बाल कथा: लालची पुत्र

बाल कथा: लालची पुत्र

दौलत राम एक गरीब ब्राह्मण था। एक बार वह गर्मी के दिनों में एक घने वृक्ष की छाया में सो रहा था। अचानक उसकी आंख खुली तो उसने एक काले नाग को अपने ऊपर लटकते देखा, जिसकी पूंछ डाल से लिपटी हुई थी। दौलत राम डर के मारे कांपने लगा।
काले नाग ने कहा, 'हे ब्राह्मण, घबराओ मत और मेरे लिए एक कटोरा दूध ले कर आओ।'
डर से कांपता हुआ ब्राह्मण भागा-भागा अपने घर गया। वहां से दूध का एक कटोरा भर कर ले आया और उसने नाग के आगे रख दिया।
नाग ने दूध पी लिया और खाली कटोरे में सोने का एक सिक्का उगल दिया। फिर बोला, 'हे ब्राम्हण परोपकारी, हम तुम्हारी सेवा से बहुत खुश हुए। अब तुम हर रोज हमारे लिए दूध का एक कटोरा भर कर लाया करो।'
नाग चला गया। ब्राह्मण ने कटोरा उठाया और सोने का सिक्का पा कर बेहद खुश हुआ। खुशी से नाचता हुआ वह घर पहुंचा और उसने अपनी पत्नी को सोने का सिक्का देते हुए नागराज की पूरी कहानी सुना दी।
उसी दिन से दौलत राम की दुनिया बदल गई। जिस घर में खाने को रोटी के लाले पड़े हुए थे, उस घर में एक से बढ़ कर एक पकवान बनने लगे। परिवार में नाग देवता की पूजा होने लगी।
कुछ दिनों के पश्चात दौलत राम ने तीर्थ यात्र करने की बात सोची और अपने बड़े लड़के मोहन से कहा, 'बेटा, जब तक मैं काशी से आ नहीं जाता, तुम उस नाग देवता को दूध पिला दिया करो।'
'पिताजी आप चिंता न करें, नाग देवता की सेवा करना तो मेरा फर्ज है।' मोहन ने अपने पिता को आश्वस्त किया।
दौलत राम काशी चला गया, तो उसका बेटा हर रोज उस नागराज को दूध पिलाने लगा।
एक दिन मोहन ने सोचा कि नाग के पेट के अंदर तो बहुत से सिक्के भरे पड़े हैं। मेरे पिताजी तो मूर्ख हैं जो बेकार में इस नाग को दूध पिलाने आते हैं। यदि एक दिन में ही इसका पेट काट कर सारे सिक्के निकाल लिए जाएं तो कितना अच्छा रहेगा।
और फिर ब्राह्मण पुत्र ने नाग को मार कर सारे सोने के सिक्के निकालने की योजना बना ली।
दूसरे दिन उसने नाग के आगे दूध का कटोरा रखा। नाग दूध पीने लगा। तभी लड़के ने कुल्हाड़ी उठा कर उसकी गर्दन काट दी। फिर उसके पेट के टुकड़े करके सोने के सिक्के खोजने लगा।
मगर उसका पेट तो खाली था। उसमें एक भी सोने का सिक्का नहीं था।
ठीक उसी समय दौलत राम भी काशीजी से वापस आ गया। मोहन को घर पर न देख कर वह समझ गया कि वह नाग देवता को दूध पिलाने गया होगा।
नाग देवता के दर्शन करने का विचार कर वह स्वयं भी जंगल की ओर चल दिया। वहां पहुंच कर उसने अपने बेटे के हाथ में खून से सनी कुल्हाड़ी और नाग के टुकड़े देख कर अपना सिर पीट लिया और बोला, 'मूर्ख, यह तूने क्या किया। लोभ में आ कर तूने न केवल एक जीव की हत्या की है बल्कि हम सबके भाग्य पर भी कुल्हाड़ी मार दी है। अब हम रोज मिलने वाले सोने के एक सिक्के से भी वंचित हो गए।'
किसी ने सत्य ही कहा है- 'लोभी अंधा होता है।'
- नरेंद्र देवांगन

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