बाल कथा: महात्मा का तर्क

बाल कथा: महात्मा का तर्क

किसी घने जंगल में एक बाघ काफी समय से शिकार के लिये इधर उधर भटक रहा था। शिकार न मिलने के कारण वह निराश होकर एक जगह खड़ा हो गया और चारों ओर निहारने लगा। अचानक उसकी दृष्टि जंगल के खुले भाग पर पड़ी। वहां एक गाय बड़े आराम से हरी हरी दूब चर रही थी।
दूब चरते चरते उसने जैसे ही गरदन उठाई तो उसकी दृष्टि अपनी ओर घूरते हुए बाघ पर पड़ी। बाघ को देखकर गाय घबराई और चौकन्नी हो गई। भूख से व्याकुल बाघ ने गाय को देखा तो उसकी आंखों में चमक आ गई और वह उसे धर दबोचने के लिये उसकी ओर दौड़ पड़ा।
गाय बाघ को अपनी ओर भागता हुए देखकर विपरीत दिशा की ओर दौडऩे लगी। उसके प्राण संकट में थे, सूझ नहीं रहा था कि कहां शरण ले। तभी उसे एक महात्मा का आश्रम दिखाई पड़ा। वह बिना कुछ सोचे विचारे आश्रम में घुस गई। उस समय वहां महात्मा आंखे मूंदे तपस्या में लीन थे।
गाय ने कोई चारा न देख जोर से रम्भाना शुरू कर दिया। गाय के रम्भाने की आवाज सुनकर महात्मा का ध्यान टूट गया। उन्होंने गाय की ओर देखा। गाय बहुत घबराई हुई और हाफ रही थी। उसने महात्मा से याचना भरे स्वर में कहा हे महर्षि! मेरे प्राण संकट में है। एक बाघ मुझे अपना शिकार बनाने के लिये इसी ओर दौड़ा आ रहा है। कृपा करके मेरी रक्षा कीजिये।
महात्मा ने बड़ी शीघ्रता से गाय को आश्रम में छिपा दिया। थोड़ी ही देर में एक लम्बा चौड़ा बाघ दौड़ता हांफता वहां आ पहुंचा। उसने महात्मा से कहा-Óमहात्मा, आप साधु पुरूष हैं, इसलिये आप झूठ तो बोलेगें नहीं, ऐसा मुझे विश्वास है। अभी कुछ देर पहले इस ओर एक गाय भागते हुए आई है। कृपा करके बताइये कि क्या आपने उसे देखा है?
बाघ की बात सुनकर महात्मा थोड़ी देर के लिये असमजंस में पड़ गये। उन्होंने सोचा, अगर मैं सच बात कह दूं तो बाघ गाय के प्राण लिये बिना नहीं छोड़ेगा। इसका पाप मेरे सिर होगा। यदि झूठ बोलता हूं तो झूठ बोलने का पाप मेरे सिर चढ़ेगा। अत: मुझे कोई ऐसा उपाय करना चाहिये जिससे गाय के प्राणों की रक्षा भी हो जाये और झूठ बोलने का पाप भी न लगे।
महात्मा शांत मुद्रा में सोचकर बाघ से बोले हे ब्याधराज! मुझे दुख है कि मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकता। वास्तव में बात ऐसी है कि आंखें, जिन्होंने गाय को देखा है, उनकी कोई जुबान नहीं है जिससे वे कुछ बता सकें। कहने वाली जुबान है जिसने कुछ देखा ही नहीं। इसलिये जो देखने वाले हैं, वे बोल नहीं सकते और जो कहने में समर्थ है, उसने कुछ देखा ही नहीं। इसलिये मुझे दुख है कि मेरी जुबान तुम्हारे प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकती।
महात्मा की तर्कपूर्ण बातें सुनकर बाघ के पास कहने सुनने को कुछ था ही नहीं, इसलिये वह वहां से चुपचाप उल्टे पांव लौट गया।
बाघ वास्तविकता को पूरी तरह जान गया था कि महात्मा ने सच्चाई को बड़ी चतुराई से छिपा लिया है लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने झूठ भी कुछ नहीं कहा था। सच्चाई को छल, बहानेबाजी या चालाकी से छिपा लेने की कला को ही तर्कशास्त्र कहते हैं।
-परशुराम संबल

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