बाल कथा: प्यासा गांव

बाल कथा: प्यासा गांव

रामनिधि बंगाल के प्रख्यात पंडित थे। आसपास के जिलों में उनके बहुत से शिष्य थे। एक दिन रामनिधि अपने एक शिष्य के घर गए। लौटते-लौटते दोपहर ढलने लगी। वह जंगल के पास ही एक सुनसान मैदान के रास्ते से आ रहे थे। शिष्य द्वारा दी हुई चीजों से भरी पोटली ले, एक आदमी उनके साथ चल रहा था।

पांच-सात लुटेरों ने उन्हें घेर लिया। लाठी हिलाते हुए एक ने कहा, 'तुम्हारे पास जो कुछ है, हमें दे दो।'

रामनिधि उसे पहचान गए। वह वैद्यनाथ डाकू था। उसका नाम सुनते ही लोग थर्रा जाते थे। खडिय़ा नदी के किनारे घने जंगल में उसका डेरा था। वैद्यनाथ दिन-दहाड़े भी डाका डालता था। लोग उस जंगल के आसपास से भूलकर भी नहीं गुजरते थे। जल्दी जाने के लिए रामनिधि ने यह रास्ता चुना था।

रामनिधि ने कहा, 'मेरे पास, मेरा अपना कुछ नहीं है। क्या दूं तुम्हें?'

वैद्यनाथ ठहाका मारकर हंस पड़ा। कड़ककर बोला, 'चालाकी छोड़ो। रूपए-पैसे जो हैं, दे दो। तुम ब्राह्मण हो। जान नहीं लूंगा।'

रामनिधि ने उत्तर दिया, 'रूपए-पैसे मेरे पास जरूर हैं लेकिन ये मेरे नहीं। मैं कैसे दे दूं?v

यह सुन सारे डाकू हो-हो कर हंस पड़े। फिर उन्हें मारने को उतारू हो गए। रामनिधि का साथी डर के मारे कांपने लगा। वैद्यनाथ ने डांटकर कहा, 'तुम दोनों को खत्म ही करना होगा, तभी माल दोगे।'

'हां, हमारी जान ले लो लेकिन पराया धन तुम्हें नहीं दे सकता।' रामनिधि ने कहा।

'पराया धन। यह धन पराया कैसे हुआ?' वैद्यनाथ के स्वर में आश्चर्य था।

पंडित जी कहने लगे, 'उस दिन दोपहर मैं वर्धमान जिले के गरीबपुर ग्राम से आ रहा था। गर्मी का दिन था। देखा, कई औरतें पसीने से लथपथ हो, मैदान से जा रही हैं। उनके सिर पर पानी से भरा एक-एक घड़ा था। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया, उनके गांव के आसपास कोई तालाब नहीं है। एक था, वह पुराना हो गया। गर्मियों में उसका पानी सूख जाता है, इसीलिए वे दो-तीन कोस से पानी ढोकर ला रही थीं। मैंने उन्हें वचन दिया, अगले साल उनके गांव में एक तालाब बनवा दूंगा। ये रूपए उसी के लिए हैं। अब बताओ, रूपए तुम्हें कैसे दूं?'

वैद्यनाथ ने पूछा, 'तुम्हारे पास कितने रूपए हैं?'

'एक हजार रूपए।' रामनिधि ने निर्भीकता से जवाब दिया।

डाकू फिर चिल्लाने लगे। उन्हें चुप रहने का इशारा करते हुए वैद्यनाथ ने कहा, 'इससे तो काम नहीं चलेगा। बाकी रकम कहां से मिलेगी?'

'कहीं से दान मांगकर इकटठी करनी होगी।' रामनिधि ने कहा।

वैद्यनाथ खामोश रहा। फिर बोला, 'चलो, तुम्हारे घर पहुंचा देता हूं।'

रामनिधि नवद्वीप के किस मोहल्ले में रहते हैं? गरीबपुर वाले रूपए लेने कब आएंगे? ये सारी बातें वैद्यनाथ ने जान लीं।

एक दिन रामनिधि के घर गरीबपुर से कई लोग आए। वह उन्हें रूपए दे रहे थे। तभी एक हट्टा-कट्टा आदमी तेज कदमों से वहां आ धमका। उसने पूछा, 'मुझे पहचानते हैं पंडित जी?'

'हां, तुम.....' कहते-कहते वह रूक गए।

'चुप, चुप।' कहते हुए उस आदमी ने गरीबपुर के लोगों से पूछा, 'तुम्हें जो रूपए मिले हैं, क्या उनसे काम चल जाएगा?'

एक ने कहा, 'नहीं, एक हजार रूपए और चाहिए।'

'ठीक है, बाकी रूपए मैं दूंगा।' कहते हुए उस आदमी ने रूपयों की एक थैली उनके हाथ में दे दी और तुरंत वहां से चला गया। रामनिधि ने पुकारा भी लेकिन वह रूका नहीं। आज भी रामनिधि के नाम पर वह तालाब है। थोड़े लोग जानते हैं कि वैद्यनाथ डाकू ने भी तालाब को खोदने के लिए रूपए दिए थे।

सुना यह जाता है कि वैद्यनाथ डाकू उस तालाब में नहाकर शिव भक्त बन गया। फिर उसने डाके डालने छोड़ दिए।

- नरेंद्र देवांगन

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