रहस्य रोमांच: किस्से कंजूस महिलाओं के

रहस्य रोमांच: किस्से कंजूस महिलाओं के

यूं तो पूरे संसार में एक से बढ़ कर एक महाकंजूसों के ढेरों-ढेर किस्से बिखरे पड़े हैं। यदि उन का नाम-मात्र संग्रह भी किया जाए तो एक आश्चर्यजनक, अविश्वसनीय, हास्यास्पद एवं रोमांचपूर्ण भारी-भरकम पुस्तक तैयार हो जाए, मगर हम अपने प्रिय पाठकों के मनोरंजन हेतु कुछ कंजूस औरतों के किस्से ही प्रस्तुत कर रहे हैं। हैटीग्रीज
! अमेरिका की एक महाकंजूस महिला थी। उसकी कंजूसी इस सीमा तक पहुंच चुकी थी कि प्रात:काल जो समाचार-पत्र वह खरीदती थी, उसे शाम को आधे मूल्य पर बेच डालती थी। सख्त सर्दियों के दिनों में भी वह अपने शरीर को पुराने अखबारों से ढक कर गर्म रखने का प्रयत्न करती थी। यद्यपि रेलवे ट्रांसपोर्ट में उसके अच्छे खासे शेयर थे, तथापि वह यात्रा करते समय उच्च श्रेणी में नहीं बैठती थी।
अपने व्यवसाय के सम्बन्ध में उसे अधिक समय वाल स्ट्रीट में ही व्यतीत करना पड़ता था। वहां वह जिस टूटे-फूटे मकान में रहती थी, वह न केवल असुविधाजनक ही था बल्कि स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक था। शुभचिन्तकों द्वारा बहुतेरा कहने पर भी वह कभी न्यूयार्क में कोई अच्छा सा मकान लेने के लिए रजामन्द नहीं हुई। वास्तव में हमेशा उसे यही भय सताए रहता था कि यदि उसने कोई बढिय़ा मकान ले लिया और उसमें थोड़ी बहुत सजावट कर ली तो आयकर विभाग वालों की दृष्टि में आ जाएगी। अत: वह टैक्स से बचने के लिए एक खस्ता मकान से दूसरे खस्ता मकान में रहती फिरती थी। और तो और, वह हर बार अपना नाम भी बदलती रहती।
वह अमेरिका की धनी महिला थी। उसकी मृत्यु 81 वर्ष की उम्र में 1986 में हुई। मृत्युपरान्त उसकी संपत्ति का मूल्य लगभग दस करोड़ डालर आंका गया। मृत्यु से पूर्व वह अपनी बेटी सिल्विया के यहां होबोकोन में जानबूझ कर नौकरानी के रूप में रहती थी। मरते समय वह अपनी आधी संपत्ति सिल्विया और आधी संपत्ति अपने बेटे के नाम कर गई थी।
एक बार हैटीग्रीज ने अपने कुछ मित्रों एवं शुभचिन्तकों को बोस्टन के एक सर्वाधिक महंगे होटल पार्कर हाउस में भोजन हेतु आमंत्रित किया। उसके रद्दी एवं अव्वल दर्जे के कंजूसी स्वभाव से पूर्णत: परिचित सभी लोग असमन्जस भरी स्थिति में थे। फिर भी वे खूब सजधज कर आए। तब हैटीग्रीज ने उन सब का होटल के बाहर अभिवादन किया और फिर उन्हें लम्बी पैदल यात्रा कराती हुई एक सस्ती सराय में ले गई जहां सारे आतिथ्य सत्कार कर उसके केवल 25 सेंट खर्च हुए। कहा जाता है कि जब तक हैटीग्रीज बोस्टन में रही, उसने कभी पांच सेंट से अधिक का खाना नहीं खाया जबकि उस समय उसकी आय आठ सेंट प्रति सैकंड थी। वह सदा चीथड़े कपड़े ही पहनती थी।
हैटीग्रीज के सम्बन्ध में सर्वाधिक आश्चर्यजनक बात यह थी कि वह अपने जीवन में कभी गंभीर रूप से बीमार नहीं पड़ी थी। जब उसकी उम्र 78 वर्ष थी, तो एक समाचार-पत्र के रिपोर्टर ने जिज्ञासावश उसके अच्छे स्वास्थ्य का रहस्य जानना चाहा। प्रत्युत्तर में हैटीग्रीज ने जो कहा, वह न केवल हैरतंअगेज ही था बल्कि डाक्टरों की इस बात को भी पूर्णत: झुठलाता था कि ताजा खाओ और स्वस्थ रहो। उसने बताया कि वह दिन भर उबला हुआ प्याज चूसती रहती है; क्योंकि सस्ता होने के कारण वह प्रतिदिन बासी दूध, गला-सड़ा गोश्त और घटिया भोजन करती है जिसमें असंख्य कुलबुलाते हुए जीवाणु मौजूद रहते हैं। उबला प्याज चूसने से वह सभी जीवाणु मर जाते हैं।
उसकी कंजूसी के बारे में एक किस्सा बड़ा मशहूर रहा और वह यह है कि एक बार एक कबाड़ी फटे-पुराने चीथड़े खरीदने उसके पास आया। वह रंगदार चीथड़ों की अपेक्षा सफेद चीथड़ों के एक सेंट प्रति पाउण्ड अधिक देता था, अत: इसी लालच में वह मकान की छत पर चिलचिलाती धूप में घंटों बैठ कर चीथड़ों के ढेर में से रंगीन और सफेद टुकड़े चुन-चुन अलग करती रही।
वह कभी भी किसी कागज पर अपने हस्ताक्षर नहीं करती थी, सिर्फ और सिर्फ इस भय से कि कहीं कोई चार सौ बीस व्यक्ति उसके हस्ताक्षरों की नकल न कर ले और जाली चैक बना कर बैंक से रुपया न निकाल ले, अपने नाम आने वाली डाक के सारे लिफाफों को वह सुरक्षित रखती थी और उन लिफाफों के पीछे ही उत्तर लिख दिया करती थी ताकि कागज पर हस्ताक्षर करने की नौबत ही न आए और कागज की बचत भी हो जाए।
इस कंजूस महिला की मृत्यु लम्बी उम्र में पक्षाघात से हुई। मृत्यु के समय जो नर्से उसकी सेवा-सुरक्षा के लिए नियुक्त की गई थी, उन्हें मामूली कपड़े पहनने का कड़ा आदेश दिया गया था क्योंकि यदि उसे पता चल जाता कि भारी खर्च पर अनुभवी नर्सें उसकी तीमारदारी के लिए रखी गई हैं तो आशंका थी कि वह चैन से मर भी न सकती।
हैटीग्रीज तो खैर कंजूस थी ही, मगर उसकी बेटी सिल्विया उससे भी एक कदम आगे निकली। मां की मौत के बाद उसे करोड़ों की संपत्ति मिली ही, कुछ वर्ष बाद उसे अपने भाई से भी उत्तराधिकार में दो करोड़ के आभूषण और नगदी मिली। फिर वृद्ध पति के मर जाने पर भी उसकी अपार धन-राशि में वृद्धि हो गई। कहते हैं, उस जमाने में हर साल उसे लगभग पचास लाख डालर की आय घर बैठे ही होती थी मगर अपनी मां के पद चिन्हों का अनुसरण करते हुए सिल्विया भी आज्ञाकारी बेटी की भांति एक पुराने सीलन भरे कमरे में लाचारों की तरह बिलकुल एकान्त जीवन व्यतीत करती रही। दूसरों पर तो क्या, वह स्वयं पर पैसा खर्च करने के लिए मौत जैसा भय खाती रही।
इन दोनों मां-बेटी की भांति ही इदा बुड नामक एक अन्य महिला भी अति कंजूस थी। उसके पास साढ़े सात लाख डॉलर के नोट थे जिन्हें वह हमेशा अपनी कमर से बांधे रखती थी। उसका पति न्यूयार्क का एक नामी-गिरामी धनी प्रकाशक था जिसकी 1900 में हृदयगति रूक जाने से अचानक मृत्यु हो गई थी। अपने पति के जीवन में इदा ने रानियों जैसा ऐश्वर्य भरा जीवन व्यतीत किया था। वह सोने-चांदी के बर्तनों में भोजन करती थी और उसके बहुमूल्य रतनों जडि़त वस्त्र लन्दन व पेरिस से सिल कर आते थे। पति की मृत्युपरान्त उसके स्वभाव में एकाएक भारी परिवर्तन आ गया और वह महाकंजूस-मक्खीचूस हो गई।
वह स्वयं अपने पैरों को छूने से डरती थी। उसने समाज में निकलना भी बन्द कर दिया और एक सस्ते होटल में अपनी बहन के संग रहने लगी। 1931 में जब उसकी बहन की मृत्यु हुई तो उस समय इदा 91 वर्ष की हो गई। वह फटे-पुराने कपड़े पहनती थी व कच्ची मछली खाती और निहायत घटिया सिगरेट पीती थी। लगभग बीस वर्ष तक वह अपने गंदे व खण्डहरनुमा सस्ते होटल से बाहर नहीं निकली। अन्तत: जब अदालत के कहने पर उसके कमरे को रहने अयोग्य घोषित करके गिराए जाने का आदेश दिया गया, तब कहीं वह बाहर निकली और एक अन्य मकान में रहने के लिए चली गई।
उसके मरने पर उसकी कमर में साढ़े सात लाख डॉलर के नोट बंधे मिले। साथ ही उसके सन्दूक खोलने पर उन में से एक में उसके ससुर को अमेरिका के एक राष्ट्रपति जेम्स मुनरो द्वारा भेंट की गई सोने की मूठ वाली एक छड़ी निकली। इसके अलावा भेंट की गई कीमती पेन्टिग्स व भारी मात्रा में सोने की बारीक तारों की कढ़ाई किए हुए वस्त्र, होटल की चुराई हुई दर्जनों साबुन की टिकियां, पांच सौ गज सूत और जवाहरात भरे मिले।
इदा बुड की मृत्युपरान्त उसके वकील ने संपत्ति के उत्तराधिकारियों की खोज शुरू की तो पता चला कि इदा आयरलैंड के एक निर्धन परिवार की लड़की थी। उसकी दस रिश्ते की बहनों को उत्तराधिकार के रूप में 84,000 डॉलर मिले। तब उन्हें पहली बार पता लगा कि इदा बुड नामक किसी धनी, मगर कंजूस महिला से उनकी कोई रिश्ता भी था।
और अब अन्त में, एक छोटा-सा किस्सा और। कंजूसों के बारे में एक कहावत जगत प्रसिद्ध है कि चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए। इस कहावत को अमेरिका की ही न्यू जेरेसी में रहने वाली लुइसा सिट्टमेटर ने बड़ी सख्ती से अपनाया और जीवन भर निभाया। अपना धन और सोना उसने तहखाने में गाड़ रखा था। पता नहीं क्यों, वह पुरुषों से अति घृणा करती थी। उसने अपना सारा जीवन बड़ी कंजूसी से बिलकुल तन्हा ही व्यतीत किया। उसका कहना था कि विज्ञान के विकास के साथ ऐसी भी स्थिति आएगी कि जब बिना पुरुष के स्त्रियां बच्चे पैदा करेंगी और मैं चाहूंगी कि सभी स्त्रियां लड़कों की बजाए लड़कियां ही पैदा करें।
- 'कर्नल' अशोक वर्मा

Share it
Share it
Share it
Top