बाल कहानी: तलवार की परख

बाल कहानी: तलवार की परख

किशनपुर के महाराजा शेरसिंह बड़े प्रतापी राजा थे। उन्होंने अपनी सभा में एक से एक गुणी व्यक्ति रख छोड़े थे। कोई घोड़ों का पारखी था, तो कोई हाथियों का। कई पहलवान भी राजा की सेवा में थे। राजा शिकार के भी बहुत शौकीन थे। अच्छी से अच्छी तलवारें रखने और चलाने में भी वह पारंगत थे।

सुंदर तलवारों का उनके पास अच्छा संग्रह हो गया था। तलवारें भी ऐसी थीं जो एक बार में शेर की गर्दन उड़ा दे। इन तलवारों की परख के लिए उन्होंने एक गुणी व्यक्ति को अपने दरबार में रख छोड़ा था। वह हर नई तलवार की परख करता। फिर उसके कहने पर राजा उसे खरीद लेते। वह जो दाम बताता, राजा बिना सोचे-समझे वही दाम दे देते।

उस गुणी व्यक्ति में एक खराबी थी। वह तलवार बनाने वालों से घूस लिया करता था। जो लुहार उसे घूस देते थे, वह उनकी तलवारों को उत्तम कहकर काफी धन दिलवा दिया करता था। जो धन नहीं देते थे, उनकी तलवार को खराब बताकर खरीदने से मना कर देता था। तलवार परखने का उसका ढंग भी अजीब था। तलवार को नाक के पास ले जाता, जैसे उसे सूंघ रहा हो। देखनेे वाले उसके परख करने के इस ढंग से चकित थे।

एक बार एक लुहार ने परिश्रम से एक सुंदर तलवार बनाई पर उसने तलवार पारखी को घूस न दी। इस पर पारखी ने उसकी तलवार को बुरी बता दिया। लुहार बहुत दुखी हुआ। उसने बदला लेने का निश्चय कर लिया। कुछ महीने बाद उसने उसी तलवार को और तेज किया। उस पर चमकीली पालिश लगाई। उसकी मूठ का रंग भी बदल दिया। इसके बाद उसे लेकर फिर दरबार में आया। उसने इस बार भी घूस नहीं दी। वह जानता था, नाक के पास ले जाकर पारखी सूंघने का बहाना करेगा। फिर झट से बुरी बता देगा। वह इसके लिए भी तैयार होकर आया था।

सभा में पहुंचकर उसने महाराजा को प्रणाम किया। फिर परखने वाले की ओर अपनी तलवार बढ़ा दी। उसने तलवार को म्यान से बाहर निकाला। नाक के समीप ले जाते ही, उसे तड़ातड़ छींकें आने लगीं। छींकों के कारण तलवार नाक से जा टकराई। तलवार की धार तेज थी, इसीलिए टकराते ही दुष्ट पारखी की नाक कट गई।

हुआ यह था, इस बार लुहार ने अपनी तलवार की धार पर मिर्च की बुकनी लगा दी थी। वह जानता था, जैसे ही पारखी तलवार को नाक के पास ले जाएगा, उसे छींकें आएंगी। उसकी नाक कटकर गिर जाएगी। इस घटना के बाद भी पारखी ने अपनी दुष्टता नहीं छोड़ी। उसने महाराजा से कहा, 'स्वामी, यह तलवार तो बहुत अपशकुन वाली लगती है। जब इसे छूते ही परखने वाले की नाक कट गई, तो यह देश की भी नाक कटवा सकती है।'

महाराजा ने पारखी की बातों में आकर तलवार तो खरीदी ही नहीं, उल्टे लुहार को देश से निकल जाने का आदेश दे दिया।

कुछ दिनों बाद राज्य पर एक और राजा ने आक्रमण कर दिया। राजा ने सेनापति को शत्रु का सामना करने के लिए भेजा। हमलावर शक्तिशाली था। उसने सेनापति को धोखे से बंदी बना लिया। अब किशनपुर चारों तरफ से घिर चुका था। यह देखकर राजा बची हुई सेना लेकर निकले। वह शत्रुओं पर टूट पड़े। उनका घोड़ा भी बहुत फुर्तीला था। शत्रुओं को अपनी टापों से कुचलता, वह तेजी से भाग रहा था।

अचानक राजा की तलवार टूट गई। उन्होंने कंधे से धनुष उतार लिया। उनके हाथ बिजली की गति से तीर चलाने लगे। तभी शत्रु सेना के एक सिपाही के बाण से उनके धनुष की डोरी कट गई। सामने ही शत्रु पक्ष का सेनापति भाला उठा रहा था। प्राण रक्षा के लिए राजा ने अपना भाला जोर से फेंका। उसका फलक शत्रु की छाती बींधता पार निकल गया।

तभी दुश्मनों की फौज ने राजा को चारों ओर से घेर लिया। अब उनके पास कोई शस्त्र नहीं रह गया था। वह असहाय से हो रहे थे। इसी बीच अपना चेहरा छिपाए एक सिपाही ने अपनी तलवार उनकी ओर बढ़ा दी। उसे पाकर राजा नए उत्साह से शत्रुओं पर टूट पड़े। सचमुच वह तलवार मजबूत और तेज थी। दूसरी तलवारों से टकराते ही उनके दो टुकड़े हो जाते थे। शत्रु के सिपाही भागने लगे। कुछ ही देर में राजा के जय-जयकार से युद्ध क्षेत्र गूंज उठा।

राजा ने उस सिपाही को दरबार में बुलाया, उसका परिचय पूछा। उसने कहा, 'महाराज, आपका वही सेवक हूं, जिसे आपने राज्य से निकाल दिया था। यह तलवार भी वही है। यदि यह अपशकुनी होती, तो आपको विजय कैसे मिलती ?'

राजा बोले, 'तुम ठीक कहते हो। उत्तम वस्तु से अपशकुन कैसा ? अपशकुनी कोई वस्तु नहीं, अपने मन की कमजोरी होती है।' इसके बाद राजा ने धूर्त पारखी को हटा कर उसकी जगह लुहार को दे दी।

- नरेन्द्र देवांगन

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