बाल कथा: लालच में जब पड़ी धमाधम

बाल कथा: लालच में जब पड़ी धमाधम

एक गांव में एक गरीब किसान रहता था। आज के किसानों की भांति वह भी कड़ी मेहनत करता था। कड़कती धूप में हमेशा अपने खेत में हल जोतता, और बरसते मेहों के बीच भी खेत में कुछ-न-कुछ काम करता रहता। एक दिन वह कड़ी धूप में हल चला रहा था कि आकाश मार्ग से भगवान शंकर व पार्वती उधर से निकले।
पार्वती जी को उस किसान पर बड़ी दया आई। उन्होंने भगवान से उस गरीब को भरपूर अन्न-धन देने का आग्रह किया। उन्होंने तत्काल किसान के पानी भरे उस घड़े को, जो पास ही के वृक्ष के नीचे रखा हुआ था, लड्डू जलेबियों तथा अन्य मिठाइयों से भर दिया।
दोपहर होने को आई। फिर भी किसान की पत्नी खेत में खाना लेकर नहीं पहुंची। वह रास्ता देखते-देखते थक गया और पानी पीने के लिये वृक्ष के नीचे गया। ज्यों ही उसने ढंका हुआ घड़ा खोला, उसमें मिठाइयों को देखकर आश्चर्य चकित रह गया। भूखा तो था ही, टूट पड़ा, उसने खूब छककर मिठाई खाई और मारे खुशी के सिर पर घड़े को लेकर दौड़ते-दौड़ते अपने घर पहुंचा। घर पर उसने अपनी पत्नी से बड़े रोब से पूछा:-
'तुम खाना लेकर खेत में नहीं आई?'
पत्नी ने उत्तर दिया-क्या लेकर आती खाक? घर में एक दाना भी नहीं था। यहां तो बच्चे तक भूखे बैठे हैं। फिर भला तुम्हारे लिये क्या लाती? इतना कहकर वह रोने लगी।
'अरे तू रोती क्यों है? देख भगवान जब देता है तो छप्पर फाड़कर देता है।' कहते हुये उसने प्रसन्नता से वह घड़ा अपनी पत्नी और बच्चों के सामने रख दिया। फिर क्या था, सब-के-सब उस पर टूट पड़े। आश्चर्य तो इस बात का था कि इतने लोगों के खाने के बाद भी वह घड़ा खाली ही नहीं हो रहा था।
धीरे-धीरे घड़े की मिठाइयों को खाते-पीते अनेक दिन बीत गये। किसान की पत्नी ने घर में चूल्हा जलाना ही बंद कर दिया था। गांव वालों को आश्चर्य होने लगा कि न तो किसान आजकल खेत में काम करने के लिये जाता है और न ही उसके घर चूल्हा जलता है। फिर वह क्या खाता-पीता होगा? इस बात का पता लगाना चाहिये।
अत: ऐसा सोचकर कुछ लोग उसके घर पहुंचे। किसान ने सबका स्वागत किया और खुश होकर उसने कभी न समाप्त होने वाले मिठाई के घड़े की बात सबको बता दी। अब तक मिठाई खाते-खाते उसका सारा परिवार थक चुका था। अत: उसके मन में पुण्य कमाने की भावना आई। 'हाथ कंगन को आरसी क्या'? उसने तय किया कि वह पूरे गांव तक दूर-दूर रहने वाली सभी रिश्तेदारों को 'भोज' देगा। अत: उसने दूसरे दिन सारे गांव वालों व रिश्तेदारों को इसके लिये आमंत्रित किया। इसमें लगभग सारा गांव व रिश्तेदार उपस्थित हुये पर सब लोगों के खूब छक कर खाने के बाद भी घड़ा जरा भी खाली नहीं हुआ।
गांव के कुछ धनवान व घमंडी व्यक्ति किसान से ईष्र्या करते थे। वे भोज में नहीं आये। उन्होंने सोचा कि वह कंगाल किसान जिसके पास कल तक एक दाना भी नहीं था, इतने सारे लोगों को भोजन क्या खिलायेगा? ऐसा सोचने वाले लोग उसकी हंसी उड़ाने लगे पर जब गांव के अन्य लोगों से उनको वह बात पता हुई कि सच में घड़ा इतने लोगों के मिठाई खा लेने के बाद भी खाली नहीं हुआ तो उनका मन भी उस आश्चर्यजनक घड़े को देखने और मिठाई खाने के लिये ललचा उठा पर अब जायें तो कैसे? भोजन के समय पर जो नहीं गये थे?
धीरे-धीरे दिन बीतते गये और किसान तथा उसका परिवार निश्चित होकर मौज मनाता रहा। एक दिन किसान की पत्नी ने लालच में आकर कहा-
'अब तो हम सब मीठा खाते खाते ऊब चुके हैं। ईश्वर इस बात कोई दूसरी मिठाई या चटपटी चीजें दे दे तो मजा आ जाये। अत: क्यों न हम घड़ा खेत में उसी वृक्ष के नीचे रखकर देखें।'
किसान भी लालच में आ गया। पत्नी की बात मानकर वह सीधे खेत में पहुंच गया। कड़ी धूप में वह पहले की भांति काम करने लगा पर उसका ध्यान तो घड़े पर ही लगा हुआ था। उसी समय आकाश मार्ग से एकाएक पुन: शंकर पार्वती का निकलना हुआ। पार्वती जी ने पुन: किसान की मदद करने का आग्रह किया पर भगवान किसान के लालच को समझ गये थे। उन्होंने किसान को इसका मजा चखाने के लिये इस बार भी घड़े में कभी न समाप्त होने वाली एक मजेदार 'मिठाई' डाल दी।
किसान तो दोपहर होने की राह देख ही रहा था। थोडी देर हाथ-पाव चलाने के बाद वह घड़े के पास पहुंचा और उसने उत्सुकता एवं प्रसन्नता से उसका मुंह खोला।
पर यह क्या? धड़ाम् से एक लात उसकी पीठ पर पड़ी और तभी एक मुक्के ने तो उसके सारे होश गुम कर दिये। वह भौंचक्का रह गया। उसे समझते देर नहीं लगी कि निश्चित ही यह मेरे लालच का दुष्परिणाम है। कुछ देर तक वह अपनी भूल व लालचीपन पर सोचता-विचारता रहा। तब एकाएक उसे विचार आया कि क्योंकि इस बार उन लोगों को बुलाकर मजा चखाया जाये जो पिछली बार भोज में नहीं आये थे और घड़े की बुराई करते थे।
अत: घर आकर उसने उन सब लोगों को बुलावा भेज दिया। वे सब तो उस आश्चर्यजनक घड़े को देखने के लिये तथा मिठाई चटकारने के लिये उत्सुक ही थे। सबके सब टपक पड़े।
किसान ने सबको आदर से बैठाया और कहा-पिछली बार किसी अदृश्य शक्ति ने मेरे पानी के घड़े में कभी न समाप्त होने वाली मिठाइयां भर दी थी और उसे उसे लोगों ने स्वीकार किया था, मैं उनका आभारी हूं। ईश्वर जो करता है अच्छा ही करता है। अबकी बार उसने एक और मजेदार मिठाई घड़े में दी है। शायद इस बार आप सबको 'विशिष्ट व्यक्ति' जानकर ही उस शक्ति ने इस मजेदार मिठाई को आप सबके लिये चुना है। अत: मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि सब लोग अवश्य ही इसका मजा लेकर जायें।
और ज्यों ही किसान ने उस घड़े का मुंह खोला, उसमें से 'अदृश्य लात-मुक्के' निकल पड़े और धमाधम धमाधम की आवाजें चारों ओर से आने लगी। कुछ ही क्षणों में सब लालचियों को 'प्रसाद' मिल गया। वे लोग चीखने चिल्लाने लगे तथा चारों और भगदड़ मच गई। लालचियों को अपने लालच का मजा मिल चुका था। उस समय वहां का दृश्य बड़ा ही मजेदार लग रहा था।
- ललितनारायण उपाध्याय

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