लघु कथा: किनारा

लघु कथा: किनारा

श्रावण अपनी दादी के साथ रहता है। माता-पिता भी हैं। गरीबी इन्हें पुत्र वियोग पर विवश कर देती है। संयोग सदैव उदर पोषक नहीं हो सकता। गरीबी और वात्सल्य में सनातन बैर है। सो साल के ग्यारह महीने इन्हे बाहर ही रहना पड़ता है। श्रावण अपनी दादी का इकलौता सहारा है। दोनों ही परस्पर अवलंबित हैं। श्रावण कहने को तो कक्षा चौथी का विद्यार्थी पर समझ कक्षा एक की भी नहीं है। वह नियमित विद्यालय भी नही आता है।
श्रावण पिछले चार दिनों से विद्यालय नहीं आ रहा है सो आज बड़े गुरूजी घर पहुंच गए। आंगन पर पहुंचकर आवाज लगाई 'बेटा श्रावण'। जवाब में कराहती हुई आवाज आई 'कौन है? सरवन नहीं है।' अब तक बड़े गुरूजी घर मे दाखिल हो चुके थे। खाट पर अपनी चादर संभालती हुई दादी बोली 'बइठो गुरूजी'
बड़े गुरूजी खड़े ही रहे। वे सारा माजरा भाप चुके थे। अब पूछताछ की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी पर दादी पूछ बैठी 'कइसन आए हो जी।'
बड़े गुरूजी को अब वह प्रश्न पूछना ही पड़ा जिसका उत्तर उन्हें मिल चुका था 'श्रावण स्कूल क्यों नहीं आता जी'
दादी बोली- 'सरवन खर्रा घसन जाता है। बीस रूपया कमा लाता है। हम दोनों उहे मा जिंदा है नहीं ते कबे के मर जाते।' बड़े गुरूजी समझ चुके थे कि तेज गति से मौत-महासागर की ओर बढ़ रही दादी-सरिता का श्रावण एकमात्र किनारा है।
- अशोक महिश्वरे

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