व्यंग्य: नाम कथा

व्यंग्य: नाम कथा

नाम मनुष्यों के ही नहीं होते। पालतू पशुपक्षियों, मकानों, दुकानों, प्रतिष्ठानों, नगरों, गली मुहल्लों, सड़कों चौराहों के भी होते हैं। शेक्सपियर ने कहा है कि नाम में क्या रखा है। गुलाब को किसी नाम से भी पुकारो, गुलाब-गुलाब ही रहेगा, बहुत सही नहीं है। नाम की महिमा अपार है। देवी देवताओं के कई कई नाम हैं। विष्णुसहस्त्रनाम में भगवान विष्णु के एक हजार नाम वर्णित हैं।
पुराने जमाने में नाम अड़ंग बडंग़ कुछ भी रख दिए जाते थे। ज्यादा प्यार उमड़ा तो ज्यादा ही टेढ़ा मेढ़ा नाम दे दिया। वह बेचारा मां-बाप की इस देन को जीवन पर्यन्त ढोता झेलता रहता था। तब नाम रखने में माता पिता से अधिक दादा-दादी, नाना-नानी, अड़ोस-पड़ोस की चाची-ताई, बुआ-मौसी का योगदान ज्यादा होता था। कुछ वर्ष पूर्व तक दुकानों व प्रतिष्ठानों के नाम भी रूढि़बद्ध, स्टीरियोटाइप, घिसेपिटे ढंग से 'भोलानाथ एण्ड संस' प्रकार के ही रखे जाते थे। कोई नवीनता देखने में नहीं आती थी।

इधर ढर्रा बदला है। बच्चों के ही नहीं, दुकानों प्रतिष्ठानों के नाम भी कल्पनात्मक, आधुनिक शैली में साहित्यिक कलात्मक आधार पर रखे जाने लगे हैं। यह बात अलग है कि अति उत्साह में ऐसे नाम भी रख दिए जाते हैं जिनका कोई अर्थ नहीं होता या जो कभी-कभी अनर्गल अर्थ देते हैं।
स्वतंत्रता के उपरांत बापू के बलिदान के बाद देश भर में अधिकांश बड़ी सड़कों के नाम बापू के नाम पर महात्मा गांधी मार्ग रखे गए। आशय यह था कि इसी बहाने बापू का नाम लोगों की जुबान पर रहेगा, आने वाली पीढिय़ां बापू को याद करेंगी किंतु संक्षेपण के चलते आज बोलने, बताने व लिखने में वह मात्र एम. जी. मार्ग हो कर रह गया है। नई पीढ़ी में बहुतों को शायद ज्ञात भी नहीं कि एम. जी. का पूरा रूप और आशय क्या है। यही स्थिति अन्य ऐसे नामों के साथ भी है। मुंबई में कितने जानते होंगे कि एस. वी. रोड स्वामी विवेकानन्द के नाम पर है।
कहते हैं कि हर एक को अपना नाम बहुत प्यारा होता है। सफल प्रशासक वह होता है जो अपने अधीनस्थों को उनके नाम से जानता और बुलाता है। किसी को उसका नाम लेकर संबोधित करने से अविलम्ब उसके साथ एक तारतम्य स्थापित हो जाता है। इसी प्रकार किसी को गलत नाम से पुकारने लिखने अथवा किसी का नाम बिगाडऩे का विपरीत प्रभाव भी पड़ता है। नाम से ही इंसान की पहचान होती है। नाम ही ऐसी वस्तु है जो हमारी नितांत अपनी, निजी होती है। नाम कमाने के लिए लोग क्या कुछ नहीं करते। इंसान का नाम तो उसके न रहने पर भी बना रहता है।
नामों की बात चली है तो कुछ आधुनिक नामों का जायजा भी लेते चलें। कढ़ाई, तंदूर, सुराही, रसोई नाम हैं कुछ रेस्तराओं के। लिबास, रिवाज, पहचान, परिधान, चाहत, मूड नाम हैं कुछ कपड़े की दुकानों के। अभिलाषा, आकांक्षा, संतुष्टि, सुरभि, पूर्ति, पलक, ललक, झलक, प्रतीक, प्रशांत, प्रसून, प्रभाव, चक्षु, शोभित, संस्कार आदि नाम हैं कुछ बच्चों के।
कुछ समय पूर्व के कारगिल संघर्ष के दौरान जब एक अभ्यारण्य में एक हथिनी ने बच्चा दिया तो सर्वसम्मति से उसका नाम 'बटालिक' इसलिए रख दिया गया क्योंकि उसी दिन हमारे वीर जवानों ने बटालिक की चोटी पर पुन: अधिकार किया था। इसी का एक अन्य उदाहरण लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की प्रथम संतान का नाम भी है। उसके जन्म वाले दिन लालू यादव मीसा में बंद किए गए थे इसलिए उस बच्ची का नाम उन्होंने 'मीसा' रखा था।
किसी से उसका नाम पूछना हो तो कहा जाता है-'आपका शुभनाम', अथवा 'आपकी तारीफ' या 'आपका इस्म शरीफ' या फिर 'युअर गुड नेम प्लीज'। किसी ने क्या खूब कहा है कि नाम के साथ ही इंसान की मान मर्यादा जुड़ी हुई है। नाम के अक्षर उलट दें तो मान ही तो बनता है न।
- ओम प्रकाश बजाज


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