खुशामद खुदा को भी पसंद है

खुशामद खुदा को भी पसंद है

एक बार शहंशाह अकबर ने उस व्यक्ति को 500 मोहरें देने की घोषणा की कि जो उसके दरबारी मुस्तफा के मन में क्या है, यह सही-सही बता देगा। मुस्तफा का चेहरा हमेशा निर्विकार और सपाट रहता जिससे यह कहना बहुत कठिन था कि वह क्या सोच रहा है किंतु बीरबल ने यह चुनौती सहर्ष स्वीकार की।
'ठीक है। अभी बताओ कि वह क्या सोच रहा है', बादशाह ने पूछा।
'यह सोच रहा है कि आप हमेशा तंदुरूस्त और खुशहाल रहें। आपकी उम्र खूब लंबी हो', बीरबल फौरन बोलें।

मुस्तफा जो बीरबल से बहुत जलता था, सोचकर बैठा था कि जो भी बीरबल कहेंगे, वह उससे मुकर जायेगा। बीरबल के शब्द सुन कर वह सकते में आ गया। भला वह इस बात से इंकार कैसे कर सकता था कि वह बादशाह की उन्नति और स्वास्थ्य की कामना नहीं कर रहा था?
'ये....ये ठीक कह रहे हैं। एकदम सही'। उसने धीमी आवाज में उत्तर दिया। 'बहुत खूब बीरबल'। अकबर ने मन ही मन बीरबल की चतुराई की दाद दी कि उन्होंने कितनी सफाई से मुस्तफा को निरूत्तर कर दिया। फिर उन्होंने पूछा 'बीरबल अब यह बताओ कि मैं इस वक्त क्या सोच रहा हूं।'
'आप यह उम्मीद कर रहे हैं कि आपके सब पुरखे जन्नत में आराम फरमा रहे होंगे', बीरबल का उत्तर तैयार था।
शाहंशाह ने जोरदार ठहाका लगाया और बीरबल को वादे के मुताबिक 500 मोहरों का इनाम दिया।
- कमला जोशी


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