बाल कथा: आतुर स्वभाव

बाल कथा: आतुर स्वभाव

बहुत समय पहले विजय नगर में सोमनाथ नाम का एक युवा गडरिया था। वह बुद्धिमान, दूरदर्शी और निष्कपट व्यक्ति था। उसने किसी विद्यालय में शिक्षा नहीं पाई थी लेकिन लिखना पढऩा उसे अच्छी तरह आता था। उसकी बुद्धिमत्ता को देखकर अच्छे-अच्छे दांतों तले अंगुली दबाते थे। सोमनाथ अपने गड़रिया समाज की पंचायत का मुखिया था। आपसी झगड़ों को तो वह इस ढंग से निपटा देता था कि उसके न्याय पर किसी की अंगुली नहीं उठती थी।

उस समय विजय नगर पर राजा विक्रम सिंह का राज्य था लेकिन राजा एक कुशल प्रशासक नहीं था। वह कान का कच्चा और आतुर स्वभाव वाला था। उसमें स्वविवेक और बुद्धि की बड़ी कमी थी।

उस समय राजा को एक कुशल और ईमानदार कोषाध्यक्ष की जरूरत थी। किसी ने राजा को सोमनाथ के विषय में बताया और राजा के सामने उसकी बुद्धिमत्ता, समझदारी और ईमानदारी की खूब बढ़ाई की। राजा ने सोमनाथ को राजदरबार में बुलवाया और उससे कुछ प्रश्न किये। प्रश्नों के उत्तर से संतुष्ट होकर राजा ने सोमनाथ को राज्य का कोषाध्यक्ष नियुक्त कर दिया।

सोमनाथ कुशलतापूर्वक अपने कर्त्तव्य का निर्वाह करने लगा। निवास स्थान के रूप में रहने के लिये, विशाल भवन की बजाय उसने साधारण सी कोठरी में अपना डेरा डाल लिया। जिस कोठरी में वह रहता था, उसमें वह दिन में ताला लगाकर रखता था।

सोमनाथ को काम करते हुए कुछ ही महीने बीते होंगे कि राजा के मुंह लगे लोगों ने सोमनाथ के विरूद्ध राजा के कान भरने शुरू कर दिये। उन्होंने राजा से कहा-Óमहाराज, यह नया कोषाध्यक्ष तो एक नंबर का बेइमान और रिश्वतखोर है। इसने ऊपर की कमाई से ढेर सारा धन कमा लिया है। भेद खुल जाने के भय से वह हर समय अपनी कोठरी में ताला लगाकर रखता है।'

फिर क्या था। आतुर स्वभाव के कारण राजा ने न तो सच्चाई जानने की कोशिश की और न ही इस विषय में सोमनाथ से कोई बातचीत की। मुंह लगे चमचों की बात पर विश्वास करके उसने अपने अधिकारियों को सोमनाथ की कोठरी की तलाशी लेने का हुक्मनामा जारी कर दिया। सोमनाथ को भी पद से हटा दिया।

अधिकारियों द्वारा सोमनाथ की कोठरी की तलाशी ली गई लेकिन फटे पुराने कपड़ों, जूतों और कुछ धार्मिक पुस्तकों के अलावा वहां कुछ भी नहीं था।

महामंत्री ने सोमनाथ से पूछा-'तुम तो एक महत्वपूर्ण पद पर आसीन थे, फिर भी तुमने अपनी कोठरी में ये फटे पुराने वस्त्र, जूते आदि जमा करके क्यों रखे?

सोमनाथ ने कहा-'महामंत्री, इन्हीं कपड़ों को पहनकर मैं यहां आया था। बस मेरे पास ये फटे पुराने वस्त्र और पुस्तकें ही मेरी पूंजी थी और आज भी हैं। मैं जानता था कि हमारे महाराज अपने स्वभाव के कारण कभी भी ऐसा वैसा निर्णय ले सकते हैं इसीलिये अपने घर अपने असली रूप में लौटने के लिये मैंने यह सारा सामान अपने पास ही रख लिया था। आज वह दिन आ ही गया।

महामंत्री सोमनाथ के सरल स्वभाव, ईमानदारी और वफादारी से बहुत प्रभावित हुए लेकिन वे वास्तविकता से परिचित थे। कुछ कर भी नहीं सकते थे।

सोमनाथ ने राजकीय लिबास उतारा और अपने पुराने कपड़े पहन कर और एक पोटली में अपना सामान लपेटकर अपने घर की ओर चल पड़ा।

सच है, प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिये स्वविवेक, बुद्धि, सूझबूझ और दूरदर्शिता की जरूरत होती है। कान का कच्चा व्यक्ति अपने आप को भी और दूसरों को भी हानि पहुंचाता है।

- परशुराम संबल

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