पति की दीर्घायु के लिए रखती हैं सुहागिन करवा चौथ व्रत

पति की दीर्घायु के लिए रखती हैं सुहागिन करवा चौथ व्रत


इलाहाबाद,सफल और खुशहाल दाम्पत्य जीवन की कामना के साथ कल उत्तर प्रदेश समेत समूचे देश में सुहागिन महिलायें करवा चौथ का व्रत रखेंगी।आधुनिकता की चकाचौंध ने भले ही सभी तीज-त्यौहार को प्रभावित किया हो लेकिन सदियों पुराना करवा चौथ का व्रत सुहागिन स्त्रियाँ पति की दीर्घायु के लिए श्रद्धा एवं विश्वास के साथ करती हैं। मोबाइल फोन और इंटरनेट के दौर में 'करवा चौथ' के प्रति महिलाओं में किसी भी प्रकार की कमी नहीं आयी बल्कि इसमें और आकर्षण बढ़ा है।
शास्त्रों-पुराणों में वर्णन मिलता है कि यह व्रत जीवन साथी के स्वस्थ और दीर्घायु होने कि कामना से किया जाता था।पर्व का स्वरुप थोड़े फेरबदल के साथ अब भी वही है। कभी करवाचौथ पत्नी के, पति के प्रति समर्पण का प्रतीक हुआ करता था, लेकिन आज यह पति-पत्नी के बीच के सामंजस्य और रिश्ते की ऊष्मा से दमक और महक रहा है।
आधुनिक होता दौर भी इस परंपरा काे डिगा नहीं सका है बल्कि इसमें अब ज्यादा संवेदनशीलता, समर्पण और प्रेम की अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करकचतुर्थी (करवा-चौथ) व्रत करने का विधान है।इस व्रत की विशेषता यह है कि सौभाग्यवती स्त्रियों को ही यह व्रत करने का अधिकार है। स्त्री किसी भी आयु, जाति, वर्ण, संप्रदाय की हो, सबको इस व्रत को करने का अधिकार है।
सौभाग्यवती (सुहागिन) स्त्रियाँ अपने पति की आयु, स्वास्थ्य एवं सौभाग्य की कामना करती हैं।मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए कहीं कहीं कुंवारी कन्यायें भी आजकल इस व्रत को करने लगी हैं। समाजशास्त्र से एम ए कर रही अनु तिवारी ने बताया कि करवा चौथ के दिन अब पत्नी ही नहीं पति भी व्रत करते हैं। यह परंपरा का विस्तार है।
करवा चौथ को अब सफल और खुशहाल दाम्पत्य की कामना के लिए किया जा रहा है।करवाचौथ अब केवल लोक-परंपरा नहीं रह गई है। पौराणिकता के साथ-साथ इसमें आधुनिकता का प्रवेश हो चुका है और अब यह त्योहार भावनाओं पर केंद्रित हो गया है। हमारे समाज की यही खासियत है कि हम परंपराओं में नवीनता का समावेश लगातार करते रहते हैं।
यह पर्व पति-पत्नी तक ही सीमित नहीं हैं।दोनों चूंकि गृहस्थी रुपी गाड़ी के दो पहिये है। निष्ठा की धुरी से जुड़े हैं इसलिए संबंधों में प्रगाढता के लिए दोनो ही व्रत करते हैं। देश में लगभग सभी राज्यों में करवा चौथ मनाया जाता है लेकिन उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान में प्रमुखता से मनाया जाता है।
यह पर्व सौभाग्यवती (सुहागिन) स्त्रियाँ मनाती हैं।यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले करीब चार बजे के बाद शुरू होकर रात में चंद्रमा दर्शन के बाद संपूर्ण होता है।
उन्होंने बताया कि ग्रामीण स्त्रियों से लेकर आधुनिक महिलाओं तक सभी नारियाँ करवाचौथ व्रत बडी श्रद्धा, विश्वास एवं उत्साह के साथ रखती हैं।
शास्त्रों के अनुसार यह व्रत कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्थी के दिन मनाया जाता है।
इस दिन मां पार्वती की पूजा करने से अखंड सौभाग्‍य का वरदान प्राप्‍त होता है।
  • मां पर्वती के साथ उनके दोनों पुत्र गणेश और कार्तिकेय की भी पूजा की जाती है।अनु ने बताया कि वर्तमान समय में करवा चौथ व्रत पर्व ज्यादातर महिलाएं अपने परिवार में प्रचलित प्रथा के अनुसार ही मनाती हैं लेकिन अधिकतर स्त्रियां निराहार रहकर चन्द्रोदय की प्रतीक्षा करती हैं।
इस व्रत में चंद्रमा का बहुत महत्व है।
चंद्रमा की पूजा करने के बाद ही सुहागन औरतें अपने पतियों का चेहरा देखती हैं और व्रत खोलती हैं।
चंद्रमा को शीतलता और पूर्णता का प्रतीक माना जाता है और इससे मिली मानसिक शांति से रिश्ते मजबूत होते हैं।
चंद्रमा को लंबी आयु का वरदान मिला है।
चांद के पास प्रेम और प्रसिद्धि है।
यही वजह है कि सुहागिनें चंद्रमा की पूजा करती हैं, जिससे चन्द्रमा के गुण उनके पति में भी आ जाए।
उन्होंने बताया कि चंद्रमा की शीतल चांदनी पति-पत्नी के बीच प्यार को बढ़ाती है और रिश्तों में शांति और शीतलता लाती है।
चंद्रमा को रोमांस का प्रतीक भी माना जाता है।
दिन भर निरजला व्रत रखने के बाद सुहागनों को चांद देखने के उपरांत पूरा बताशा खाना चाहिए, आधा या टूटा बताशा नहीं खाना चाहिए क्योंकि वह पूर्ण है और चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है और रिश्ते को भी पूर्ण बनाता है।
स्त्रियां चंद्रमा के दर्शन कर अर्ध्य देकर ही जल-भोजन ग्रहण करती हैं।
पूजा के बाद तांबे या मिट्टी के करवे में चावल, उड़द की दाल, सुहाग की सामग्री- कंघी, शीशा, सिंदूर, चूड़ियां, रिबन, वस्त्र एवं रुपया आदि बायना के रूप में रखकर सास को देते हुए उनके पांव छूने चाहिए।
शास्त्रों और पुराणों में करवा चौथ व्रत करने की कई कहानियां वर्णित हैं लेकिन सब का मूल एक ही है।
इन कहानियों में 'सावित्री और सत्यवान' की कहानी अधिक प्रचलित है।वामन पुराण के अनुसार करवा चौथ व्रत को रखने वाली स्त्रियों को सुबह स्नान आदि के बाद आचमन करके पति, पुत्र-पौत्र तथा सुख-सौभाग्य की इच्छा का संकल्प लेकर इस व्रत को करना चाहिए। इस व्रत में शिव, पार्वती, कार्तिकेय, गणेश तथा चंद्रमा का पूजन करने का विधान है।
महाभारत में भी इस व्रत का वर्णन मिलता है।पांडवों पर लगातार आ रही मुसीबतों को दूर करने के लिए द्रौपदी ने भगवान कृष्ण से मदद मांगी, तब श्री कृष्ण ने उन्हें करवाचौथ के व्रत के बारे में बताया, जिसे देवी पार्वती ने भगवान शिव की बताई विधियों के अनुसार रखा था।
कहा जाता है कि दौपद्री के इस व्रत को रखने के बाद न सिर्फ पांडवों की तकलीफें दूर हो गईं, बल्कि उनकी शक्ति भी कई गुना बढ़ गई।
नारद पुराण के अनुसार विघ्नहर्ता गणेश की पूजा करनी चाहिए।पूजा करने के लिए इस दिन बालू या सफेद मिट्टी से बेदी बनानी चाहिए। उस पर देवाधिदेव महादेव- पार्वती, गणेश और कार्तिकेय और चन्द्रमा को स्थापित कर विधि-विधान से पूजा अर्चना करनी चाहिए।
पूजा करने के बाद करवा चौथ का व्रत सुनना चाहिए तथा चन्द्रमा को अर्ध्य देकर छलनी से अपने पति का मुंह देखना चाहिए।पति के हाथों से ही पानी पीकर व्रत खोला चाहिए। बिना चन्द्रमा को अर्ध्य दिये व्रत खोलना अशुभ माना जाता है।
उन्होंने बताया कि करवा चौथ के दिन शादीशुदा महिलाएं पूरे दिन बिना अन्न-जल ग्रहण किए उपवास रखती हैं. सुबह सूरज निकलने से पहले पूजा और श्रृंगार किए जाते हैं और फिर सरगी खाई जाती है।
सरगी खाने की वो सामग्री है, जो सास की ओर से मिलती है।शाम की पूजा के लिए महिलाएं खासतौर पर तैयार होती हैं। सजने-संवरने को लेकर उनमें किसी नई दुलहन का सा उत्साह नजर आता है। इस मौके के लिए महिलाएं स्पेशल मेंहदी भी लगवाती हैं, तो बिंदी और सिंदूर के लिए भी वे खास शॉपिंग करती हैं।

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