‘मोदी मैजिक’ तथा प्रधानमंत्री के साहसिक निर्णयों को मिला जनादेश..!

‘मोदी मैजिक’ तथा प्रधानमंत्री के साहसिक निर्णयों को मिला जनादेश..!

जनता ने तीन वर्ष पूर्व तक एक ऐसा प्रधानमंत्री देखा जो पूरे 10 बरस देश का नेतृत्व संभालने की जगह एक नौकरशाह की तरह मौनव्रत धारण कर मात्र ‘आलाकमान’ का आदेश पालन करता रहा हो। उसी जनता ने ऐसे प्रधानमंत्री को देखा है जो मुखर तो है ही, आमजन की समस्याओं को गहराई तक समझ-बूझ कर न सिर्फ निर्णायक पहल करता है, बल्कि अपने निर्णयों पर बिना हिचकिचाहट अडिग रहने का हौसला भी रखता है। प्रश्न है कि जनता उसके साथ क्या व्यवहार करेगी? क्या वही नहीं, जो उत्तरप्रदेश की जनता ने विधानसभा के चुनावों में भाजपा के एकमात्र चेहरा रहे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के खाते में 312 (सहयोगियों के साथ 325) सीटों का अपार बहुमत देकर किया है? जोड़-बाकी, गुणा-भाग लगानेवाले भले ही किसी भी गणितीय सूत्र से इस समीकरण को सिद्ध करें, उनके हिसाब का एक अनिवार्य पक्ष यह भी रहेगा कि उत्तर प्रदेश की जीत प्रधानमंत्री मोदी के साहसिक निर्णयों को मिला जनादेश है। किसी भी राष्ट्र के जीवन में हजार-पांच सौ वर्ष का समय उसी प्रकार का होता है, जैसे किसी व्यक्ति के जीवन में दो-चार दिन। ऐसे में मात्र 5-6 सौ वर्ष पूर्व का एक घटनाक्रम देखें- देश में अकबर की बादशाहत है। महानता उसका स्वाभाविक शासकीय निर्णय है (ठीक उसी तरह जैसे आज विधायक या सांसद को माननीय, राज्यपाल व राष्ट्रपति महामहिम का संबोधन पाते हैं।)। अकबरी दरबार में मानसिंह जैसे राजा भी हैं जो सुयोग्य होते हुए भी साहस के अभाव में व्यक्तिगत मान-अपमान से अधिक ‘सुखपूर्ण जीवन’ को महत्व देते हैं। किन्तु ये औपचारिक महान हैं। देश के आमजन के हृदय की महानता का श्रोत तो मेवाड़ के सूर्य महाराणा प्रताप के लिए आरम्भ होता है और वहीं समाप्त भी हो जाता है। औरंगजेब के समय शिवाजी या छत्रसाल इसलिए महान नहीं बनते कि वे विपरीत परिस्थिति में भी राज्य स्थापित करने में सफल रहे। वे इसलिए महान हैं कि उन्होंने लोक की भावनाओं को तृप्त किया।
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सन् 1857 की क्रान्ति के नायक नानासाहब, रानी लक्ष्मीबाई आदि अंगरेजों द्वारा अपराधी करार दिए जाने के बावजूद लोकमन व लोकगाथाओं के नायक इसीलिए बने कि उनके प्रयास लोक की सुप्त आकांक्षाओं को मूर्तरूप देने का प्रयास थे। अंगरेजी शासनकाल में उसकी सत्ता से टकरानेवाले भगतसिंह, चंद्रशेखर सरीखे क्रान्तिकारी हों या सुभाष जैसे नेता, महात्मागांधी-नेहरू जैसे नेतृत्वकर्ता हों या पटेल जैसे युगनिर्माता, शास्त्री जैसे सादगी सम्पन्न नेता हों या इंदिरा गांधी जैसे दुस्साहसी बंगलादेश की निर्माता। सभी लोक के हृदय में स्थान पाने में इसीलिए सफल रहे कि उनके निर्णय लोक आकांक्षाओं के अनुरूप थे। ऐसे में देश को जब अटलबिहारी वाजपेयी जैसे परिपक्व नेतृत्व के बाद मनमोहन जैसे मौनी बाबा तथा दूसरे के संकेतों पर निर्णय लेनेवाले नौकरशाह मानसिकता के नेता मिले तो कांग्रेस की दलीय राजनीति भले ही तुष्ट हुई हो, जनमन को कहीं से भी संतुष्टि न थी। परिणाम, 2014 के लोकसभा चुनाव में देश को नरेन्द्र मोदी सरीखा गुजरात का जाना-परखा नेतृत्व मिला तो उन्हें आशा की एक ऐसी किरण दिखाई दी कि देश ने उसे अपूर्व समर्थन दे डाला। उत्तर प्रदेश में तो 80 में 73 स्थान दिये गये। संभव था कि इसके बाद भाजपा भी कांग्रेस-गति की ओर अग्रसर होती। मध्य के काल में आए छिटपुट परिणामों से तथा देश में सुनियोजित ढंग से उछाले गये असहिष्णुता जैसे सवालों से ऐसा लगा भी। किन्तु प्रधानमंत्री के रूप में मोदी द्वारा एक के बाद एक लिये गये साहसिक निर्णयों ने बहुत जल्द देश में इस कृतिम कुंहासे को छांट देश के विकास का ऐसा आभामंडल प्रज्ज्वलित कर दिया जहां नंगी आंखों से ही नहीं- आंखें बंद कर भी देखा और महसूस किया जा सकता था। मोदी द्वारा चलाई गयी जनहित की योजनाओं के लाभ जैसे-जैसे आमजन तक पहुंचते गये, लोग मोदी के और भी अधिक मुरीद होते गये। स्वयं मोदी- देश की जनता के समर्थन का अखंड विश्वास मन में लिए इस हद तक अति साहसी बने कि पड़ोसी देश को उसकी नापाक हरकतों का उसकी सीमाओं में घुसकर जबाव दे डाला। उन्होंने ठीक चुनाव से पूर्व ‘नोटबंदी’ जैसा साहसिक निर्णय लेने की भी हिम्मत जुटाई। सोच कर देखिए- ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ से लेकर ‘नोटबंदी’ तक के सफर में सफल रहने के बावजूद विपक्ष की आलोचनाओं के केन्द्र में रहनेवाले मोदी अगर किसी मोर्चे पर असफल रहे होते तो? इस ‘तो’ के साहस का नाम ही तो मोदी है जो 15 बरस गुजरात में अपना डंका बजवाने के पश्चात सम्पूर्ण भारत ही नहीं वैश्विक पटल पर अपनी छाप छोड़ रहा है, नये-नये कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। भाजपा की इस जीत में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य, राजनाथ सिंह, उमा भारती, योगी आदित्यनाथ से लेकर सुनील बंसल, रमेश बिधूड़ी, ओमप्रकाश माथुर सरीखे नेताओं से लेकर आम कार्यकर्ताओं की मेहनत का तो योगदान था ही, विपक्ष द्वारा मोदी पर किये गये आक्रमणों का भी कम हाथ न रहा। विपक्ष के नेता ज्यो-ज्यों मोदी पर व्यक्तिगत स्तर तक आक्रामक होते गये, मोदी और भाजपा का ग्राफ उतना ही ऊंचा उठता गया। चुनाव के दिनों में हुई विपक्षी नेताओं की जनसभाओं तथा उसमें हुए नेताओं के भाषणों का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि उनके अभियान अपने दल की नीतिओं के प्रचार में कम मोदी की आलोचना में अधिक हुए। प्रदेश की सत्तारूढ समाजवादी पार्टी के अपने पिता व चाचा को अपदस्थ कर अध्यक्ष बने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की चुनावी सभाओं में सपा की या अपने कार्यकाल की उपलब्धियों में अखिलेश के पास अभी तक अदृश्य ‘लखनऊ मेट्रो’, ‘आधा-अधूरा लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे’, डायल100, 102, 108 व 1090 सेवाएं, लैपटॉप, पेंशन योजना आदि तो थीं, वे कानून-व्यवस्था जैसे सवालों पर मौन थे। अखिलेश का शेष समय मोदी की नीतियों- खासकर नोटबंदी- का विरोध तथा कथित ‘अच्दे दिनों’ के जुमले पर व्यंग्य करने में गुजरता था। आश्चर्य तो तब होता था जब प्रदेश की जनता के ‘अच्छे दिन लाने का दायित्व लेकर सत्ता संभालने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री अपनी सभाओं में सवाल उछालते कि ‘अच्छे दिन आए?’ और जबाव में इंकार सुन ऐसे प्रसन्न होते, मानो उन्होंने अपने कार्यकाल के पांच वर्ष अच्छे दिन न लाने के प्रयास में गुजारे हों। चुनाव-प्रचार के तीसरे-चौथे चरण में तो अखिलेश की हताशा देखने लायक थी। वे मुद्दों को छोड़ कभी ‘गुजराती गधों’ के संकेत से मोदी पर व्यक्तिगत प्रहार करते, कभी करंट के तारों को छूने की बात करते। उधर, 27 साल यूपी बेहाल का अभियान बीच में ही छोड़ और अपनी खाट खड़ी करते-करते चुनाव से पहले सपा के सहयोगी बने कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी की सभाएं तो भाजपा की सभाओं से भी अधिक मोदीमय नजर आती थीं। उनके द्वारा मंचों से उछाले गये बचकाने सवाल जनता का भरपूर मनोरंजन भले ही कर रहे हों- मोदी के खिलाफ नहीं हो पाये। प्रदेश की सभी 403 सीटों पर लड़कर सत्ता प्राप्ति का स्वप्न देख रही बसपा की मायावती अपने लिखित भाषणों में मोदी-विरोध की आड़ में जनता को इस तरह भयभीत कर रही थीं, मानो मोदी का आना ही देश के सारे संकटों की जड़ हो। प्रदेश की जनता ‘नोटबंदी’ के कारण ध्वस्त हुए उनके मंसूबों, इस दौरान उनकी पार्टी के खातों में जमा हुई करोड़ों की धनराशि के खुलासे आदि के चलते अपने मन में घर किये उस आरोप की पुष्टि ही कर रही थी कि ‘वे दलित की नहीं दौलत की बेटी’ हैं। कुल मिलाकर 2017 के परिणाम भाजपा की कुशल रणनीति, प्रत्येक चरण में बदलती गयी नीति, पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं की मेहनत का परिणाम होने के साथ-साथ ‘मोदी मैजिक’ तथा प्रधानमंत्री के साहसिक निर्णयों के पक्ष में मिला जनादेश है। हां, यह जनादेश भाजपा के लिए चेतावनी भी है कि अगर वे जन अपेक्षाओं पर खरे न उतरे तो जनता उनका भी रालोद, कांग्रेस, बसपा और सपा जैसा हाल करने से नहीं चूकने वाली।-कृष्णप्रभाकर उपाध्याय

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