नरेन्द्र मोदीः ‘ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर’

नरेन्द्र मोदीः ‘ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर’

पांच राज्यों की विधानसभा चुनाव परिणाम की सबसे सटीक समीक्षा किया है जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने-भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों को 2024 के चुनाव तैयारी करने का परामर्श देकर। पांच राज्यों विशेषकर उत्तर प्रदेश के परिणाम को 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए ”सेमीफाइनल” घोषित कर बिहार के समान उत्तर प्रदेश में भी महागठबंधन बनाने के अभियान इसी नारे के साथ शुरू किया गया था, जो समाजवादी और कांग्रेस के गठबंधन भर तक सीमित रह गया और उसका अभूतपूर्व पराजय का संज्ञान लेकर ही उमर अब्दुल्ला ने 2019 में मोदी को घेरने के इरादे से एकजुट होने की आकांक्षा रखने वालों को आइना दिखा दिया है। लोकसभा के 2014 के समान ही उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में विद्यमान लहर और मणिपुर में बहुमत पाने से वंचित रहने तथा गोवा की सत्ता फिसलने के बावजूद भाजपा समर्थक मतदाताओं की संख्या में कोई उतार नहीं हुआ है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में चालीस प्रतिशत से अधिक और मणिपुर और गोवा में 36 प्रतिशत मतदाताओं का समर्थन इस बात का सबूत है कि नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व की विश्वसनीयता में कोई कमी नहीं आई है। यह ठीक है कि मणिपुर ओर गोवा में भाजपा को कांग्रेस से कम सीटें मिली हैं लेकिन दोनों ही राज्यों में उसका मत प्रतिशत कांग्रेस से अधिक रहा है। मत प्रतिशत की अधिकता के बावजूद कम सीटें मिलना भी इस बार के चुनाव की विशेष उल्लेखनीय तथ्य बना है।
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जहां तक उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड का चुनाव परिणाम है, वैसी सुनामी की अपेक्षा शायद ही किसी ने किया होगा, लेकिन दोनों राज्यों के चुनाव परिणाम ने 2014 के समान ही आंकलनकर्ताओं को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की जनसमुदाय में पैठ के बारे में सही अनुमान लगाने में एक बार फिर नाकाम साबित कर दिया है। जो चुनाव मैंदान में थे, वे तो अपनी अभूतपूर्व जीत का दावा कर ही रहे थे, आंकलनकर्ता भी भाजपा के सबसे बड़ी पार्टी होने और त्रिशंकु विधानसभा परिणाम से आगे बढ़ने का साहस नहीं दिखा पाए। जो जनता के मन में था, उसे समझ पाने की असफलतता का एक बहुत बड़ा कारण यह हो सकता है कि संसद से लेकर सड़क तक विभिन्न राजनीति दलों ने संसद में सामूहिक रूप से और अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में अलग-अलग केंद्रीय सरकार की नीतियों तथा मोदी के व्यक्तित्व के खिलाफ जो धुंआधार अभियान चला रहे थे, उसके प्रति अवाम का मूकदर्शक होना उन्हें अपने प्रति अनुकूलता लग रही थी। भारतीय जनमानस ने कुत्सित अभियानों पर मौन रहकर मतदान के रूप में प्रतिक्रिया कर यह साबित कर दिया है कि अब वह परिपक्व हो गई है तथा उसे किसी प्रचार की आंधी से उड़ाकर भटकाया नहीं जा सकता। पांच राज्यों के चुनाव परिणाम मतदाताओं के नीर -क्षीर विवक का परिचायक है। यह परिचय उसने सिर्फ उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में ही नहीं अपितु तस्करी आपदा पीड़ित पंजाब, आन्तरिक कलह से ग्रस्त गोवा और नवीन आकांक्षा से वशीभूत मणिपुर में भी दिया है। भारत के एक पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम ने चुनाव परिणाम के बाद कहा है कि नरेंद्र मोदी का नेतृत्व देशव्यापी प्रभावशाली बन गया है। उनके मुकाबले का कोई और व्यक्तित्व नहीं है। कांग्रेस पार्टी के वे आज भी सांसद हैं। सन् 2014 के चुनाव में पराजय का आंकलन कर ही वे संभवतः चुनाव मैदान से बाहर रहे थे। फिर भी कांग्रेस में राहुल गांधी को काग्रेस की पूर्णतः कमान सौंपे जाने से उनको इनकार भी नहीं था।
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लोकसभा चुनाव में पस्त होने के बावजूद समझदार माने जाने वाले कांग्रेसियों-मनमोहन सिंह, पी. चिदंबरम, गुलाम नबी आजाद, पूर्व रक्षा मंत्री एंटोनी ने जैसी अभिव्यक्ति और आचरण किया है, कांग्रेस में राहुल गांधी के नेतृत्व के जकड़न से मुक्ति पाने की अकुलाहट भी प्रगट होने लगी है। इसका स्पष्ट संकेत इस बात में भी है कि पंजाब में भारी सफलता मिलने के बाद उसके नेता अमरेन्द्र सिंह ने उसका श्रेय राहुल गांधी को प्रदान करना स्वीकार नहीं किया। 2019 के लिए विपक्षी गठबंधन की अगुआ के रूप में जिन अन्य नामों को उछाला गया-या जो स्वयं ही उछल रहे थे, उनमें एक दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की स्वच्छ प्रशासन देने की ढोल की पोल खुल जाने के बाद बंद हो गई है। दूसरे बंगाल से इस्ट इंडिया कंपनी के समान दिल्ली पर कब्जा करने के धावा बोलने वाली ममता बनर्जी की वाणी अवरूद्ध हो गई है, और तीसरे नीतीश कुमार ने उत्तर प्रदेश में विपक्षियों की पराजय का मुख्य कारण नोटबंदी के निर्णय का विरोध करना बताकर अपनी भावी राजनीति की मंशा साफ कर दी है। इसलिए पी. चिदंबरम की यह स्वीकारोक्ति कि नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व की छाप देशव्यापी हो गई है तथा उमर अब्दुल्ला द्वारा विरोधी दलों को 2024 के निर्वाचन की तैयारी करने के परामर्श ने वर्तमान चुनाव को 2019 के लिए सेमीफाइनल बताने वालों को आईना दिखा दिया है। अगले कुछ महीनों में यह स्पष्ट होना चाहिए कि भाजपा और नरेंद्र मोदी विरोधी अपने सर्जिकल स्ट्राइक या नोटबंदी पर अपनायी गई आत्मघाती रणनीति पर चलकर नरेंद्र मोदी की साख को गहराई प्रदान करेंगे अथवा अपने अंदर की खामियों की समीक्षा कर जनता के बीच विश्वसनीयता पाने के लिए ठोस और मर्यादित विपक्ष की भूमिका निभाएंगे। क्या वे मोदी का विरोध और देश के विरोध में अंतर कर सकेंगे अथवा देशहित विरोध को मोदी विरोध के एजेंडे पर कायम रहेंगे। चुनाव के ठीक मौके पर लखनऊ में आतंक विरोधी दस्ते द्वारा एक ऐसे आतंकी को ढेर किया गया जिसके पिता ने भी उसकी लाश तक लेने से इंकार कर दिया।
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उस घटना को फर्जी एनकाउंटर कहकर संदिग्ध बनाने के कोशिश से यह सवाल भी है कि सर्जिकल स्ट्राइक को फर्जिकल स्ट्राइक बताने और आतंकियों के उन्मूलन की कार्यवाही पर उनके प्रति सहानुभूति जैसी अभिव्यक्ति का सिलसिला बना रहेगा या फिर वोट हित के लिए विखंडन को बढ़ावा देने वाली जेएनयू और रामजस कालेज की घटना के पैरवीकार बने रहने का काम किया जायेगा। विपक्षी दलों के नेताओं को यह समझ लेना चाहिए कि केवल अवाम ने ही नहीं बल्कि उनके अपने कॉडर ने भी इस प्रकार के आचरण का समर्थन नहीं किया है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने-जो बड़ी उड़ान भरी थी और 2019 में मोदी का विकल्प बनने का सपना दिखाने वालों से सम्मोहित होकर मदहोश थे, मतदान के बाद एक प्रतिक्रिया में कहा कि यदि प्रधानमंत्री न छा जाते तो भाजपा हवा में उड़ जाती। इस कथन के पीछे उनकी जो भी मंशा रही हो लेकिन निष्कर्ष तो यही निकलता है कि मोदी के व्यक्तित्व का जादू उनके भी सिर चढ़कर बोला है। वे अपने शीर्ष को फर्श पर बैठाकर जिस आकांक्षा से कांग्रेस के लिए ही बोझिल बने राहुल गंधी के साथ-दो लड़कों का साथ पसंद है की धुन में धुत थे, चुनाव परिणाम के बाद बुत बन गए हैं। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जिन्हें उन्होंने फर्श पर बैठा दिया है, वे अपने पहलवानी अंदाज में अखिलेश को उनकी असली औकात पर ला दें। जहां ये चुनावी परिणाम देश की राजनीतिक दलों के खोखलेपन को उजागर करता है, जो यह समझते हैं कि विज्ञापनों पर अरबों रुपया फूंककर वे ”काम बोलता है” कुछ एक चमकीलेपन से चकाचौंध करने को सर्वोत्तम उपाय बताते थे, वे ”कारनामा बोलता है” के एक ही बार से कैसे बेसुध हो गए। यह परिणाम नरेंद्र मोदी के काम को बिना बोले समझने का दायरा बढ़ते जाने का भी उदाहरण पेश करता है। एक विज्ञापन आता है सफेदी की चमत्कार-बार-बार लगातार। नरेंद्र मोदी की सकारात्मक व्यवस्थासंचालन पर अर्नगल दोषारोपण की आंधी के दौर में उनका ”चमत्कार बार-बार लगातार” प्रगट हो रहा है। लीक से हटकर विश्वसनीयता की जैसी अपूर्वता नब्ज परखने का पैमाना बनना चाहिए न दैन्यम-न पलायनम् और सबका साथ-सबका विकास पर अडिगता नरेंद्र मोदी की चमत्कारिता का मूल मंत्र है। पी. चिदंबरम ने उनके देशव्यापी नेता होने की अभिव्यक्ति कर बड़ी बात को स्वीकारा अवश्य है, लेकिन संकोच के साथ। कबीर के अनुसार न काहू से दोस्ती ना काहू से बैर के आधार पर सबकी खैर चाहने वाले नरेंद्र मोदी सर्वश्रेष्ठ भारतीय सपूत के रूप में अपनी पहचान बढ़ाते जाने में सफल हो रहे हैं। नरेंद्र मोदी ने भारत की राजनीति को कुछ का हित और खुद का विकास की सड़न भरी गली से निकालकर सबका साथ-सबका विकास के राजपथ पर खड़ा कर दिया है।-राजनाथ सिंह ‘सूर्य’

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