व्यंग्य: अंडे का फंडा

व्यंग्य: अंडे का फंडा

अंडों के साथ बचपन से अपनी निकटता देखकर अक्सर मुझे भ्रम हो जाता है कि मैं कहीं अंडा तो नहीं? जन्म से ब्राह्मण इस व्यंग्यकार पर मां के दूध से ज्यादा अंडों की कृपा दृष्टि रही है। मेरे मरियल शरीर पर मेरी मां ने शैशव से ही अंडों का उबटन लगाया है। अपने इस स्वस्थ शरीर को अब देखता हूं तो अपने जीवन में अंडों के महत्त्व और योगदान को महसूस कर श्रद्धा से रोमांचित हो जाता हूं।
अंडे और मैं एक दूसरे में इतने रच बस गये हैं कि आजकल अक्सर मुझे अपने पर अंडा होने का भ्रम होने लगता है। ज्यादा क्या कहूं? अपने बच्चों के चूजे होने की अनुभूति के गौरव से मेरा माथा विन्ध्याचल की तरह तन जाता है।
अंडे और मैं एक तरह से नर- नारायण की तरह रहे हैं। मैंने जब से होश संभाला है और पाठशाला की चार दीवारी से मेरी मुलाकात हुई है, तब से आज तक कोई भी लौकिक अलौकिक शक्ति हमारे बीच जुदाई की दीवार नहीं खड़ी कर पाई है। परीक्षाओं की विभिन्न उत्तर पुस्तिकाओं में अंडों ने प्राप्तांक की जगह अपनी अमूल्य उपस्थिति देकर मेरा मान और शान दोनों ही बढ़ाये हैं।
बचपन में अपने गणित शास्त्र की उत्तर पुस्तिकाओं पर पूज्य गुरूजनों द्वारा अंडों की अनुकृति खिंचवाने का ऐसा रिकार्ड है मेरा जिसे मुझ राम को छोड़ शिवधनुष की तरह कोई और माई का लाल भला क्या खाकर तोड़ेगा। हां, यदि अंडा खाकर प्रयास करें तो बात और है। बरहाल उस समय अंडे की दीप्ति की जगमगाती उत्तर पुस्तिका को लेकर जब मैं घर जाता था तो रास्ते में उस अण्डब्रह्म के आगे दो लिखकर बीस घंटे पचास का भ्रम खड़ा करने की नाकाम कोशिश करता था ताकि अपने पिता की स्टंट फिल्मीय मुक्केबाजी से अपनी भली-भांति रक्षा कर सकूं पर बुरा हो मेरी उत्तर पुस्तिकाओं के पन्नेवार अन्तर्योगों का कि जिससे मेरी पोल पट्टी खुल जाती थी और भरपूर कुटाई के बाद मुझे अंडे का बाप मुर्गा बनने की सजा से सजान्वित किया जाता था।
मुझे इन छोटी मोटी सजाओं से शायद ही कभी कोई फर्क पड़ा हो। शैशव में मेरे यार अंडे द्वारा क्रियान्वित मालिश ने मुझे इस कदर पुष्ट और मार रोधक बना दिया था कि अपने कसरती बाप के ताबड़ तोड़ अर्जुनीय आक्रमणों को मैं हंसते-हंसते सह लेता था।
अब दिन ब दिन महंगे होते हुए अंडों को देखता हूं तो अपनी उत्तर पुस्तिकाओं में अंडा पाने वाली अपनी हमराही भावी पीढ़ी पर मुझे करूणा आती है। हाय बेचारे दुर्दिन के मारे। इतने महंगे अलभ्य अंडों के बिना अपने बाप के हाथ और लात के चौके और छक्कों का सामना वे गरीब किस प्रकार करेंगे? कोई एक मार हो तो चलो रो रूलाकर चुप भी हो जायें। महंगाई की मार आतंकवाद को मार, बेरोजगारी की मार, घूसखोरी की मार, काला बाजारी की मार, बिना अंडे के भैया आम आदमी का इतनी चौतरफा मारों से बस क्रियाकर्म ही हो जायेगा।
जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया, अंडों के प्रति मेरी निष्ठा बढ़ती चली गयी। बालों में लगकर इतने तन्वन्गियों के लम्बे श्यामल केशों को रेशमी बना दिया। मुंह और शरीर में लगा तो रूपसी के रूप से चांद भी फीका पडऩे लगा। इसने बीमारियों को ठीक किया और दुर्बल शरीर को प्राणवान बनाया। यह आम आदमी के स्वास्थ्य का प्रतीक बना। यह गरीब नवाज है। महात्मा जी को भी विवश होकर कहना पड़ा कि भई, अंडा तो शाकाहारी और पौष्टिक है। इसको खाने में कोई प्राणी हत्या या पाप नहीं। मैं गांधीभक्त भला राष्ट्रपिता की बात कैसे टाल सकता था। तो वह दिन था कि तब से अब तक अंडों का भक्षण कर शाकाहारी धर्म निबाहे चला जा रहा हूं।
अक्सर सिर मुंडाये रागी-वीतरागी लोगों को देखकर मैंने जाना कि अंडों के व्यक्तित्व से वे कितने ज्यादा प्रभावित रहे हैं। ऊपर से चूनिया रंग का दिखने वाला साधारण सा यह अंडा कितना शक्तिमान और प्रेरणादायक है, यह तो कोई भोक्ता और अंडाभक्त ही बता सकता है। इस झंझट में पड़े बिना कि पहले मुर्गी हुई कि अंडा, मैं अंडों को अनादि और अनन्त मानता हूं।
वैसे भी मुर्गियां भला क्या खाकर अंडों की बराबरी करेंगी। आप किसी बकवास करते नेता, रेंगते गायक और टीन-टपरे पीटकर भूतों की तरह रम्बा रम्बा की ताल पर उछलते बेसऊरे नर्तक-नर्तकियों के कार्यक्रमों को मुर्गियों से फ्लाप नहीं करवा सकते। उसके लिए तो आपको महाशक्तिमान अंडों और फक्कड़ यार दोस्तों टमाटरों केले के छिलकों की जरूरत पड़़ कर ही रहेगी।
मनुष्य जाति का इसके जैसा मूकसेवक शायद ही कोई दूसरा हो। किसी ने सच कहा है देशी मुर्गी के अंडे जो खाये, पण्डों के भी छक्के छुड़ाये। देशी मुर्गी के अंडों का तो अब जमाना नहीं रहा। अब तो हर दस कदम पर कृत्रिम विधि से पैदा किए गए अंडों का राज है। देश की राजनीति में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की पुरानी पीढ़ी को हटाकर जिस प्रकार नई पीढ़ी ठस गई है, वैसे ही देशी मुर्गियों की टांग खींचकर आजकल उनकी जगह ब्रायलर जम गए हैं। पृथ्वी के गोल होने का अनुमान हमारे पूर्वजों ने शायद अंडे को ही देखकर किया होगा।
मेरे परिवार का अंडा प्रेम पिछले कई दशकों से काफी चर्चित रहा है। अब तो ब्राहमण कुलदीपक मेरे भतीजे ने मुर्गा पालन का कोर्स करके मुर्गीपालन केंद्र ही खोल लिया है। अंडों से मेरा संबंध प्राण और शरीर जैसा है। अंडे और मैं एक प्राण दो शरीर हैं। अंडों से जुदाई मेरे लिए असह्य है। अपने पूरे जीवन के सम्पूर्ण कार्य कलापों का जब मैं विहंगावलोकन करता हूं तो पता है कि उपलब्धि के रूप में प्राण प्रिय अंडे के सिवाय मेरे पास कुछ नहीं है। मेरा भूत अंडा था, वर्तमान अंडा है और भविष्य उत्तरोत्तर अंडों से अलंकृत होता जा रहा है।
मैं ही क्या? संपूर्ण भारतीय समाज इस महान अंडे से पूर्व प्रभावित दिखाई पड़ता है। हमारी राजनीति अंडा, हमारा विकास अंडा, हमारा प्रजातंत्र अंडा, हमारे नेता अंडे, हमारी जनता अंडा, हमारी संस्कृति अंडा, हमारा साहित्य संगीत और कला अंडा। एक क्षण सोचिये तो अंडे रूपी इस हिंदुस्तान में हमारी संस्कृति और सभ्यता छुपी है। इसे भ्रष्ट लोगों के हाथों में मत पडऩे दीजिये। अंडे के अंदर आने वाली पीढ़ी के चूजे बंद हैं।
इसे गलत हाथों में पड़कर बरबाद मत होने दीजिये। यह आम जनता की थाली है। यदि भ्रष्टों पर आपका गुस्सा है भी तो उन पर अंडे मत फेंकिए। सड़े टमाटर और केले के छिलकों को उपयेाग में लाइये। अंडे का झंडा झुकने मत दीजिए। लोकतंत्र और जनता की सेहत के लिए अंडा अनिवार्य है।
-कस्तूरी दिनेश

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