व्यंग्य: मूर्ख माहात्म्य

व्यंग्य: मूर्ख माहात्म्य

मूर्ख बेहद बुद्धिमान और साधु किस्म के प्राणी होते हैं। वे जानते हैं यदि उन्होंने अपने किसी काम से यह जतला दिया कि उनमें थोड़ी भी अक्ल है तो उन्हें किसी न किसी जिम्मेदारी में फंसा दिया जायगा और वे बैठे-ठाले सांसारिकता के मोह जाल में उलझ जाएएंगे। अपने को मूर्ख दिखाना उनकी स्वभावगत कमजोरी है। इसका मतलब है जो जितना मूर्ख होगा, वह उतना ही जिम्मेदारी मुक्त होगा। लोग डरेंगे कि इसको कोई जिम्मेदारी का काम दिया और इसने उसमें पलीता लगाया।
मूर्ख संबोधन का माथे पर सुगंधित चंदन लगने के बाद बंदा पूजनीय हो जाता है कि भाई मेरे, वह परमहंस र्है। उससे कोई काम मत लेना। घोर परेशानी में फंस आओगे और संत-महात्माओं से काम करवाने का पाप लगेगा, सो अलग।
मूर्ख, ऋषि-मुनियों की तरह वीतरागी पुरूष होते हैं। खाने-पीने को छोड़कर उन्हें और किन्हीं सांसारिक विषयों में कतई रूचि नहीं होती। कहीं आग लगे, बाढ़ आए, उनका तो बैठे-ठाले मनोरंजन ही मनोरंजन समझिए। वे काम करते भी हैं तो ऐसे-ऐसे असाधारण कर्म कि देखनेवाले दांतों तले अंगुलियां दबा लें।
कालिदास भोले बाबा की कृपा प्राप्त करने के पहले मूर्खाधिराज कहे जाते थे। जिस पेड़ की डाल पर बैठे थे उसी को काट रहे थे। एक मूर्ख को ससुराल में सोने की अंगूठी मिली। किसी ने पूछा नहीं तो परेशान होकर उसने अपने घर में आग लगा ली और अपनी अंगूठी वाली तर्जनी को दिखा-दिखा कर आग बुझाने वाले पड़ोसियों को कहने लगा - पानी इधर डालो, अब उधर डालो। किसी सौभाग्यशाली ने अंगूठी देख ली और पूछ बैठा- बड़ी सुंदर अंगूठी है भैया, कहां से मिली? मूर्ख ने कहा - इसी बात को तुमने पहले पूछ लिया होता तो मैं अपने घर में आग क्यों लगाता?
मूर्ख बड़ा ही परहितकामी होता है। वह जाने अनजाने अपना नुक्सान कर लेगा लेकिन दूसरों के अहित के बारे में कभी नहीं सोचेगा जब तक कि आप आ बैल मुझे मार कहकर उस सोए सांड को नाथने की कोशिश नहीं करते।
मूर्खों की अक्सर गदहे से तुलना की जाती है या फिर उन्हें गदहे की उपमा दी जाती है परन्तु सच कहा जाए तो गदहे में मूर्खता के गुण का कोई लक्षण नहीं होता। वह बेचारा बेहद शांत, शिष्ट, मालिक का आज्ञाकारी और थोड़े से भोजन में संतुष्ट होने वाला होता है। चाहे कितना भी वजन लाद लो, खुद उस पर सवार हो जाओ, वह उफ नहीं करता। मूर्ख और गदहे की तुलना करना या मूर्ख को गदहे की उपमा देना एक तरह से बेचारे ईमानदार, आज्ञाकारी, मेहनती, शिष्ट-सभ्य गदहे का अपमान है।
अनेक मूर्ख मनुष्य, मूर्खों को उल्लुओं की उपाधि देते हैं। मैं उनसे भी पूरी तरह असहमत हूं। उल्लू तो इतने बुद्धिमान होते हैं कि वे अंधेरे में भी अपनी अंतदृष्टि से अपनी उम्र पूरी शान-मान से बिता लेते हैं। उनका पूरा जीवन इतना गौरवपूर्ण और ज्ञानमय होता है कि माता विष्णु प्रिया ने उन्हें अपना वाहन बनाकर अपने को गौरवान्वित महसूस किया है।
मूर्खगण सामाजिक स्वास्थ्य के लिए बहुत उपयोगी जीव हैं। गमगीन से गमगीन महफिल में मूर्खों की चर्चा चलते ही लोग ठहाके लगाने लगते हैं। ठहाके लगाने से व्यक्ति की बीमारियां आप ही आप ठीक हो जाती हैं और वह डाक्टर की जानमारू फीस और प्राणमारू महंगी दवाइयों से हंसते-हंसते छुटकारा पा लेता है।
मूर्ख हास्य रस के प्रमुख आलम्बन होते हैं। संसार में मूर्ख न हों तो हास्य रस का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाए। लोग दांत निपोरना ही भूल जाएं। आठ रसों से ही काम चलाना पड़े। ईश्वर द्वारा विशेष रूप से मनुष्यों को दिया गया यह हंसी का उपहार ही बेकार हो जाए। हर बच्चा नरसिंह राव, मनमोहन सिंह और देवदास बनकर पैदा हो तथा एक दिन इस दुखिया संसार को छोड़कर टाटा-टाटा, बाय-बाय कहता चला जाए। यदि आदमी के चेहरे पर हंसी-ठहाका न हो तो सोचिए तो भला वह दुनियां कैसी सूरत हराम और दर्दनाक होगी। इस असार संसार में जो हंसी-खुशी, ईद-होली है, इन महान बंदों के कारण है।
इन मूर्ख शिरोमणियों की नकल से दुनियां भर के हास्य फिल्म कलाकारों की रोजी-रोटी चल रही है। चार्ली चैपलिन, लारेल हार्डी, मिस्टर बीन, गोप, याकूब, जानीवाकर, महमूद, जानी लीवर और राजपाल यादव जैसे कलाकारों ने पर्याप्त मात्र में यश, मान और धन अर्जित किया है। मूर्खों की मूर्खता की कृपा से ही देश-विदेश में बड़े-बड़े व्यवसाय फल-फूल रहे हैं। गोरा बनाने वाली क्रीम, शक्ति और यौवन बढ़ाने वाला टॉनिक, गंजे सिर में बाल उगाने वाला तेल, मोटे को पतला और पतले को मोटा बनाने वाली औषधियां, बुद्धिमानों के शानदार विलासमय बंगले, मूर्खों के मूर्खता भरे कार्यों की मजबूत नींव के कारण ही अस्तित्व में है। यदि मूर्ख न हों तो बुद्धिमान कटोरा लिए दे दाता के नाम की रट लगाते हुए मंदिर-मस्जिद के किनारे भिखारियों के बीच बैठे मिलें।
मूर्ख निष्काम कर्मयोगी होता है। इनसे ही प्रेरणा प्राप्त करके शायद भगवान कृष्ण ने गीता में निष्काम कर्मयोग के सिद्धांत को जन्म दिया है। हालांकि वह कृष्ण की गीता पढऩे-समझने योग्य नहीं होता, फिर भी उसमें निष्काम कर्मयोगी के सभी गुण कूट-कूटकर भरे होते हैं। वह निष्काम भाव से मूर्खता करता है और इस सृष्टि को गतिशील बनाए रखता है।
सच तो यह है कि मूर्ख न हों तो सृष्टि की गति ही रूक जाए। संसार में इनके महत्त्व को देखते हुए उस परमब्रह्म परमेश्वर से हमें सच्चे मन से प्रार्थना करनी चाहिए कि हे भगवान, कुछ और अतिरिक्त मेहनत करते हुए, मन लगाकर अधिक से अधिक संख्या में मूर्खों को पैदा करें ताकि धरती का काम इनके मूर्खतापूर्ण सहयोग से अविराम रूप से चलता रहे।
- कस्तूरी दिनेश

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