जवाब दिये जाने के साथ ही उनकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिये।-सुधांशु द्विवेदी

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