बाल कथा: सत्य का मार्ग

बाल कथा: सत्य का मार्ग

विक्रम सिंह एक माना हुआ चोर था। वह अब तक छोटी-बड़ी सैंकड़ों चोरियां कर चुका था लेकिन अपनी चतुराई के कारण एक बार भी पकड़ा नहीं जा सका था। देश के राजा बलभद्र सिंह ने उसे जिंदा या मुर्दा पकडऩे के लिए भारी इनाम की घोषणा कर रखी थी। एक दिन विक्र म सिंह ने राजा बलभद्र सिंह के राजमहल में चोरी करने का निश्चय किया।

रात का दूसरा पहर ढलते ही विक्रम सिंह राजमहल में घुस गया। जैसे ही वह महल में पहुंचा, उसे बातचीत करने की आवाज सुनाई दी। बातचीत करने वाले राजा बलभद्र सिंह और उनकी रानी रूपवती थे। वे राजकुमारी फूलकुमारी की शादी की बात कर रहे थे।

विक्रम सिंह ने सुना, रानी रूपवती राजा बलभद्र सिंह को उलाहना देते हुए कह रही थीं, 'आप कहीं उसकी शादी की बात क्यों नहीं चलाते?'

रानी रूपवती के इस उलाहने पर राजा बलभद्र सिंह ने उत्तर दिया, 'रानी, मैंने निश्चय किया है कि मैं अपनी बेटी की शादी किसी श्रेष्ठ तपस्वी से करूंगा। कल प्रात:काल ही मैं अपने मंत्री को इस काम के लिए गंगा किनारे भेजूंगा।'

यह सुनकर विक्र म सिंह, बिना किसी वस्तु को हाथ लगाए राजमहल से बाहर आ गया। अपने ठिकाने पर पहुंचकर, उसने गेरूए वस्त्र धारण कर लिए। शरीर पर भस्म मली और हाथ में माला लेकर गंगा तट पर जाकर बैठ गया। वह युवा तो था, तपस्वी के वेश में वह पहले से भी अधिक आकर्षक लग रहा था।

राजा बलभद्र सिंह के कहने के अनुसार, उनका मंत्री कई सेवकों सहित गंगा के तट पर आया। उसने यहां-वहां नजर दौड़ाई। तट पर कई तपस्वी धुनी रमाकर भगवान की भक्ति में लीन थे। मंत्री एक-एक कर तपस्वियों से बातें करने लगा। उन्हीं तपस्वियों के ही साथ, एक कोने में विक्र म सिंह भी ईश्वर के नाम का स्मरण कर रहा था। मंत्री को सभी तपस्वियों में वही सबसे अधिक सुंदर, स्वस्थ और आकर्षक दिखाई दिया। मंत्री ने राजा बलभद्र सिंह द्वारा भेजे गए हीरे-जवाहरात के सुंदर थाल उसके आगे रखे।

कुछ क्षण रूककर मंत्री बोला, 'हमारे अन्नदाता की पुत्री फूलकुमारी, विवाह योग्य हो गई है। उनके आदेश के मुताबिक मैं यहां उपयुक्त वर के चुनाव के लिए आया हूं। यहां सभी तपस्वियों में आप ही मुझे राजकुमारी के लिए, सबसे योग्य वर दिखाई दिए हैं। अत: कृपया इस भेंट को स्वीकार करें।

तपस्वी बने विक्र म सिंह ने चोर आंख से हीरे-जवाहरात को देखा, तो उसकी बांछें खिल गईं। अपनी योजना पर मन ही मन खुश हुआ।

उधर मंत्री उसके उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा था। विक्र म सिंह ने सोचा, 'यदि इस समय मैं इस भेंट को ठुकरा दूं तो अगली बार राजा स्वयं अधिक भेंट लेकर आएगा।' यह विचार करके उसने उस भेंट को लौटा दिया।

मंत्री ने सोचा कि तपस्वी ने शायद इसे अपना अपमान समझा है कि राजा ने स्वयं न आकर अपने मंत्री को भेज दिया है। अत: वह राजमहल लौटा और राजा को सारी कहानी कह सुनाई।

मंत्री की बात सुनकर राजा बलभद्र सिंह सुबह होते ही अपने लाव-लश्कर सहित, गंगा तट पर पहुंचे। विक्र म सिंह के चरणों में पहले से कहीं अधिक भेंट चढ़ाकर बोले, 'महाराज, मुझे आप एक महान तपस्वी दिखाई देते हैं। अत: मैं अपनी बेटी का विवाह आपके साथ करना चाहता हूं। मेरी इच्छा है कि आप इस रिश्ते को स्वीकार करें। यह कहकर राजा बलभद्र सिंह हाथ बांधकर खड़े हो गए और उसके उत्तर की प्रतीक्षा करने लगे।

एक राजा को अपने सामने इस प्रकार हाथ बांधे खड़े देखकर, विक्र म सिंह के विचार एकाएक बदल गए। वह सोचने लगा, 'आज मैं एक नकली तपस्वी हूं, तो मेरे सामने राजा स्वयं हाथ बांधे खड़ा है। यदि मैं चोरी का मार्ग छोड़कर, सत्य के मार्ग पर चलने लगूं तो न जाने कितने लोग मेरी पूजा करेंगे।

मन में यह विचार आते ही उसने राजा के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। अब वह सच्चे मन से ईश्वर की भक्ति करने लगा। एक दिन वह बहुत बड़ा तपस्वी बना।

- नरेंद्र देवांगन

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